तमिलनाडु: जाति के नाम पर आदिवासियों का दमन

इन आदिवासियों का आरोप है कि जिला प्रशासन से इन्होंने कई बार आवास देने की अपील की है. लेकिन गांव में ऊंची जाति के लोग, स्थानीय राजनेताओं की मदद से, अधिकारियों को ऐसा करने से रोक रहे हैं.

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तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से मुश्किल से 10 किलोमीटर दूर कांचीपुरम ज़िले के करसंगल गांव में लगभग 50 नरिकुरवर आदिवासी परिवार रहते हैं. यह परिवार लगभग 20 साल पहले इस इलाक़े में बसे थे.

पिछले पांच सालों में उन्हें पक्के मकान की अपनी लड़ाई में कोई सफ़लता नहीं मिली है. वजह है जाति-आधारित अत्याचार, जिसे इलाक़े के राजनेता और बढ़ावा दे रहे हैं.

इन आदिवासियों का आरोप है कि जिला प्रशासन से इन्होंने कई बार आवास देने की अपील की है. लेकिन गांव में ऊंची जाति के लोग, स्थानीय राजनेताओं की मदद से, अधिकारियों को ऐसा करने से रोक रहे हैं.

इन आदिवासियों के अनुसार उन्हें अकसर प्रमुख जाति के लोग पीड़ित करते हैं, क्योंकि वह गांव की आबादी का 80 प्रतिशत हिस्सा हैं.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आदिवासियों को अकसर प्रमुख जाति के लोग गांव में स्थायी आवास मांगने के लिए ताना मारते हैं. वो आदिवासियों से इलाक़े को छोड़कर चले जाने को भी कहते हैं.

इन आदिवासियों को मीडिया से बात करने पर धमकी भी दी गई, और उनसे कहा गया कि उन्हें रातोंरात किसी अज्ञात ज़मीन पर “डंप” कर दिया जाएगा.

दरअसल, लगभग 20 साल पहले कांचीपुरम के अलग-अलग हिस्सों से पलायन करने के बाद, यह आदिवासी करसंगल-मणिमंगलम-श्रीपेरंबुदूर हाई रोड के किनारे बस गए. धीरे-धीरे इस अस्थायी बसेरे ने एक बड़ी बस्ती की शक्ल ले ली.

लेकिन उन्हें कभी पीने के पानी, शौचालय और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलीं. इनमें से कई आदिवासियों के पास आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे बुनियादी दस्तावेज़ भी नहीं हैं.

इन आदिवासियों ने कई बार अलग-अलग स्तर पर इलाक़े के अंदर बेहतर आवास की मांग के लिए ज़िला अधिकारियों को प्रतिनिधित्व दिया है. राजस्व अधिकारियों ने गांव के पास की जमीन का सर्वेक्षण भी किया, और आदिवासियों को आवास देने का वादा किया. लेकिन यह वादा अधूरा ही है.

दुख की बात यह है कि भारत का संविधान भले ही किसी की जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता हो, लेकिन इस इलाक़े में ऐसा ही हो रहा है. गांववालों की धमकियों और दबाव का असर यह है कि राजस्व अधिकारी इन आदिवासियों को अब गाँव से क़रीब 10 किमी दूर एक स्लम बोर्ड कॉलोनी में शिफ्ट करना चाहते हैं.

इन आदिवासियों के पास पानी की आपूर्ति भी नहीं है, और वे अपना बस्ती से लगभग 200 मीटर दूर एक कम्यूनिटी नल पर निर्भर हैं. वहां भी उन्हें 10 मिनट से ज्यादा पानी भरने की अनुमति नहीं मिलती.

उन्हें पानी लाने के लिए पास की मणिमंगलम झील तक जाने के लिए मजबूर किया जाता है, जहां उन्हें डर है कि उनके बच्चे झील में गिर सकते हैं.

कार्यकर्ताओं का भी आरोप है कि आदिवासियों के लिए आवास पाने के उनके प्रयास प्रमुख जाति के लोगों, राजनेताओं और स्थानीय अधिकारियों के बीच गठजोड़ के कारण सफ़ल नहीं हो रहे हैं.

अनुसूचित जनजातियों के लिए आवास और बुनियादी सुविधाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाएं हैं. आदिवासियों को योजनाओं के तहत इलाक़े के अंदर ज़मीन दी जा सकती है. इस तरह के उपाय तिरुवल्लूर और कांचीपुरम ज़िलों में लागू भी किए गए हैं.

कांचीपुरम ज़िले के एक राजस्व विभाग के अधिकारी ने अखबार को बताया कि कांचीपुरम में सभी आदिवासियों को आवास दिए जाने के प्रयास जारी हैं.

(तस्वीर सौजन्य अश्विन प्रसात, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस)

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