MP में 6 महीने के भीतर आदिवासियों के लिए दूसरा मेगा इवेंट, पहले मोदी और अब अमित शाह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद अमित शाह बीजेपी के दूसरे ऐसे बड़े नेता है जो मध्य प्रदेश में आदिवासी वर्ग के लिए आयोजित होने वाले किसी बड़े कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं. शाह के इस दौरे को आदिवासियों को 2023 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर लुभाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

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भोपाल के जंबूरी मैदान में आदिवासियों के लिए आज बीजेपी का 6 महीने में दूसरा मेगा इवेंट होने जा रहा है. इस इवेंट में बीजेपी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद सबसे महत्वपूर्ण नेता अमित शाह पहुंच रहे हैं. 

इससे पहले 15 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आदिवासियों के सम्मेलन में पहुंचे थे. इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मध्य प्रदेश में बीजेपी आदिवासियों के बीच अपना असर बढ़ाने के लिए कितना ज़ोर लगा रही है. 

 122 करोड़ रुपए बोनस बांटने का दावा

मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से बताया गया है कि आज राज्य के कम से कम 35 लाख तेंदु पत्ता जमा करने वालों के लिए कई बड़ी घोषणाएं की जाएंगी. सबसे प्रमुख घोषणा 827 वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में बदलने की होगी. 

इसके अलावा तेंदूपत्ता संग्राहक और टिंबर, बांस के उत्पादन पर 122 करोड़ रुपए के बोनस बांटे जाने का भी दावा किया गया है. यह दावा किया गया है कि इस कार्यक्रम में कम से कम एक लाख आदिवासी मौजूद होंगे. 

आदिवासी वोटबैंक पर बीजेपी की नजर 

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद अमित शाह बीजेपी के दूसरे ऐसे बड़े नेता है जो मध्य प्रदेश में आदिवासी वर्ग के लिए आयोजित होने वाले किसी बड़े कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं. शाह के इस दौरे को आदिवासियों को 2023 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर लुभाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. 

जिसकी कई वजह हैं. क्योंकि मध्य प्रदेश में 2 करोड़ से ज्यादा आदिवासी आबादी है, 43 आदिवासी समुदाय राज्य की 230 विधानसभा सीटों में से 87 विधानसभा सीटों पर सीधा असर डालता है. जिनमें से 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं. 

अमित शाह के कौशल से आदिवासी को साधने का प्रयास

प्रदेश के आदिवासी मतदाताओं को लुभाने के लिए अमित शाह का यह दौरा 2023 विधानसभा चुनाव के लिहाज से बीजेपी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है. प्रदेश के मालवा-निमाड़, महाकौशल और विंध्य ऐसे अंचल हैं, जहां आदिवासियों की तादाद काफी ज्यादा है. 

यह माना जाता है कि चुनाव में आदिवासी वोट जिस पार्टी को मिलता है उसका सत्ता पर पहुंचना तय हो जाता है. 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी समुदायों ने बीजेपी को जमकर वोट किया और बीजेपी ने 87 सीटों में से 59 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए बंपर बहुमत से सत्ता में वापसी की थी. 

लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में यह वर्ग भाजपा से छिटकता नजर आया और पार्टी को इन 87 में से सिर्फ 34 सीटों पर जीत मिली थी.  इन हालात में पार्टी अब आदिवासी वोट बैंक को साधने की रणनीति पर काम कर रही है. 

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अमित शाह अपने इस दौरे से आदिवासियों को पार्टी से जोड़ने के अभियान में जान फूंकने की कोशिश करेंगे. यानी पीएम मोदी के बाद अमित शाह आदिवासी वर्ग को यह संदेश देने की कोशिश करेंगे की भाजपा आदिवासी समुदाय की हितेषी है. 

पिछले कुछ चुनाव और आदिवासी

2003 विधानसभा चुनाव 

साल 2003 में हुआ विधानसभा चुनाव मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जाता है, क्योंकि इस चुनाव में बीजेपी ने 10 सालों से सत्ता में जमी कांग्रेस को हटा दिया था. बीजेपी की इस जीत और कांग्रेस की इस हार में आदिवासी वर्ग ने ही बड़ा रोल निभाया था.

दरअसल, उस वक्त आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित राज्य की 41 सीटों में से 37 सीटों पर बीजेपी ने कब्जा जमाया था. जबकि कांग्रेस केवल 2 सीटों पर सिमट गई थी, इसके अलावा गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 2 सीटें जीती थी.

इससे पहले 1998 के चुनाव में कांग्रेस का आदिवासी सीटों पर अच्छा खासा प्रभाव था. यानि आदिवासी वर्ग ने जैसे ही कांग्रेस से दूर हुआ उसकी सत्ता चली गई. 2003 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए 41 सीटें आरक्षित है. 

2008 विधानसभा चुनाव 

2008 विधानसभा चुनाव में हुए परिसीमन के बाद मध्य प्रदेश में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 41 से बढ़कर 47 हो गई. हालांकि इस बार इस वर्ग का झुकाव कांग्रेस की तरफ भी हुआ. 2008 में भाजपा ने 29 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी. 

2013 विधानसभा चुनाव 

2013 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा ने जीती 31 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के खाते में 15 सीटें आईं थीं. यानि 2013 में भी बीजेपी ने आदिवासी वर्ग पर अपनी पकड़ मजबूत रखी. 

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