पाम ऑयल मिशन और आदिवासियों की ज़मीन

भारत अपनी इस परियोजना के लिए देश के पूर्वोत्तर हिस्से और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पूर्वी द्वीप समूह का इस्तेमाल करना चाहता है. ये क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हैं और कई अलग-अलग प्रकार के वनस्पतियों और जीवों के घर हैं.

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भारत पाम ऑयल के सबसे बड़े उपभोक्ता देशों में से एक है. पाम ऑयल का इस्तेमाल साबुन से लेकर चिप्स बनाने तक लगभग हर चीज में किया जाता है. लेकिन भारत अभी भी अपने देश में इस्तेमाल होने वाले पाम ऑयल के अधिकांश हिस्से का आयात करता है. अब दूसरे देशों पर निर्भरता और आयात को कम करने के लिए भारत सरकार पाम ऑयल के उत्पादन को बढ़ाना चाहती है.

मोदी सरकार ने हाल ही में ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन – पाम ऑयल’ पेश की है. इसके मुताबिक आने वाले दिनों में भारत पाम ऑयल के आयात पर अपनी निर्भरता कम करने के उद्देश्य से पूर्वोत्तर भारत और अंडमान निकोबार में पाम ऑयल की खेती और प्रोसेसिंग पर जोर देगा.

लेकिन पर्यावरणविद चिंतित हैं कि देश में पाम ऑयल के नए लक्ष्यों से वन्यजीवों और जंगलों के साथ-साथ आदिवासी भूमि अधिकारों को भी ख़तरा हो सकता है.

दरअसल भारत सरसों और सोयाबीन जैसे अन्य वनस्पति तेलों का भी उत्पादन करता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में पाम ऑयल की मांग में काफी ज्यादा वृद्धि देखने को मिली है. ऐसे में सरकार ने पॉम ऑयल के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने का फैसला किया. इस साल पॉम ऑयल की आसमान छूती कीमतों ने भी सरकार को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है.

क्या है पाम ऑयल मिशन?

भारत सरकार ने नेशनल मिशन फॉर एडिबल ऑयल-ऑयल पाम (NMEO-OP) नाम की योजना शुरू की है. इसका उद्देश्य उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में पाम ऑयल के उत्पादन को बढ़ावा देना है.

पाम ऑयल के उत्पादन के लिए पूरे साल बारिश की जरूरत होती है. साथ ही इसकी सबसे अच्छी खेती उन इलाकों में हो सकती है जहां तापमान 20-30 डिग्री सेल्सियस या इससे कुछ ज्यादा रहता हो और नमी 80 फीसदी से भी ज्यादा हो.

भारत अपनी इस परियोजना के लिए देश के पूर्वोत्तर हिस्से और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पूर्वी द्वीप समूह का इस्तेमाल करना चाहता है. ये क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हैं और कई अलग-अलग प्रकार के वनस्पतियों और जीवों के घर हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NMEO-OP को “गेम-चेंजर” बताया है और कहा है कि इस परियोजना से इन क्षेत्रों को लाभ होगा. सरकार को यह भी उम्मीद है कि इस पहल से किसानों को अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलेगी. यह एक ऐसी फसल है जो मूंगफली या सूरजमुखी जैसे पारंपरिक तिलहनों की तुलना में अधिक तेल का उत्पादन करती है.

मिशन पाम ऑयल की अहम बाते…

11000 करोड़ की वित्तीय सहायता, जिसमें से 8844 करोड़ केंद्र सरकार वहन करेगी और बाक़ी 2196 राज्य सरकार वहन करेगी.

साल 2025 तक 10 लाख हेक्टेयर में पाम ऑयल की खेती का लक्ष्य केंद्र सरकार ने रखा है.

आने वाले दस साल में भारत में पाम ऑयल का उत्पादन 28 लाख टन तक पहुँच जाए.

इसकी खेती में किसानों को घाटा न हो, इसका सरकार ख़ास ख्याल रखेगी.

पहले प्रति हेक्टेयर 12 हजार रुपये दिये जाते थे, जिसे बढ़ाकर 29 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है.

पुराने बागों को दोबारा चालू करने के लिए 250 रुपये प्रति पौधा के हिसाब से विशेष सहायता दी जाएगी.

