आंध्र प्रदेश: ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में कोविड की मार, जूझने के लिए प्रशासन है तैयार

पिछले साल वायरस का प्रसार काफी हद तक नरसीपट्टनम और अनकापल्ले (ग्रामीण) मंडलों तक सीमित था. लेकिन इस बार, एजेंसी क्षेत्रों (ITDA) से भी बड़ी संख्या में मामले सामने आ रहे हैं.

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आंध्र प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में पिछले साल की तुलना में COVID-19 महामारी की दूसरी लहर का असर ज़्यादा दिख रहा है.

पिछले साल वायरस का प्रसार काफी हद तक नरसीपट्टनम और अनकापल्ले (ग्रामीण) मंडलों तक सीमित था. लेकिन इस बार, एजेंसी क्षेत्रों (ITDA) से भी बड़ी संख्या में मामले सामने आ रहे हैं.

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने पिछले साल ही कहा था कि ग्रामीण क्षेत्रों में वायरस का प्रसार अगली बड़ी चिंता हो सकती है.

फ़ीवर सर्वेक्षण की अहमियत

आईटीडीए परियोजना अधिकारी एस वेंकटेश्वर ने मीडिया को बताया कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में महामारी से निपटने के लिए बुखार सर्वेक्षण (Fever Survey) है.

आईटीडीए सर्वेक्षण के आठ दौर पूरे कर चुका है, और नौवां दौर चल रहा है. सर्वेक्षण का हर दौर आशा वर्करों द्वारा तीन दिन के लिए किया जाता है. इस सर्वेक्षण की मदद से लोकविड लक्षणों वाले लोगों को समुदाय से अलग किया जा सकता है.

स्थानीय लोगों की पहल

स्थानीय सरपंचों और युवाओं के प्रयासों की भी सराहना की जा रही है, जो ग्रामीण और एजेंसी क्षेत्रों के कई हिस्सों में खुद ही आइसोलेशन सेंटर शुरू कर रहे हैं.

बुखार सर्वेक्षण के दौरान लक्षणों वाले व्यक्ति की पहचान होते ही घर में आइसोलेशन का प्रावधान न होने पर उसे आइसोलेशन सेंटर ले जाया जाता है. एक बार भर्ती होने के बाद, उनका रैपिड एंटीजन टेस्ट किया जाता है. ज़रूरत पड़ने पर पास के सीएचसी (CHC) के ट्रुनैट केंद्रों में स्वैब भेजे जाते हैं.

अस्पताल का रोल

जब कोई कोविड पॉज़िटिव पाया जाता है तो लक्षणों की तीव्रता के हिसाब से उसका इलजा किया जाता है. कम तीव्रता वाले लोगों को एक आइसोलेशन किट दी जाती है, और जिन्हें अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है उन्हें वहां भेज दिया जाता है.

ग्रामीण क्षेत्रों में 15-15 बेड वाले 11 सीएचसी हैं. कुछ बेड बी- या डी-टाइप ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए अनुकूल हैं.

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