निशी आदिवासियों से मिलिए, कस्टमरी लॉ और बदलाव की कश्मकश क्या है

अरुणाचल प्रदेश के ज़्यादातर समुदाय आज भी अपने कस्टमरी लॉ से चलते हैं. यानि ये समुदाय परंपरागत सामाजिक मान्यताओं और नियमों से ही बंधे है. निशी समुदाय की औरतों से बातचीत में मुझे ऐसा लगा की औरतों के मन में इन कस्टमरी क़ानूनों को लेकर एक कसमसाहट है, एक बैचेनी है. ख़ासतौर से शादी के मसले में कई औरतों ने मुझे कहा कि अब निशी समुदाय को सोचना चाहिए कि आज के ज़माने में शादी से जुड़े कस्टमरी लॉ कितने प्रासंगिक हैं.

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अरुणाचल प्रदेश के आदिवासियों (indigenous people) से मिलने मैं अपनी टीम के साथ ईटानगर पहुंचा. दिल्ली से कुछ रिसर्च के साथ-साथ एक मैप भी तैयार किया था कि किन-किन इलाक़ों में जाना है.

कुल मिलाकर क़रीब 15 दिन का समय लेकर चला था. ईटानगर पहुंचा तो पता चला हमारी ‘प्रिंसेस’ लीज़ा भी ईटानगर में ही अपने घर आई हुई हैं. लीज़ा एक बड़े राजनीतिक परिवार से आती हैं और राज्यसभा टीवी में हमारे साथ काम करती थीं.

मैं उन्हे ‘प्रिंसेस’ कहता हूं. लेकिन सच ये है कि अरुणाचल प्रदेश के एक बेहद प्रभावशाली परिवार से आने वाली लीज़ा बेहद ख़ूबसूरत इंसान है. जब वो आपके साथ काम करती है या मिलती है, तो उनके परिवार के रुतबे का आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते. 

ख़ैर मैंने लीज़ा को फ़ोन किया और अपने ईटानगर में होने की ख़बर दी. मैंने उन्हें अपने ईटानगर आने का मक़सद और प्लान भी बताया. उन्होंने मुझे शाम को अपने घर बुला लिया और साथ ही कहा कि वो कोशिश करेंगी कि कुछ ऐसे लोगों को बुलाया जा सके जो अरुणाचल प्रदेश के समुदायों के बारे में मुझे कुछ जानकारी दे सकें. 

निशी समुदाय और प्रशासन के बीच कड़ी का काम करते हैं गांव बूढ़ा

शाम को लीज़ा के घर पर कई लोगों से मुलाक़ात हुई. इन लोगों में किम, बिकास बागे, मेपुंग तादर के अलावा कुछ और लोग भी शामिल थे.

अरुणाचल प्रदेश में घूमने के मेरे प्लान और मैप के बारे में जब मैंने इन लोगों को बताया तो उन्होंने कहा कि किसी भी सूरत में 15 दिन में मैं अरुणाचल प्रदेश के ये सारे इलाक़े नहीं घूम सकता.

कुल मिलाकर इस मुलाक़ात में मेरा पूरा प्लान पलट गया था. काफ़ी लंबी बातचीत हुई, और अच्छी बात ये थी कि ये सभी लोग अरुणाचल प्रेदश के अलग-अलग समुदाय से थे.

इसलिए इन समुदायों पर भी विस्तार से बातचीत हुई. इस मुलाक़ात में तय यह हुआ कि इस टूर में मैं येज़ाली, ज़ीरो होते हुए दापोरीजो तक जाऊंगा. इस दौरान मैं निशी, आपातानी और तागीन समुदाय के लोगों से मिल सकता हूं.

अगले दिन सुबह निकलने का प्लान बना. ज़ीरो वैली तक किम और उनके एक ऐडवोकेट दोस्त मेरे साथ रहने वाले थे. इसके साथ ही तागीन समुदाय के एक प्रभावशाली व्यक्ति से भी बातचीत करके उनसे मेरी मुलाक़ात तय करा दी गई. लेकिन इस सफ़र में सबसे पहले निशी समुदाय से मिलना तय हुआ.

इसकी 2-3 वजहें थीं. पहली वजह की निशी समुदाय के त्यौहार न्योकुम की तैयारी चल रही थीं, हमें न्योकुम की झलक मिल सकती थी. दूसरी, येज़ाली हमारे रास्ते में सबसे पहले पड़ेगा, और तीसरी, निशी समुदाय का राजनीतिक प्रभाव अरुणाचल प्रदेश में सबसे माना जाता है.

