जंगल में पेट की आग ने जब सिखाया एकजुटता का सबक

रात को जब हम इस परिवार से विदा लेकर लौट रहे थे, तो भोपाल की टीम के कुछ लोग हमारी गाड़ी में थे तो हमारे कुछ लोग और सामान उनके ट्रक में. इस आदिवासी परिवार ने ऐसी सीख दी थी कि दिल्ली और भोपाल आपस में घुल मिल गए थे. अगले कई दिन तक इस टीम ने ऐसे मिल कर काम किया जैसे बरसों से साथ-साथ काम कर रहे हों.

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मार्च 2016 की बात है, हम मैं भी भारत के पहले कुछ एपिसोड शूट करने के लिए मध्यप्रेदश के खरगौन ज़िले में थे. मेरे साथ राज्यसभा टीवी की एक बड़ी टीम थी. इस टीम में मेरे अलावा रिसर्चर, पांच कैमरामैन, साउंड इंजीनियर, पैनल प्रोड्यूसर, ऑनलाइन प्रोड्यूसर, और असिस्टेंट्स थे.

मतलब हमारी 15-16 लोगों की टीम थी. खरगौन के एक नए-नए होटल में हमने डेरा जमा लिया था. प्लान के हिसाब से मुझे यहां अपनी टीम के साथ मिलकर चार एपिसोड शूट करने थे. यानि पहले चार ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करनी थीं और उसके बाद अपने ज़मीनी अनुभव पर आदिवासियों के गांवों में चर्चा करानी थी. इस चर्चा में इस इलाक़े के राजनेताओं, अफ़सरों और एनजीओ के लोगों को भी शामिल करने का इरादा था. दरअसल, मेरे साथ जो बड़ी टीम थी, वो मैं भी भारत की चर्चा वाले हिस्से को शूट करने के लिए ही थी.

आदिवासी किसानों के मसलों पर चर्चा की तैयारी. बीच में श्याम सुंदर के साथ संजय शर्मा हैं.

खरगौन के वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा हमारी मदद कर रहे थे. संजय शर्मा की जितनी तारीफ़ की जाए कम है. वो इस इलाक़े के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ हैं. इसके साथ ही इस इलाक़े के गांव-गांव में उनके संपर्क हैं. हमने यहां एक-दो दिन घूमने के बाद तय किया कि आदिवासी इलाक़ों से मज़दूरी के लिए पलायन, कीटनाशक दवा और हाइब्रिड बीज, आदिवासियों पर कर्ज़, और फ़सल बीमा योजना और रोज़गार के अवसरों जैसे मसलों पर रिपोर्ट और चर्चा करेंगे.

सबसे पहले हमने खरगौन और बडवानी दो ज़िलों में आदिवासियों के पलायन पर रिपोर्ट तैयार की. इस दौरान हमने पाया कि बडवानी से ही प्राइवेट बसों से हर दिन 3-4 हज़ार आदिवासी मज़दूरी के लिए गुजरात और महाराष्ट्र जाते हैं. बडवानी में प्राइवेट बसों का धंधा इन आदिवासी मज़दूरों की बदौलत ही चलता है.

एक और ख़ास बात हमें इस रिपोर्ट को तैयार करते हुए समझ में आई कि ना सिर्फ़ बसों का धंधा इन आदिवासी मज़दूरों के दम पर चलता है, बल्कि इस पूरे इलाक़े की अर्थव्यवस्था इन मज़दूरों के दम पर ही फलती-फूलती है. ये मज़दूर मार्च के महीने में अपने घरों को लौटते हैं. क्योंकि बारिश के मौसम में ये आदिवासी अपने पठारी ढलानों के खेतों में मक्का, बाजरा और सोयाबीन की खेती करते हैं. इसके साथ-साथ इन भील आदिवासियों के लिए सबसे बड़ा त्योहार होली है, जिसे भगोरिया भी कहा जाता है.

खरगोन में भील आदिवासियों के मसलों पर चर्चा में हज़ारों लोग जुट गए थे.

यह समय इन आदिवासियों के लिए ब्याह शादी का भी होता है. इसलिए चांदी के व्यापारियों की चांदी होती है. साथ-साथ लत्ते कपड़े के व्यापारी भी इस समय का इंतज़ार करते हैं. कुल मिलाकर ये आदिवासी जो भी कमा कर लाते हैं, मार्च-अप्रैल में ख़र्च कर देते हैं. इसके बाद अपनी फ़सल काट कर बेचते हैं और उससे कर्ज़ उतारते हैं. उसके बाद फिर ये आदिवासी मज़दूरी के लिए निकल जाते हैं और क़रीब आठ महीने बाहर रहते हैं.

अब बारी थी चर्चा की. चर्चा के लिए हमने संजय शर्मा की मदद से खरगौन की भगवानपुरा तहसील का एक गांव चुना. जिस दिन चर्चा होनी थी उस दिन सुबह-सुबह भोपाल से दो ट्रक खरगौन पहुंचे. इनमें से एक ट्रक में जनरेटर था और दूसरे में लाइट्स और बाक़ि सामान.