भारत ने तय किया नया लक्ष्य

फिलहाल भारत में पाम ऑयल की खेती सिर्फ़ 3.7 लाख हेक्टेयर में होती है. सरकार का लक्ष्य अगले चार साल में इसे लगभग तीन गुना करने का है. यानि अब 2025-26 तक छह लाख 50 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि पर पॉम ऑयल के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑयल पाम रिसर्च के वैज्ञानिक एमवी प्रसाद के मुताबिक भारत में हर साल 2.5 करोड़ टन पाम ऑयल की खपत है. देश में करीब एक करोड़ टन का उत्पादन होता है. वहीं 1.5 करोड़ टन दूसरे देशों से आयात किया जाता है.

भारत में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु के अलावा मिजोरम, नागालैंड, असम और अरुणाचल प्रदेश में पाम ऑयल की खेती की जाती है.

जैव विविधता कैसे प्रभावित होगी?

अधिकारियों ने बताया है कि सरकार चाहती है कि पाम ऑयल की फसलों की खेती उन जमीन पर हो जिनका इस्तेमाल किसान पहले से ही कर रहे हैं. हालांकि पर्यावरणविद संशय में हैं और इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इस परियोजना का भारत के वन्यजीवों पर किस तरह का प्रभाव पड़ सकता है.

नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर सुधीर कुमार सुथर कहते हैं कि एक प्रकार के जंगल को हटाकर दूसरे प्रकार का जंगल लगाने से कई जीवों के अस्तित्व को ख़तरा है. पाम ऑयल की खेती के मामले में भी ऐसा ही करने पर विचार किया जा रहा है.

वो कहते हैं कि भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र 51 प्रकार के जंगलों का घर है. पाम ऑयल की खेती इस इलाके और इन जंगलों के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है.

मलेशिया के वैज्ञानिकों ने 2020 के एक अध्ययन में पाया कि वन क्षेत्रों को पाम ऑयल के बागानों में बदलने से कार्बन का उत्सर्जन भी अधिक हुआ. यह देखा गया कि 1990 से लेकर 2005 तक पाम ऑयल के लगभग 50 से 60 फीसदी पेड़ पुराने जंगलों को साफ कर उन्हीं जगहों पर लगाए गए. वहीं वर्षावनों को नष्ट करने से जलवायु परिवर्तन से निपटने के अंतरराष्ट्रीय कोशिश बाधित होंगे.

किसान और आदिवासी समूह कैसे होंगे प्रभावित?

विनीता गौड़ा जो कि जीव विज्ञानी हैं और उन्होंने पूर्वोत्तर भारत का व्यापक अध्ययन किया है. वह चेतावनी भरे लहजे में कहती हैं कि भारत सरकार को इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे पाम ऑयल के उत्पादक दिग्गजों के साथ जो हो रहा है उससे सीखना चाहिए.

दक्षिण एशिया के ये दो देश दुनिया में इस्तेमाल होने वाले 80 से 90 फीसदी पाम ऑयल का उत्पादन उन इलाकों में लगाए गए पेड़ से करते हैं जहां पहले कभी जंगल हुआ करते थे.

अब पर्यावरण के संरक्षण में जुटे लोग इंडोनेशिया की सरकार से पाम ऑयल की नई खेती पर लगी रोक के समय को बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. इंडोनेशिया में 2018 में पाम ऑयल की नई खेती पर अगले तीन साल के लिए रोक लगाई गई थी.

इस बीच अमेरिका ने श्रमिकों के साथ दुर्व्यवहार के कथित दावों पर मलेशिया के दो बागानों से पाम ऑयल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है.

वहीं प्रोफेसर सुधीर कुमार सुथर के मुताबिक पाम ऑयल की खेती से देश में भूमिगत जल स्तर नीचे जा सकता है. साथ ही किसानों और आदिवासी लोगों द्वारा जमीन का इस्तेमाल करने के तरीके पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है.

सुथर ने भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश का हवाला दिया. यहां की अधिकांश भूमि पर आदिवासी समुदायों का मालिकाना हक है. उन्होंने चेतावनी दी कि पाम ऑयल की खेती से आदिवासियों के वन अधिकार प्रभावित होंगे.

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