निशी समुदाय का राजनीति और प्रशासन में दबदबा

आबादी के लिहाज़ से भी निशी अरुणाचल प्रदेश का सबसे बड़ा आदिवासी समूह है. क़रीब ढाई लाख आबादी वाले इस समूह का राजनीतिक प्रभाव तो ज़्यादा है ही, इस समुदाय ने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में भी अपनी जगह बनाई है. 

ईटानगर में महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष, मेपुंग तादर से मुलाक़ात में उन्होंने बताया था कि निशी समुदाय की साक्षरता दर बढ़ने से सरकारी तंत्र में इनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ा है. निशी समुदाय से आज कई आईएएस अफ़सर हैं. राज्य की पहली महिला आईएएस अफ़सर भी इसी समुदाय से है. 

येज़ाली में एक निशी आदिवासी

2008 तक निशी समुदाय को डाफ़ला नाम से जाना जाता था. यह नाम इस जनजाति को अंग्रेज़ों ने दिया था, लेकिन डाफ़ला नाम इनके लिए अपमानजनक संबोधन था. लंबे समय की मांग के बाद 2008 में संसद ने एक क़ानून पास किया, और अब इस जनजाति को निशी नाम से ही जाना जाता है.

निशी आदिवासी समुदाय केमिंग और सुबनसिरि नदी के बीच अरुणाचल प्रदेश के क़रीब सात ज़िलों में फैला है.

येज़ाली में देवी मुल्गी और बैंग्या ताकर से मुलाक़ात

अपने प्लान के मुताबिक़ हम किम के साथ लोअर सुबनसिरि ज़िले के एक छोटे से क़स्बे, येज़ाली पहुंचे. यहां के ज़्यादातर लोगों ने आधुनिक जीवनशैली को अपना लिया है, लेकिन कुछ अभी भी अपनी परंपरा को बनाए रखने की कोशिश करते हैं. आधुनिक कपड़े पहने लोगों के बीच आज भी परंपरागत टोपी पहने लोग दिख जाते हैं.

येज़ाली में किम ने हमारी मुलाक़ात निशी समुदाय के एक नौजवान दंपत्ति, देवी मुल्गी और बैंग्या ताकर से करा दी, और वो ख़ुद ज़ीरो वैली चले गए, जहां हमें अगले दिन पहुंचना था. देवी मुल्गी और बैंग्या ताकर ने हमें अपने घर आने का न्यौता दिया. 

देवी मुल्गी और बैंग्या ताकर

दोनों ने राज्य के बाहर रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की है, बैंग्या ने ईटानगर में और देवी ने बेंगलूरु में. लेकिन अब दोनों ने येज़ाली में अपना घर बसाया है. इनके घर में निशी सामाज के सभी प्रतीक मौजूद तो हैं, लेकिन इनकी जीवनशैली अब पूरी तरह से आधुनिक हो चुकी है. फिर भी बाक़ी लोगों की तरह ही दोनों आदिवासी परंपरा से ज़्यादा दूर नहीं हैं. 

निशी समाज में अभी भी अपने ही समुदाय में शादी विवाह होते हैं. लेकिन अब प्रेम विवाह भी स्वीकार्य हो रहे हैं. देवी और बैंग्या ने भी पहले एक-दूसरे को पसंद किया, फिर परिवार में शादी की बात चलाई.

महिलाएं ही बनाती हैं ओपो (शराब)

निशी समुदाय के हर धार्मिक और सामाजिक कार्य में ओपो यानि देसी शराब का इस्तेमाल अनिवार्य है. अपने देवताओं, पूर्वजों की आत्माओं से लेकर अपने मेहमानों के अनिवार्य तौर पर ओपो परोसी जाती है.

हम एक निशी घर में मेहमान थे, तो ज़ाहिर है हमारे स्वागत में भी ओपो परोसी गई. दरअसल हमें जो ओपो परोसी गई वो हमारे साथ बातचीत करते हुए देवी ने तैयार की.