हमारे डीओपी भरतराज शर्मा को भी उसी दिन सुबह खरगौन पहुंचना था. लेकिन हमने यह तय किया कि हम एक साथी को पीछे छोड़ देते हैं, जो भरतराज को लोकेशन पर ले आएगा. भरतराज कम से कम दिल्ली टीवी इंडस्ट्री के सबसे बड़े नाम हैं.

हम लोग सुबह क़रीब सात बजे भगवानपुरा के लिए निकल पड़े. संजय शर्मा ने खरगौन से ही एक बड़ी डोलची में सब्ज़ी और परांठे पैक करा लिए थे. हम लोग चार-पांच गाड़ियां और दो ट्रक सामान लेकर भगवानपुरा तहसील के उस गांव में पहुंच गए जहां शाम को चर्चा होनी थी. कुछ देर आराम करने के बाद एक पेड़ के नीचे सारा सामान उतार लिया गया.

आदिवासियों में पलायन के दौरान एक गांव में बच्चों के साथ

 क़रीब दो घंटे बाद भरतराज भी पहुंच गए. वो लोकेशन को देखकर बहुत खुश हुए. धूप चढ़ चुकी थी और काफ़ी चमकदार थी. लेकिन भरतराज ने एक कैमरा लिया और घूम-घूम कर अलग-अलग एंगल से कैमरों की पोज़िशन का जायज़ा लेना शुरू कर दिया. एक प्रोफ़ेशनल कैसे काम करता है, यह भरतराज से सीखने वाली बात थी.

कुछ देर बाद भरतराज ने मुझसे पूछा कि कुर्सियां कितनी होंगी और कब तक आ जाएगीं. मैंने उन्हें बताया कि क़रीब 500 कुर्सियां होंगी, उम्मीद है कि 150-200 लोग जमा हो जाएंगे. इस बीच एक आदिवासी अपना बड़ा और काफ़ी भारी ढोल लेकर मैदान में पहुंच गया, उसका एक और साथी थाली लिए हुए था. उन्होंने ढोल बजाना शुरू किया, हमें काम में मज़ा आ रहा था. हमें लगा था कि ये आदिवासी कुछ देर तक ढोल बजाकर बंद कर देगा. लेकिन यह आदमी रुक-रुक कर ढोल बजाता रहा, जबकि हमने उसे कहा कि कुछ देर के लिए अब ढोल बंद कर दे.

लेकिन इस बीच में कुछ ऐसा घटा जो कभी नहीं भूला जा सकता. इस घटना से हमें या कम से कम मुझे एक ऐसा सबक़ मिला जो ज़िंदगी भर काम आएगा. हुआ यूं कि भरतराज ने मुझसे कहा कि अगर हम अभी कुर्सियां मंगवा लें तो फ्रेम फ़ाइनल करने आसान रहेंगे, और आख़िरी वक़्त की भागदौड़ से बचा जा सकेगा. मैंने संजय शर्मा से बात की तो उन्होंने कहा कि कुर्सियां तो आ सकती हैं, लेकिन ट्रैक्टर वाले को तो शाम को कुर्सियां और टेबल लाने के लिए बोला गया है. जहां हम थे वहां मोबाइल का सिगनल था नहीं.

मक्का और ज्वार खरगौन, बडवानी और झाबुआ के भील आदिवासियों के खाने में शामिल है.

संजय शर्मा को आइडिया आया कि हमारे पास एक ट्रक खड़ा है जो भोपाल से आया है. उसे ही कुर्सियां लाने को कह देते हैं,क्योंकि मुश्किल से पांच किलोमीटर की ही तो बात है. संजय शर्मा भोपाल से आए लाइट्समैन के इंचार्ज के पास गए, और उनसे पूछा कि क्या वो अपना ट्रक कुर्सी लेने भेज सकते हैं. लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया. उनका कहना था कि वो लोग थके हुए हैं क्योंकि रात भर सफ़र किया है और अभी सभी लड़कों को काम करना है. संजय शर्मा ने कहा कि जब तक कुर्सियां नहीं आएंगी तब तक तो लाइट्स लगेंगी नहीं. लेकिन उन्होंने साफ़-साफ़ कह दिया कि ट्रक नहीं जाएगा. संजय शर्मा को उसकी इस बेरुखी पर बहुत गुस्सा आया.

ख़ैर हमने किसी तरह से उसी गांव से एक ट्रैक्टर का इंतज़ाम कर कुर्सियां मंगवा लीं. क़रीब-क़रीब तीन बज चुके थे, और सभी भूख से बिलबिला रहे थे. हमारी टीम में क़रीब 15 लोग थे और उनके हिसाब से संजय शर्मा खाना सुबह ही पैक करवा कर लाए थे. शर्मा जी ने सभी को कहा कि खाने के लिए आ जाएं. हम एक छप्पर के नीचे बैठ गए. तभी भोपाल से आई टीम के इंचार्ज मेरे पास आए और बोले कि क्या आस-पास कोई ढाबा है. मैंने संजय शर्मा की तरफ़ देखा तो उन्होंने कहा, हां है, यहां से क़रीब 120 किलोमीटर खरगौन में.

