लिटिल अंडमान के ओंग: दोस्ती के नाम पर धोखे से निपटा दी गई एक सभ्यता की कहानी

“पहले हम जंगली थे, अब हम इंसान बन गए हैं,” चौगोगी ने कहा. मैंने उनसे पूछा कि किसने आपको यह बताया कि आप पहले जंगली थे, और अब इंसान बन गए हैं? उन्होंने कहा, “पहले हम कपड़ा नहीं पहनता था, नंगा रहता था. अब हम लोग भी कपड़ा पहनता है.” जंगली, बर्बर या फिर असभ्य शब्द तो ओंगी भाषा में पाए ही नहीं जाते, ज़ाहिर है हमने ही उनके लिए ये शब्द बनाए हैं.

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पोर्ट ब्लेयर के गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल में एक ख़ास वार्ड है. इस वार्ड में जारवा और ओंग आदिवासियों के इलाज की व्यवस्था है. जारवा और ओंग आदिवासियों के बारे में कहा जाता है कि ये आदिवासी कम से कम 40 हज़ार साल से अंडमान के अलग-अलग द्वीपों पर रहते आए हैं. कई एंथ्रोपोलोजिस्ट दावा करते हैं कि ये आदिवासी अंडमान में कम से कम 70 हज़ार साल से रह रहे हैं. इन आदिवासियों के बारे में यह भी दावा किया जाता है कि ये अभी भी पाषाण युग (Stone Age) में रह रहे हैं. इन आदिवासियों के संरक्षण ने लिए सरकार ने कई क़ानून बनाए हैं. इन क़ानूनों के तहत आम नागरिकों को इनसे मिलने की इजाज़त नहीं है. अंडमान प्रशासन इन आदिवासियों को इलाज के लिए पोर्टब्लेयर लाता है तो इस ख़ास वार्ड में इन आदिवासियों का इलाज किया जाता है. जीबी पंत अस्पताल के इस वार्ड पर भी वही क़ानून लागू होता है जो जारवा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट या फिर लिटिल अंडमान पर होता है. ओंग आदिवासी लिटिल अंडमान में रहते हैं. इस क़ानून के लागू होने से यह वार्ड एक तरह से आरक्षित क्षेत्र (Reserved Area) की श्रेणी में ही आता है. इसलिए आम नागरिकों के साथ साथ इस वार्ड में वही डॉक्टर, नर्स या फिर मेडिकल स्टाफ़ प्रवेश कर सकता है जिसको यहां पर नियुक्त किया गया है. यह वार्ड आदिवासी स्वास्थ्य निदेशालय के तहत काम करता है.

स्पेशल वार्ड का कमरा नंबर 5 ओंगियों के लिए है

पोर्ट ब्लेयर से कोई 145 किलोमीटर दूर लिटिल अंडमान का ज़्यादातर हिस्सा समतल है, लेकिन द्वीप का उत्तरी हिस्सा 500 फीट तक ऊंचा भी है. इसी द्वीप पर रहती है ओंग आदिम जनजाति, जो शायद दुनिया की सबसे पहली आदिम जनजातियों में से एक है. हज़ारों साल से ये आदिम जनजाति लिटिल अंडमान द्वीप पर रहती आई है. शिकार की तलाश में मौसम के हिसाब से ये लोग अपने रहने की जहग बदलते रहते थे. लिटिल अंडमान के जंगलों में जंगली सूअर बड़ी मात्रा में थे. इसके अलावा कई तरह की मछली, समुद्री कछुए और डूगोंग जिसे समुद्री गाय भी कहा जाता है, ओंग जनजाति के खाने में शामिल था.  

