तमिलनाडु में वन अधिकार आदिवासियों के लिए एक भ्रम बन कर रह गया है

कई आदिवासी गांवों में, जहां वन अधिकार रिकॉर्ड में दिए गए हैं फिर भी वहां आदिवासी लाभार्थी ग्राम वन समितियों (Village Forest Committees) के चंगुल में हैं. आदिवासी वीएफसी अध्यक्ष का वन अधिकारियों द्वारा विभिन्न माध्यमों से शोषण किया जाता है.

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तमिलनाडु में जंगलों में रहने वाले आदिवासी राज्य की आबादी का 1.2 फीसदी से कम हैं, लेकिन यह माना जाता है कि जिस जंगल में वो रहते हैं वहाँ के लगभग 80 फीसदी जैव विविधता (Biodiversity) की रक्षा करते हैं.

फिर भी, वन प्रबंधन नीतियां (Forest Management Policies) और प्रशासन अक्सर प्रकृति के साथ उनके सहजीवी संबंध (Symbiotic Relationship), उनके पारंपरिक ज्ञान, जैव विविधता के संरक्षण (Protecting biodiversity) और संरक्षण में प्रमुख भूमिका की उपेक्षा करते हैं.

जलवायु परिवर्तन (Climate change), वनों की कटाई, प्रदूषण, बुनियादी ढांचे का अंधाधुंध विकास और जैव विविधता का नुकसान वन पर आश्रित आदिवासी लोगों के लिए ख़तरा है.

एक तरफ जंगलों के प्राकृतिक रक्षक रहे आदिवासी लोगों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है तो दूसरी तरफ उनको इन्हीं जंगलों से बेदखल करने की योजना है.

वन अधिकार अधिनियम (Forest Right Act), 2006 वन में रहने वाले आदिवासी समुदायों के निवास, आजीविका और अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक जरूरतों सहित उनके अस्तित्व के अधिकारों को मान्यता देता है.

यह अधिनियम आदिवासी और जंगल में रहने वाले समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए बनाया गया था.

इसका उद्देश्य बेहतर आजीविका सहायता योजनाओं के साथ अत्याचारों से सुरक्षा प्रदान करना और वन में रहने वाले आदिवासी समुदायों की भागीदारी के साथ बेहतर वन प्रबंधन सुनिश्चित करना है.

लेकिन स्थानीय नेताओं, बिचौलियों और सरकारी अधिकारियों के गठजोड़ ने आदिवासियों को कल्याणकारी योजनाओं से दूर रखा है. भारी मात्रा में वनोपज वाले क्षेत्रों के ज्यादातर आदिवासियों ने वन अधिकार अधिनियम के बारे में कभी सुना ही नहीं है.

कई आदिवासी गांवों में, जहां वन अधिकार रिकॉर्ड में दिए गए हैं फिर भी वहां आदिवासी लाभार्थी ग्राम वन समितियों (Village Forest Committees) के चंगुल में हैं. आदिवासी वीएफसी अध्यक्ष का वन अधिकारियों द्वारा विभिन्न माध्यमों से शोषण किया जाता है.

ज्यादातर गांवों में आदिवासी अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकते क्योंकि बिचौलिए और वन क्षेत्र के कर्मचारियों की मिलीभगत उनको नियंत्रित करते हैं.

बिचौलिए गरीब परिवारों को कर्ज के जाल में फंसाने के लिए पैसे उधार देते हैं. प्रत्येक परिवार को सालाना 5 हज़ार रुपये का कर्ज देकर, आदिवासियों को जीवन भर इन बिचौलियों द्वारा जकड़े रखा जाता है. ऐसे कर्ज लेने वाले आदिवासियों को साल भर अपनी फसल कर्जदाताओं को सौंपनी पड़ती है.

वन क्षेत्र के कर्मचारी बड़ी मात्रा में वन उपज लेने के लिए बिचौलियों को ट्रांजिट परमिट (Transit permits) जारी करते हैं लेकिन उनमें से अधिकांश वीएफसी की किताबों में नहीं आते हैं.

कुल बिक्री लेनदेन का सिर्फ 5 से 10 फीसदी ही आधिकारिक रिकॉर्ड में दिखाया जाता है. इसलिए एक अल्प राशि सिर्फ वीएससी फंड में जमा की जाती है. ग्राम वन समिति के अध्यक्ष, जो खुद एक आदिवासी हैं, को छेड़छाड़ किए गए रिकॉर्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जाता है.