भोपाल से आई टीम में 10 लोग थे. अब वो बड़ी दुविधा में हमारी तरफ़ देख रहे थे, उन्हें खाना मिलने की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी. काम रात को 10 बजे से पहले ख़त्म होने वाला नहीं था. इसके अलावा काम ख़त्म करने के बाद खरगौन पहुंचने कम से कम 3 घंटे लगने थे. यानि रात को भी खाना मिलने के चांस कम ही थे.

भोपाल टीम का यह इंचार्ज़ रुआंसा होकर अपने लोगों के पास चला गया. मैंने शर्मा जी से पूछा कि क्या किया जा सकता है. शर्मा जी उनसे काफ़ी नाराज़ थे. उन्हें इस बात का दुख नहीं था कि उन्होंने ट्रक देने से मना कर दिया, बल्कि जिस अंदाज़ में मना किया उससे वो बहुत नाराज़ थे. लेकिन शर्मा जी किसी को भूखा भी तो नहीं देख सकते थे. हमने तय किया कि जो भी खाना है सबके साथ बांट कर खाएंगे.

संजय शर्मा गए और भोपाल टीम को भी बुला लाए. उन्होंने पहले उन्हें खाना परोसा, और फिर हमें खाना दिया. मैं जानता था कि वो अपने लिए खाना नहीं बचाएंगे और दिन भर अपनी पुड़िया से तंबाकु खाते रहेंगे. मैंने अपनी टीम को यह बता दिया था. हमें जब खाना परोस दिया गया तो हमने देखा कि उन्होंने अपने लिए एक भी परांठा नहीं रखा है. हमने कहा हम सब तभी खाएंगे, जब संजय भी हमारे साथ ही खाना खाएंगे. हम लोगों की ज़िद पर शर्मा जी ने भी दो परांठे खाए.

शाम हुई और आस-पास के आदिवासी गांवों से ट्रैक्टरों में भर-भर कर आदवासी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए पहुंचने लगे. हम सोच रहे थे कि 150-200 लोग ही आएंगे. लेकिन धीरे-धीरे सभी कुर्सियां भर गईं. इसके अलावा भी लोग चारों तरफ़ बैठ गए. लगभग 2000 लोग हमारे इस कार्यक्रम में भाग लेने आए थे. पलायन और रोज़गार पर ज़ोरदार चर्चा हुई. क़रीब 10 बजे हमने अपना सामान पैक किया और गाड़ियों में लादा. इसके बाद खरगौन के लिए निकलने की तैयारी हुई.

हमारे पैकिंग के इंतज़ार में पास के ही गांव के एक आदिवासी नेता खड़े थे. जैसे ही हमारा सामान गाड़ियों में लदा, वो हमारे पास आए और बोले कि हमारे घर होते हुए खरगौन जाइएगा. मैंने उनसे कहा कि पहले ही काफ़ी देर हो चुकी है. उन्होंने कहा कि उनके घर तो हमें जाना ही पड़ेगा क्योंकि हमारे खाने का इंतज़ाम उन्होंने अपने घर पर किया है. मैंने उन्हें बताया कि हम तो कम से कम 25 लोग हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें पता है, और सभी 25 लोगों के खाने का इंतज़ाम किया गया है. दरअसल, जब हम कार्यक्रम में व्यस्त थे, उनकी संजय शर्मा से बातचीत हुई थी. उसमें उन्हें पता चला कि हमने रात के खाने का इंतज़ाम नहीं किया है. सो उन्होंने अपने घर पर ही हमारे खाने का इंतज़ाम करा दिया है.

हम जब इस भील आदिवासी के घर पहुंचे तो देखा कि यहां पर सिर्फ़ हमारे खाने का इंतज़ाम नहीं था. बल्कि उन्होंने अपने पूरे फ़ालिया यानि आदिवासी गांव को दावत पर बुला लिया था. मैंने उनकी तरफ़ देखा और पूछा कि क्या उनके यहां कोई समारोह हो रहा है. उन्होंने बहुत ही भोलेपन से कहा हां, आप आए हैं आदिवासियों की सुध लेने, यही हमारे लिए समारोह है.

हम सब ने टूट कर यहां पर मुर्गा और मक्के की रोटी चूर-चूर कर खाई. खाने से पहले पीने के शौकीनों के लिए भी बेहतरीन महुआ उपलब्ध थी.

रात को जब हम इस परिवार से विदा लेकर लौट रहे थे, तो भोपाल की टीम के कुछ लोग हमारी गाड़ी में थे तो हमारे कुछ लोग और सामान उनके ट्रक में. इस आदिवासी परिवार ने ऐसी सीख दी थी कि दिल्ली और भोपाल आपस में घुल मिल गए थे. अगले कई दिन तक इस टीम ने ऐसे मिल कर काम किया जैसे बरसों से साथ-साथ काम कर रहे हों.

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