प्रशासन की नाव से लिटिल अंडमान द्वीप लौटा ओंग परिवार

आदिवासी स्वास्थ्य निदेशालय के डॉक्टर अमिताभ डे के साथ हम जीबी पंत अस्पताल के ओंग वार्ड में पहुंचे. उस समय चौगोगी एक निक्कर पहने बरामदे में कुर्सी पर बैठे थे. हमें वहां देख कर उन्होंने कमीज़ भी पहन ली. कमरे में एक बेड पर एक ओंग लड़की एक बच्चे के साथ लेटी थी. बच्चा देखने में नवजात लग रहा था, जिसे एक कपड़े में लपेटा हुआ था और उसका सिर्फ़ चहरा नज़र आ रहा था. वार्ड की नर्स शांति लाकड़ा ने बताया कि चौगोगी अपने पूरे परिवार के साथ डूगोंग क्रीक से पोर्टब्लेयर आये हैं. उनकी बेटी के बच्चे को इलाज की ज़रूरत थी. उसका वज़न जन्म के समय बहुत कम था. चौगोगी की पत्नी, बेटी और दामाद, सभी अस्पताल में हैं.

अपने बच्चे के साथ चौगोगी की बेटी

चौगोगी बहुत अच्छी हिंदी बोल रहे थे. उनके साथ उनके परिवार के बारे में बातचीत शुरू हुई. उन्होंने बताया कि उनके परिवार में वो, उनकी पत्नी और दो बेटियां हैं. बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है और उसके बच्चे के इलाज के सिलसिले में ही वो पोर्ट ब्लेयर आए हैं. बातचीत के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए मैंने उनसे पूछा कि लिटिल अंडमान में ओंगियों के कितने परिवार हैं. वो सही-सही गिनती तो नहीं बता पाए, लेकिन कहा कि अब बहुत ही कम परिवार रह गए हैं. 

ओंगियों में शादी विवाह को लेकर बातचीत में उन्होंने कहा कि जब लड़का किसी लड़की को पसंद कर लेता है, और लड़की सहमति दे देती है तो शादी कर दी जाती है. पहले ओंगी अपने कुल या समूह से बाहर दूसरे कुल या समूह में शादी करते थे. लेकिन अब सीमा सिर्फ़ परिवार की है, समूह की नहीं. इससे पहले ओंगी चार समूहों में लिटिल अंडमान के अलग-अलग इलाक़ों में रहते थे. इन चारों ही समूहों में शादी होती थी. यानि कोई भी समूह अपने ही समूह में शादी नहीं करता था. लेकिन अब लिटिल अंडमान पर एक ही समूह बचा है.

चौगोगी बताते हैं कि ओंग समुदाय में शादी में कोई लंबी चौड़ी रस्म नहीं होती. जब कोई लड़का किसी लड़की को पसंद करता है और लड़की भी सहमत होती है तो लड़की को लड़के की गोद में बिठा दिया जाता है, और इस तरह से शादी संपन्न हो जाती है. 

जारवा वार्ड में चौगोगी

लेकिन ओंग आदिवासी जो हज़ारों सालों से अलग-थलग एक छोटे से द्वीप पर रहे थे, उन पर मुख्यधारा के संपर्क का असर नज़र आता है. और यह असर निश्चित तौर पर अच्छा नहीं है. चौगोगी से बातचीत में उन्होंने बताया कि आजकल लड़की के परिवार वाले शादी में लड़के के परिवार को कपड़े और सूटकेस जैसी चीज़ें गिफ़्ट करते हैं. यानि मुख्यधारा का समाज जिन प्रथाओं को खुद बुरा मानता है, उसी दहेज प्रथा को ओंग समुदाय को दे चुका है.

ग्रेट अंडमानी और ओंग जनजाति के लोगों से बाहरी दुनिया का सबसे लंबा संपर्क रहा है. इस संपर्क का असर इस जनजाति के जीने के अंदाज़, भाषा और संस्कृति सब पर पड़ा है. बातचीत में चौगोगी बताते हैं कि अभी भी ये लोग शिकार पर जाते तो हैं, लेकिन अब रोज़ नहीं जाते. उनके खाने में जंगली सूअर अभी भी सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है. इसके अलावा समुद्र में मछली भी मारते हैं, जिसे ये आदिवासी एक भाले से शिकार करते हैं. 

