छत्तीसगढ़ के कोयलीबेड़ा क्षेत्र के 68 गाँव चाहते हैं ज़िला बदला जाए, अंतागढ़ में धरना

सिकसोड़ गाँव के सरपंच लछू गावड़े का कहना था,”नारायणपुर कोयिलीबेड़ा से सिर्फ़ 50 किलोमीटर दूर है. जबकि कांकेर 150 किलोमीटर दूर पड़ता है. छोटे-मोटे काम के लिए ज़िला मुख्यालय जाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती है. इसमें काफ़ी टाइम और पैसा लगता है.”

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छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल कांकेर जिले की अंतागढ़ तहसील में आज ग्रामीणों ने धरना प्रदर्शन किया. प्रदर्शन करने वाले लोग कोयलीबेड़ा क्षेत्र के गाँवों से धरना प्रदर्शन में शामिल होने आए थे.

इन ग्रामीणों की मांग है कि 18 पंचायतों के 68 गांवों को नारायणपुर जिला में शामिल किया जाये.

 इन आदिवासियों का कहना है कि कोयलीबेड़ा से कांकेर जिला मुख्यालय करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर है. जबकि नारायणपुर जिला मुख्यालय की दूरी महज 65 किलोमीटर है.

नारायणपुर जिले में शामिल होने से यहां के लोगों को जिला मुख्यालय आने जाने का खर्च कम पड़ेगा. इसके साथ ही ग्रामीणों के समय की बचत होगी.

धरने में शामिल लोगों का कहना था कि गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले स्थानीय आदिवासी परिवार अपने छोटे छोटे कामों के लिए कांकेर तक नहीं पहुंच पाते हैं. 

ग्रामीणों की तरफ़ से दिया गया ज्ञापन

धरने में शामिल सनकु उसेंडी का कहना था, “कोयिलीबेड़ा में जो ब्लॉक मुख्यालय था उसको भी अंतागढ़ में ले गए, जो एकलव्य स्कूल था वो भी अंतागढ़ में ले गए, इस तरह के कई मसले हैं. अगर नारायणपुर में हमारे गाँव शामिल होते हैं तो हमें कुछ आसानी तो ही ही जाएगी.” 

सिकसोड़ गाँव के सरपंच लछू गावड़े का कहना था,”नारायणपुर कोयिलीबेड़ा से सिर्फ़ 50 किलोमीटर दूर है. जबकि कांकेर 150 किलोमीटर दूर पड़ता है. छोटे-मोटे काम के लिए ज़िला मुख्यालय जाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती है. इसमें काफ़ी टाइम और पैसा लगता है.”

धरने में शामिल एक सामाजिक कार्यकर्ता मोहन हुपेंडी ने बताया कि ये 68 गाँव के लोग अभी भी अपनी ज़रूरतों के लिए नारायणपुर ही जाते हैं. लेकिन प्रशासनिक काम के लिए कांकेर ही जाना पड़ता है.

कांकेर हमारे गाँवों से बहुत दूर है. प्रशासन को हमारी इस माँग को मान लेना चाहिए, क्योंकि इससे आम आदिवासी को मदद मिलेगी.

धरना प्रदर्शन कर रहें ग्रामीणों ने नारायणपुर जिला में शामिल होने के अनेक फायदे गिनाए. पिछड़ा क्षेत्र होने के कारण कोयलीबेड़ा इलाके में आज तक आदिवासी बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए एक कॉलेज तक नहीं खोला गया है. अंदरूनी गांवों में हालत और भी खराब है.

बरसात के दिनों में ज्यादातर गांव अलग थलग हो जाता है. धरने में शामिल लोगों का कहना था कि उन्होंने यह सांकेतिक धरना दिया है. अगर सरकार उनके इस धरने का संज्ञान नहीं लेती है तो आगे बड़ा आंदोलन करेंगे.

ग्रामीणों ने राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन भी दिया है जिसमें अपनी माँगो को सूचिबद्ध किया है. 

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