क्यों किया जा रहा है आदिवासियों को आपदा से निपटने के लिए तैयार

आपदा की परिस्थिति में अधिकारियों द्वारा दिए गए निर्देश सही समय पर आदिवासियों तक नहीं पहुंच पाते.

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केरल में वायनाड जिला प्रशासन ने जिले में आदिवासी बस्तियों के लिए व्यक्तिगत आपदा प्रबंधन योजनाएं लाने का फैसला लिया है. यह इस ज़िले के लिए पहली ऐसी पहल है. वायनाड में राज्य की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी है.

वायनाड जिला प्रशासन का दावा है कि यह देश में इस तरह की पहली कोशिश है. परियोजना के पहले चरण में जिले की 10 पंचायतों में 27 आदिवासी बस्तियों के लिए अलग आपदा प्रबंधन योजना तैयार की गई है.

अधिकारियों का कहना है कि हर एक आदिवासी बस्ती के लिए भी खास आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार की जा रही हैं. इन बस्तियों में भूस्खलन, बाढ़ और जंगली जानवरों से खतरे के अलावा प्राकृतिक खतरों का जोखिम भी रहता है.

इसके अलावा, आदिवासी विशिष्ट हस्तक्षेप भी तैयार किया गया है क्योंकि आपदा प्रबंधन के बारे में आदिवासियों में जागरुकता की कमी है. यह भी देखा गया है कि आपदा की परिस्थिति में अधिकारियों द्वारा दिए गए निर्देश सही समय पर आदिवासियों तक नहीं पहुंच पाते.

योजना के इस शुरुआती दौर में चुनी गई बस्तियों के 900 निवासियों को आपदा प्रबंधन में बुनियादी ट्रेनिंग दी गई है. साथ ही, लगभग 400 वॉलंटियर्स को आपातकालीन प्रतिक्रिया, अग्निशमन और CPR देने में भी प्रशिक्षण दिया गया है.

प्रत्येक बस्ती के लिए ख़ास आपदा प्रबंधन योजनाएँ उस बस्ती के लिए संभावित जोखिमों को संबोधित करती हैं. इसके तहत ऐसे सुरक्षित स्थान चुने गए हैं जहां आपातकालीन स्थिति में आदिवासियों को शिफ्ट किया जा सकता है.

वायनाड जिला कलेक्टर ए गीता ने मीडिया से बात करते हुए उम्मीद जताई कि इस परियोजना से जिले में आपदा प्रबंधन की तैयारियों को बढ़ावा मिलेगा.

ट्रेनिंग के अलावा, प्रशासन द्वारा अलग से त्वरित प्रतिक्रिया दल गठित किए जाएंगे, जिसमें आदिवासी प्रमोटर, आदिवासी एक्सटेंशन अधिकारी, आशा कार्यकर्ता और बस्ती से तीन वॉलंटियर होंगे.

जिला आपातकालीन संचालन केंद्र के कोऑर्डिनेटर शाजी पी मैथ्यू ने बताया कि आरआरटी ​​को तकनीकी उपकरण उपलब्ध कराने के प्रयास चल रहे हैं ताकि वे आपदा की स्थिति में समुदाय से ही फर्स्ट रिस्पांडर बन सकें.

जिले की लगभग 10 से 20% बस्तियों के लिए विशेष आपदा प्रबंधन योजना तैयार करने का प्लान है. यह ऐसे बस्तियां होंगी जिन्हें आपदा के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है.

क्यों है ट्रेनिंग की जरूरत

जिले में 3,000 से ज्यादा आदिवासी बस्तियां हैं. इनमें से ज्यादातर दूरदराज़ के इलाकों या घने जंगलों में बसी हैं, और प्रशासन के लिए आपदा होने की बाद सही समय पर इन तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है.

इन हालात में बस्ती के निवासियों को आपदा प्रबंधन में प्रशिक्षित करना काफी लाभदायक हो सकता है.

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