चौगोगी ने बताया कि उनकी पत्नी उम्र में उनसे कम से कम 10 साल बड़ी हैं. उन्होंने यह भी बताया कि लिटिल अंडमान में एक डिस्पेंसरी है और एक स्कूल भी है. लेकिन वो कहते हैं कि बच्चे स्कूल नहीं जाते, और टीचर स्कूल में टिकता ही नहीं है. 

चौगोगी से जब मैंने पूछा कि क्या अब उनके समुदाय के सभी लोग कपड़े पहनते हैं, तो वो हंसते हुए कहते हैं, “अब हम लोग भी आदमी बन गए हैं, पहले हम लोग जंगली थे. इसलिए कपड़े नहीं पहनते थे.” जब मैंने उनसे पूछा कि यह उन्हें किसने बताया कि जो लोग कपड़े नहीं पहनते वो जंगली होते हैं, इस पर वो हंसते हुए कहते हैं, “ मैंने तो यही सुना है.”

चौगोगी से बातचीत आगे बढ़ी तो मैंने उनसे पूछा कि क्या वो लोग कुछ काम काज भी करते हैं या पहले की तरह ही शिकार पर ही जाते हैं. उन्होंने बताया कि अंडमान प्रशासन उनको काम देता है. वो और उनके जैसे कुछ ओंग पुरुष नारियल जमा करने का काम करते हैं. इसके बदले में उन्हें पैसे मिलते हैं.

चौगोगी के दांतों से पता चल रहा था कि शायद वो पान खाते हैं. मैंने उनसे पूछ ही लिया कि क्या वो पान खाते हैं? उन्होंने हंसते हुए हां में जवाब दिया. उन्होंने बताया कि लिटिल अंडमान में हट बे बाज़ार है जहां पर पान की दुकान भी है, और वहीं से वो पान ख़रीदते हैं. वो आगे बताते हैं कि अब ओंग समुदाय के लोग चावल खाते हैं, जो उन्हें प्रशासन की तरफ़ से दिया जाता है. 

बातचीत में जब मैंने आगे उनसे पूछा कि क्या उन्होंने कभी दिल्ली के बारे में सुना है, तो वो ज़ोर से हंस दिए. उन्होंने लगभग मेरा मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि उन्होंने दिल्ली ज़मीन आसमान सबके बारे में सुना और देखा है. फिर उन्होंने बताया कि वो दिल्ली जा चुके हैं.

मेरे लिए यह बातचीत अब कई रहस्यों को खोल रही थी और कई सवालों के जवाब दे रही थी. उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें कुछ और ओंगियों के साथ 26 जनवरी को दिल्ली ले जाया गया था, जहां राष्ट्रपति भवन में उन्हें कई बड़े लोगों के सामने पेश किया गया. हांलाकि चौगोगी को यह याद नहीं आ रहा था कि उस समय भारत के राष्ट्रपति कौन थे. 

चौगोगी से बातचीत में वो बहुत साफ़ हिन्दी बोल रहे थे. उनके साथ यह बातचीत ख़त्म होते-होते मेरे लिए यह बात बिलकुल साफ़ हो चुकी थी कि अब वो आइसोलेशन में नहीं हैं. इसके साथ साथ यह भी समझ में आ गया था कि लिटिल अंडमान के ये आदिवासी जो हज़ारों साल तक बाक़ी दुनिया से अलथ-थलग रहे, अब उनका खान-पान और जीवनशैली पूरी तरह से बदल चुकी है. 

चौगोगी से बातचीत के बाद ओंग आदिवासियों और उनकी हालत के बारे में जीबी पंत के जारवा/ओंग वार्ड में तैनात नर्स, शांति लाकड़ा से लंबी बातचीत हुई. शांति लाकड़ा लंबे समय से इन आदिवासियों के साथ काम कर रही हैं. 