बांस पर हाल के सरकारी आदेश, जिसमें कहा गया है कि बांस के मुद्रीकरण की शक्ति वन विभाग के प्रमुख के पास रहेगी, दोषपूर्ण है और आदिवासियों के अधिकारों पर हमला है.

जब भारतीय वन अधिनियम और तमिलनाडु वन अधिनियम ने बांस को लघु वन उपज के रूप में वर्गीकृत किया है, जिससे आदिवासियों को इसे काटने और बेचने का अधिकार मिला है तो विभाग सचिव द्वारा ऐसा दोषपूर्ण और विरोधाभासी सरकारी आदेश कैसे जारी किया गया है?

हालांकि राज्य में 200 से अधिक आदिवासी वीएफसी का गठन किया गया है लेकिन उनमें से अधिकतर उन आदिवासियों को लाभ नहीं पहुंचाते जिनके लिए उनका गठन किया गया था.

इतना ही नहीं अधिकांश क्षेत्रों में किसी भी आदिवासी को अपनी उपज बेचने के लिए जंगल से बाहर जाने की अनुमति नहीं है. ऐसा होता है भ्रष्टाचार, शोषण और कर्ज के बंधन में होने के कारण.

केंद्रीय आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने 2012 में वन विभाग को आदिवासी लोगों के लिए पारगमन परमिट (Transit permits) को छोड़कर वन उपज पारगमन नियमों को संशोधित करने का निर्देश दिया था, लेकिन अब तक ऐसा नहीं किया गया है.

अवैध फॉरेस्ट चेक-पोस्ट आदिवासियों को अपनी उपज को बाहर बेचने से रोकते हैं. ऐसे में ये चेक-पोस्ट आदिवासियों को अपनी उपज को चुनिंदा बिचौलियों को सौंपने के लिए मजबूर करते हैं, जो वन क्षेत्र के कर्मचारियों के संरक्षण का आनंद लेते हैं. वन अधिकार अधिनियम के गैर-कार्यान्वयन का मुख्य कारण वीएफसी की आड़ में आधिकारिक रूप से प्राप्त अवैध अनुमति है.

सही मायनों में होना ये चाहिए कि वन अधिकार आदिवासियों को न्याय प्रदान करे. उनका शोषण समाप्त होना चाहिए. वन, राजस्व और जनजातीय विभागों के कार्यपालक, प्रशासनिक, मंत्रिस्तरीय और फील्ड स्टाफ, ग्राम सभा सदस्यों और आदिवासी लाभार्थियों के लिए जागरूकता निर्माण और व्यावहारिक प्रशिक्षण आवश्यक है

वीएफसी एक वैधानिक निकाय नहीं है जबकि वन अधिकार समिति केंद्रीय कानून के तहत एक वैधानिक निकाय है. आदिवासियों की आजीविका की बेहतरी के नाम पर काटे गए वनो उपज का संग्रहण और वीएफसी द्वारा उसकी बिक्री अवैध है और इसे जल्द से जल्द रोका जाना चाहिए.

केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय के निर्देश के अनुसार, आदिवासी लोगों के लिए वन उपज के लिए ट्रांजिट परमिट के साथ वन संहिता में संशोधन बिना किसी और देरी के लाया जाना चाहिए. एक राज्य सतर्कता और निगरानी समिति को मानदंडों के उल्लंघन और आदिवासियों के शोषण की जांच के लिए समय-समय पर निरीक्षण करना चाहिए. राजस्व, वन एवं आदिवासी कल्याण विभाग द्वारा सभी पात्र हितधारकों को वन अधिकार अनुदान पूर्ण करने की समय सीमा निर्धारित की जाए.

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, संशोधन 2015, धारा 3 (जी) कहता है कि “जो कोई भी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को उसकी भूमि या परिसर से गलत तरीके से बेदखल करता है या उसके अधिकारों के में हस्तक्षेप करता है. अपराध में लिप्त व्यक्ति के रूप में माना जाएगा और उसे दंडित किया जाएगा.” इस कानून को सख्ती से लागू करने की जरूरत है.

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