मध्य प्रदेश की सियासत में तेज़ी से बढ़ रही है आदिवासियों की अहमियत, बीजेपी और कांग्रेस वोटबैंक मजबूत करने में जुटीं

मध्य प्रदेश की राजनीतिक सत्ता की राह को फतह करने में जनजातीय वर्ग की अहम भूमिका रही है. इस वर्ग ने जिस दल का साथ दिया उसके लिए सरकार बनाना आसान रहा है. दोनों ही राजनीतिक दल इस बात से वाकिफ है और उन्होंने इसके लिए जमीनी तैयारी तेज़ कर दी है.

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मध्य प्रदेश की सियासत में अब आदिवासी की अहमियत तेजी से बढ़ रही है. सत्ताधारी दल बीजेपी और विपक्षी दल कांग्रेस ने इस वर्ग का दिल जीतकर आगामी समय में होने वाले पंचायत, नगरीय निकाय से लेकर साल 2023 के विधानसभा चुनाव की जीत के लिए सियासी बिसात पर चालें चलना तेज कर दी है. यही कारण है कि आदिवासी केंद्रित राजनीति का दौर तेज़ होने के आसार बनने लगे है.

मध्य प्रदेश में सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी दल कांग्रेस इस हफ्ते राज्य के आदिवासियों के लिए आउटरीच कार्यक्रम आयोजित करेंगे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आज मंडला में एक कार्यक्रम को संबोधित करेंगे और विपक्षी दल बुधवार को अपने आदिवासी विधायकों की बैठक बुलाएगा.

आज कार्यक्रम में चौहान आदिवासी राजा शंकर शाह और उनके बेटे रघुनाथ शाह की मूर्तियों को स्थापित करने के काम का उद्घाटन करेंगे. दोनों को पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों ने तोपों से उड़ा दिया था.

मंडला बीजेपी अध्यक्ष भीष्म द्विवेदी ने पीटीआई को बताया, “वह पूर्व गोंडवाना साम्राज्य की राजधानी राम नगर में आदिवासियों की एक विशाल रैली को भी संबोधित करेंगे, जो कि 15 नवंबर को आदिवासी नायक बिरसा मुंडा की जयंती पर शुरू हुए सप्ताह भर चलने वाले जनजातीय गौरव दिवस को खत्म करने के लिए है.”

वहीं कांग्रेस 24 नवंबर को जनजातीय वर्ग के विधायकों और नेताओं की भोपाल में बैठक बुला रही है.

दरअसल मध्य प्रदेश की राजनीतिक सत्ता की राह को फतह करने में जनजातीय वर्ग की अहम भूमिका रही है. इस वर्ग ने जिस दल का साथ दिया उसके लिए सरकार बनाना आसान रहा है. दोनों ही राजनीतिक दल इस बात से वाकिफ है और उन्होंने इसके लिए जमीनी तैयारी तेज़ कर दी है.

राज्य में 21 फीसदी से ज्यादा आबादी आदिवासी वर्ग की है. इसी के चलते 84 विधानसभा क्षेत्र ऐसे है जहां आदिवासी बाहुतायत में है. कुल मिलाकर इन क्षेत्रों में जीत और हार आदिवासियों के वोट पर निर्भर है.

साल 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी इन 84 में से 34 सीट पर जीत हासिल कर सकी थी. जबकि साल 2013 में बीजेपी ने 59 क्षेत्रों में जीत दर्ज की थी. इस तरह पार्टी को साल 2013 की तुलना में 2018 में 25 सीटों पर नुकसान हुआ था.

राज्य में 47 विधानसभा क्षेत्र आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है. इन क्षेत्रों में साल 2013 के चुनाव मे बीजेपी ने 31 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के खाते में 15 सीटें आईं थीं. वहीं साल 2018 के चुनाव में बीजेपी सिर्फ 16 सीटें ही जीत सकी और कांग्रेस का आंकड़ा 30 सीटों पर पहुंच गया. ऐसे में बीजेपी को सत्ता से बाहर होना पड़ा था.

एक तरफ जहां बीजेपी आदिवासियों मे पैंठ बढ़ाने की जुगत में लगी है तो दूसरी और कांग्रेस भी इस वर्ग में अपने जनाधार को बरकरार रखना चाह रही है. दोनों राजनीतिक दलों की बढती सक्रियता यह संदेश देने लगी है कि उनके लिए आदिवासी वोट बैंक सत्ता की राह को आसान बना सकता है. लिहाजा उन्होंने जमीनी तौर पर इस वर्ग तक पहुंचने की मुहिम को तेज़ कर दिया है.

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