शांति लकड़ा जारवा और ओंग आदिवासियों के बीच लंबे समय से काम कर रही हैं

1976–77 में प्रशासन ने लिटिल अंडमान के ओंगियों के संरक्षण के लिए कई क़दम उठाये. इसी दौरान वहां एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी बनाया गया. शांति लाकड़ा ने बताया कि अब ओंगियों के  खाने पीने की आदत बदल रही है. सरकार इनको 1978 से ही फ्री राशन दे रही है, लेकिन उसके बावजूद वो शिकार पर जाते थे और सूअर और मछली ही खाते थे. लेकिन अब हालात कुछ और हैं. अब वो दाल-चावल ही ज़्यादा खाते हैं जो उन्हें मुफ़्त में मिलता है. अब वो सूअर का शिकार करने कम ही जाते हैं.

शांति कहती हैं कि ओंगी प्रशासन का दिया कुछ छोटा-मोटा काम करते हैं, वरना तो बस खाना बनाते हैं, और खाते हैं.

जीबी पंत अस्पताल से निकल कर मैं समीर आचार्य से मिला. समीर आचार्य सोसायटी फ़ॉर अंडमान एंड निकोबार इकोलॉजी (SANE) नाम की संस्था से जुड़े हैं. समीर आचार्य को अंडमान प्रशासन पसंद नहीं करता. दरअसल समीर आचार्य अंडमान के आदिवासियों पर प्रशासन की नीतियों के बड़े आलोचक रहे हैं. 

समीर आचार्य से ओगिंयों के बारे में जब मैंने बातचीत शुरू की तो सबसे पहले उन्होंने कहा कि हमें यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि ओंग समुदाय के साथ प्रशासन का संपर्क जारवाओं से बहुत पहले से है. वो कहते हैं कि ग्रेट अंडमानियों और ओगिंयों ने इस संपर्क में सबसे ज़्यादा नुकसान उठाया है.

समीर आचार्य लगातार अंडमान के आदिवासियों के मसले उठाते रहे हैं

वो कहते हैं “ग्रेट अंडमानी तो अब लगभग ख़त्म हो चुके हैं, लेकिन ओंगियों की भी हालत अच्छी नहीं है. पहले ओंगियों के चार ग्रुप होते थे. ये चारों ग्रुप आपस में शादी विवाह करते थे. लेकिन अब एक ग्रुप रह गया. अब हम उन्हें पेंशन देते हैं, क्योंकि उन्हें जो पैसा दिया जाता है उसके बदले में वो कुछ काम तो करते नहीं हैं, इसलिए wages तो नहीं कह सकते, कुल मिलाकर उनकी जीने की तमन्ना ख़त्म हो गई है.”

आचार्य कहते हैं कि अब ओंगियों के वजूद को बचाना लगभग नामुमकिन है, और कुछ सालों की बात है फिर ओंगियों का भी ग्रेट अंडमानियों की तरह ही वजूद ही मिट जाएगा.

अंडमान के आदिवासियों पर लंबे समय तक काम करने वालों में विश्वजीत पांड्या का नाम सबसे ज़्यादा आता है. वो एक जाने माने एंथ्रोपोलोजिस्ट हैं. हांलाकि पांड्या फ़िलहाल अहमदाबाद में धीरूभाई अंबानी इंस्टिट्यूट में फ़िल्म मेकिंग पढ़ाते हैं, लिटिल अंडमान के ओंगियों से उनका लंबा संपर्क रहा है. उन्होंने अपना अकादमिक काम भी ओंग समुदाय पर ही किया है. 

ओंगियों के बारे में विश्वजीत पांड्या से भी लंबी बातचीत हुई. पांड्या कहते हैं कि ओंग दरअसल एक दोराहे पर खड़े हैं. उनके लिए यह समझना मुश्किल है कि वो किधर जाएं. एक तरफ़ आधुनिक दुनिया है और दूसरी तरफ़ उनकी अपनी दुनिया.

पांड्या कहते हैं कि उनकी नज़र में ओंगियों के बारे में जो आम धारणा है कि वो आलसी लोग हो गए हैं सही नहीं है. वो कहते हैं कि ओंगियों को फ्री राशन की बजाए उन्हें काम देना होगा और उन्हें काम की आदत डालनी होगी. 