जब मैंने बैंग्या से पूछा की क्या वो भी ओपो बना सकते हैं, तो देवी ने दिलचस्प जवाब दिया. उन्होंने बताया कि सिर्फ़ औरतें ही ओपो बना सकती हैं, क्योंकि माना जाता है कि अगर आदमी ओपो बनाएगा तो अगली बार शिकार पर जाने पर उसे शिकार नहीं मिलेगा. ये बात अलग है कि अब कोई शिकार पर जाता ही नहीं. 

निशी समुदाय के कस्टमरी लॉ और बहुविवाह

निशी आदिवासी समुदाय की बड़ी आबादी अभी भी दूर दराज़ के गांवों में रहती है, और शायद यही वजह है कि बाहरी दुनिया से उनका संपर्क देर से हुआ.

लेकिन इस समुदाय ने शिक्षा की अहमियत को समझा, और इनके 63.1 प्रतिशत लोग पढ़े-लिखे हैं. निशी समाज के ऐसे लोग संगठित भी हुए जिन्हें पढ़ाई लिखाई का मौक़ा मिला, और इन लोगों ने आगे बढ़कर अपने समुदाय में शिक्षा पर ध्यान भी दिया.

अरुणाचल प्रदेश के ज़्यादातर समुदाय आज भी अपने कस्टमरी लॉ से चलते हैं. यानि ये समुदाय परंपरागत सामाजिक मान्यताओं और नियमों से ही बंधे है.

निशी समुदाय की औरतों से बातचीत में मुझे ऐसा लगा की औरतों के मन में इन कस्टमरी क़ानूनों को लेकर एक कसमसाहट है, एक बैचेनी है. ख़ासतौर से शादी के मसले में कई औरतों ने मुझे कहा कि अब निशी समुदाय को सोचना चाहिए कि आज के ज़माने में शादी से जुड़े कस्टमरी लॉ कितने प्रासंगिक हैं. 

बैंग्या तोलम निशी समुदाय के नेता

दरअसल, आज भी निशी समाज में पुरूषों को बहुविवाह की अनुमित है. लेकिन इस समुदाय में औरत सिर्फ़ एक ही शादी कर सकती है.

एक बार शादी के बाद औरत इस शादी से बाहर नहीं आ सकती क्योंकि औरतों को तलाक़ लेने का अधिकार हासिल नहीं है.

अगर निशी पुरुष दूसरी या तीसरी या उससे भी ज़्यादा शादियां कर ले, इनमें से किसी भी औरत को उस पुरुष से शादी तोड़ने का अधिकार नहीं है. 

मेपुंग तादर जो अरुणाचल प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष रही हैं, इस मसले पर काफ़ी खुल कर बोलती हैं. वो कहती हैं कि आज जब निशी समुदाय ने आधुनिकता को इतने आगे बढ़ कर अपनाया है, तो महिलाओं के अधिकारों पर भी चर्चा होनी चाहिए. वो कहती हैं कि कम से कम महिलाओं को शादी में परेशानी आने पर इस रिश्ते से बाहर आने का रास्ता दिया जाना चाहिए. 

जब देवी से बातचीत में मैंने पूछा कि क्या वो अपने पति को दूसरी शादी की इजाज़त देंगी, तो वो हंसते हुए कहती हैं कभी नहीं. फिर वो संजीदा होते हुए कहती हैं कि इस मसले पर अब चर्चा शुरू हो रही है. लेकिन इस चर्चा को निशी समुदाय के संगठन बहुत प्रोत्साहित नहीं करते हैं.

निशी समुदाय का मज़बूत संगठन

निशी समुदाय अपनी संस्कृति, परंपराओं और सवैंधानिक अधिकारों को लेकर काफ़ी सजग है. 1990 में निशी इलीट सोसायटी नाम का संगठन बनाया गया था.

इस संगठन में उस समय इस समुदाय के ग्रेज्युएट पुरुष शामिल होते थे. लेकिन अब यह संगठन ग्रासरूट तक जा चुका है. संगठन के सचिव बैंग्या तोलम ने हमें बताया कि अब हर निशी परिवार इस संगठन का हिस्सा है.

यह संगठन समुदाय से जुड़े सांस्कृतिक, सामाजिक और क़ानूनी फ़ैसले करता है. लेकिन इस संगठन में भी महिलाएं फैसले लेने में शामिल नहीं हैं. 

बैंग्या तोलम कहते हैं, “हम आधुनिकता के ख़िलाफ़ नहीं हैं. आज हमारी जीवनशैली पूरी तरह से आधुनिक हो चुकी है. लेकिन हमारी परंपराओं के साथ आधुनिकता का तालमेल बनाया गया है.” 