विश्वजीत पांड्या के ओंग जनजाति पर काम की पूरी दुनिया में तारीफ़ होती है

अंडमान के आदिवासियों पर लंबा और बहुत अहम काम करने वाले जाने-माने एंथ्रोपोलोजिस्ट ऑंस्टिन जस्टिन से भी मेरी मुलाक़ात हुई. ओंगियों के बारे में पूछे जाने पर जस्टिन कहते हैं कि ओंगियों के वजूद को बचाना अब शायद संभव ही नहीं है. “जारवाओं, सेंटिनली या फिर निकोबारियों में आप देखेंगे कि उन्हें अपनी सभ्यता और ज़मीन से प्यार है. वो किसी बाहरी दख़ल को बर्दाश्त नहीं करते. लेकिन ओंगियों में अब ऐसा नहीं है. उनमें जीने को लेकर या अपने समुदाय के भविष्य को लेकर कोई उत्साह नहीं मिलता है.” जस्टिन कहते हैं कि ओंगियों के साथ बाहरी लोगों के संपर्क और प्रशासन की नीतियों ने उन्हें बर्बाद कर दिया है.

ओंग आदिवासियों से मेरी मुलाक़ात डॉक्टर अमिताभ डे की बदौलत ही संभव हो पाई. उनसे भी अंडमान के अलग-अलग आदिवासी समुदायों को लेकर मेरी लंबी बातचीत हुई. उनसे मेरी यह बातचीत पोर्ट ब्लेयर में उनके ऑफ़िस में हुई थी. अमिताभ डे बातचीत में कहते हैं कि स्वास्थ के लिहाज़ से अभी तक का अनुभव भी यही बताता है कि जिन आदिम जनजातियों को उनके अपने अंदाज़ में जीने के लिये छोड़ दिया गया, वहां परिणाम बेहतर हुए हैं. 

डॉक्टर अमिताभ डे

डॉक्टर डे कहते हैं, “आदिम जनजातियों को एक स्थान पर बसाना एक नीतिगत विषय है जिस पर विशेषज्ञ राय दे सकते हैं, लेकिन हमारा अनुभव ये है कि जो आदिम जनजाति अपने अंदाज़ में जी रहे हैं वो ज़्यादा स्वस्थ हैं.”

अमिताभ डे कहते हैं कि ओंगी शराब और तंबाकू के आदि हो गए हैं. ज़ाहिर है यह नशा लिटिल अंडमान में बाहर से ही पहुंचा है.

डॉक्टर डे  ओंगियों के बारे में कहते हैं, “ये देखा गया है कि जो आदिम जनजाति अब स्थाई बस्तियों में बसा दिये गये हैं, उनमें पहले बहुत ही साधारण बिमारी मिलती थीं जैसे पेचिश, खांसी, ज़ुखाम, लेकिन उन्हें जब बसा दिया गया तो अब उनमे फेफ़ड़ों की बिमारी, दिल की बिमारी और कई और गंभीर रोग मिल रहे हैं.”

ओंग जनजाति ने लंबे समय तक अपनी ताक़त और आक्रामकता से बाहरी दुनिया के संपर्क से खुद को बचा कर रखा. 1888 में नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के निदेशक डॉक्टर फ्लॉवर ने ओंग जनजाति के बारे में कहा “ ये अद्भुत नज़र आता है कि 1880 तक लिटिल अंडमान दुनिया कि किसी भी दूसरी सभ्यता के संपर्क में नहीं आया. यहां के मूल निवासी यहां पर हज़ारों सालों से रह रहे हैं, और दुनिया में किसी से भी उनका कोई संपर्क नहीं था. कभी कभार डूबते समुद्री जहाज़ से जान बचाने के लिये कुछ लोग इस द्वीप पर ज़रूर गये, लेकिन वो ओंगियों के हाथों मारे गये.“

1931 की जनगणना से ओंग जनजाति की घटती संख्या पर एक अहम जानकारी मिलती है. इस जानकारी के हिसाब से, “1867 आसाम वैली नाम के एक जहाज़ से कैप्टन और उसके 6 साथी लिटिल अंडमान आइलैंड पर पानी की तलाश में पहुंचे. लेकिन ये टीम कभी वापस नहीं आई. इस दल की तलाश के लिए होम फ्रे के नेतृत्व में एक और टीम भेजी गई. लेकिन ओंग जनजाति के लोगों ने इन्हें अपने इलाके में नहीं घुसने दिया. आख़िर में आईसीएस अराकान को ओंग जनजाति को सबक सिखाने के लिये भेजा गया. इस अभियान में कम से कम 70 ओंग मारे गए. 1878 तक कई ऐसे अभियान चलाए गए जिनमें बड़ी तादाद में ओंग जनजाति के लोगों की हत्या हुई.”

ओंग जनजाति के साथ संपर्क स्थापित करने में अंग्रेज़ों को 1885 में पहली बड़ी सफलता मिली जब 24 आदिवासियों को पकड़ लिया गया. इन्हें जारवा समझकर पकड़ा गया था, लेकिन बाद में पता चला कि वो ओंग जनजाति से हैं और कछुओं के अंडों की तलाश में लिटिल अंडमान से निकले थे. इनमें से 11 आदिवासियों को पोर्ट ब्लेयर लाया गया, और बाक़ी को छोड़ दिया गया. अध्ययन बताते हैं कि ओंग जनजाति और ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोग सबसे पहले बाहरी दुनिया के संपर्क में आए और इसका सबसे ज़्यादा नुकसान भी इन्हीं को झेलना पड़ा.  

1901 की जनगणना में ओंग जनजाति की जनसंख्या का अनुमान 672 बताया गया, उसके बाद 1911 में ये जनसंख्या 631 रह गई. 1921 में ये जनसंख्या घट कर 346 हो गई, और 1931 में कुल 250 ओंगी बचे. इसके बाद 1951 में 150, 1961 में 129, 1971 में 112, 1984 में 102, और 1987 में ओंग जनजाति की तादाद पहली बार सौ से भी कम रह गई, और इनकी जनसंख्या 98 दर्ज की गई.

1901 से 1931 के बीच ओंग जनजाति की जनसंख्या में क़रीब 63 प्रतिशत की कमी आयी. 2011 की जनगणना में ओंगियों की तादाद 118 बतायी गई है. 

ओंग आबादी में गिरावट या ठहराव के बारे में डॉक्टर अमिताभ डे कहते हैं, “ओंग और ग्रेट अंडमानी की जनसंख्या में एक ठहराव आया है, इनब्रीडिंग (inbreeding) भी एक वजह है. और भी कई वजह हैं लेकिन इसको लेकर हमें डर लगता है.”

फ़रवरी 2004 में ग्रेट अंडमानियों की भाषा बोलने वाली बो का निधन हो गया. बो अपने समुदाय की आख़िरी महिला थीं जो अपनी भाषा बोल सकती थीं. जब उनकी मृत्यु हुई तो उस समय दुनिया भर के मीडिया में कई लेख लिखे गए. इस बात पर चिंता प्रकट की गई कि एक भाषा और उसके साथ साथ एक सभ्यता के इतिहास का लोप हो गया. 

लेकिन दूसरी तरफ़ लिटिल अंडमान की ओंग जनजाति के वजूद को बचाने पर अब बहस भी नहीं हो रही है. पोर्ट ब्लेयर और निकोबार में कई लोगों से इन आदिवासियों के बारे में बातचीत हुई. लेकिन अफ़सोस कि किसी ने भी यह उम्मीद नहीं दिखाई कि ओंगियों को बचाया जा सकता है.   

आदिवासियों को मुख्यधारा में शामिल करने के नाम पर उनके घर में घुसी आधुनिक दुनिया हाथ पर हाथ धरे अब उनके निपट जाने का इंतज़ार कर रही है. 

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