न्योकुम त्यौहार

येज़ाली में हमें निशी आदिवासियों के सबसे बड़े त्यौहार – न्योकुम – को देखने का मौक़ा भी मिला. न्योकुम दरअसल दो शब्दों से मिलकर बना है – न्यो माने धरती और कुम माने लोग यानि धरती के लोग.

न्योकुम में निशी समुदाय की महिलाएं नाचती हैं, और इस त्यौहार पर जो गीत गाए जाते हैं, उनका आमतौर पर मतलब होता है ज़िंदगी का उत्सव. ये त्यौहार चार दिन चलता है, और हर दिन अलग-अलग रस्म होती है.

न्योकुम में नाचती निशी महिलाएं

येज़ाली में न्योकुम की तैयारी में स्वागत द्वार बनाए गए थे, और यहां के खेल के मैदान में एक मंच बना था. मैदान में एक परंपरागत निशी गांव भी बनाया गया था.

आमतौर पर निशी घर बांस के सहारे बनाए गए मचान पर खड़े होते हैं, और घर काफ़ी लंबे होते हैं. घरों के बाहर बैठने की जगह होती है. घरों पर पत्तों और बांस से बने छप्पर होते हैं.

निशी जनजाति के गांवों को देखकर पहली नज़र में ही ये समझ आ जाता है कि बांस इन आदिवासियों की ज़िंदगी के लगभग हर पहलू से जुड़ा है. इनके घर अब भी बांस के ही बनते हैं, छोटी-मोटी नदियों पर बांस का ही पुल बना दिखता है, और त्यौहारों पर सजावट भी बांस से बने उत्पादों से ही होती है.

इनके औज़ारों और हथियारों में भी बांस का प्रयोग देखने को मिलता है. येज़ाली के बीचों-बीच बहती छोटी सी नदी पर बांस की एक बाड़ लगाकर मछली पकड़ने का ट्रैप बनाया गया है, जो नदी को साफ़ भी रखता है.

न्योकुम में निशी समुदाय मिथुन (सांड) की बलि देते हैं. इसके लिए निशी समुदाय के धार्मिक गुरू की देख रेख में पूरी प्रक्रिया चलती है. निशी समुदाय की परंपरा के अनुसार मिथुन की बलि के बाद अगले चार दिन तक लोग जंगल में शिकार के लिए नहीं जाते थे.

इसके अलावा खेती किसानी का काम भी चार दिन बंद रहता था. हांलाकि आज के दौर में न्योकुम एक बड़े सामाजिक उत्सव या इवेंट के तौर पर मनाया जाता है. आजकल ईटानगर से लेकर ज़िला मुख्यालयों तक न्योकुम के बड़े बड़े आयोजन होते हैं. 

निशी समुदाय आज लगभग हर मायने में एक आधुनिक और संगठित समाज नज़र आता है. इस समाज ने देश में लागू पंचायत व्यवस्था को भी बिना हिचक अपनाया है.

वहीं दूसरी तरफ़ निशी समुदाय ने जहां आधुनिकता को तेज़ी से अपनाया है, वहीं दूसरी तरफ़ समाज के कस्टमरी लॉ हैं जो अभी भी काफ़ी सख़्ती से लागू होते हैं.

बेशक निशी समुदाय में फ़ैसले लेने वाली संस्थाओं या प्रक्रिया में महिलाओं की हिस्सेदारी पर सवाल उठाया जा सकता है. इसके अलावा भी धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था में भी महिलाओं की स्थिति पर चर्चा और आलोचना हो सकती है.

लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल भी नहीं है कि यहां महिलाओं पर ज़ुल्म हो रहा है. ये सवाल एक आधुनिक दुनिया और उसके मूल्यों के संदर्भ में जायज़ हैं. लेकिन देश के अन्य राज्यों या समुदायों की तुलना में निशी महिलाओं की स्थिति हर सूरत में बेहतर कही जा सकती है.

निशी महिलाओं में पोषण से लेकर उनके ख़िलाफ़ हिंसा के मामले में इस समुदाय की महिलाओं की स्थिति काफ़ी अच्छी है. ख़ासतौर से उत्तर भारत के राज्यों में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की तुलना में तो यह फ़र्क ज़मीन आसमान का नज़र आएगा.

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