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क्योंझर के जुआंग आदिवासी समुदाय का आरोप: घर जर्जर, पानी की किल्लत और बरसों से अनदेखी का जीवन

कई जुआंग आदिवासी परिवार अभी भी जर्जर मिट्टी के घरों में रह रहे हैं जबकि कुछ लोगों ने रिश्तेदारों के घरों में शरण ले रखी है क्योंकि उनके अपने घर नहीं हैं.

ओडिशा में आदिवासी समुदायों की बेहतरी के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं और विकास कार्यक्रम शुरू किए गए हैं. इसके बावजूद क्योंझर ज़िले की जुआंग जनजाति के कई लोगों के लिए ये योजनाएं ज़्यादातर पहुंच से बाहर हैं, जिससे वे बुनियादी ज़रूरतों से भी वंचित रह जाते हैं.  

इसका एक साफ़ उदाहरण बांसपाल ब्लॉक के कोडिपोसा गाँव की हालत है. 80 से ज़्यादा जुआंग आदिवासी परिवारों वाले इस गाँव में पीने के पानी, अच्छे घरों और दूसरी ज़रूरी सुविधाओं की भारी कमी है.

हालांकि यह इलाका ‘इंटीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी’ (ITDA) और ‘जुआंग डेवलपमेंट एजेंसी’ (JDA) दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है और यहां आदिवासियों के विकास के लिए खास प्रोग्राम भी चलाए जा रहे हैं.

यहां के लोगों का कहना है कि सरकारी योजनाएं सिर्फ़ कागज़ों पर ही हैं और उनसे उनकी ज़िंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया है. गांव को ‘वसुधा’ पेयजल योजना में शामिल तो किया गया था लेकिन बताया जाता है कि पानी की सप्लाई अब बंद हो चुकी है.

पानी के कई स्टैंड पोस्ट या तो टूट गए हैं या उनमें जंग लग गया है, जिससे गाँव वालों को पीने के पानी के लिए पास के तालाब पर निर्भर रहना पड़ता है. यहां तक कि स्थानीय आँगनवाड़ी केंद्र भी बच्चों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए तालाब के पास मौजूद प्राकृतिक झरने के पानी पर निर्भर है.

रहने के लिए घर की कमी भी एक बड़ी समस्या है. कई जुआंग आदिवासी परिवार अभी भी जर्जर मिट्टी के घरों में रह रहे हैं जबकि कुछ लोगों ने रिश्तेदारों के घरों में शरण ले रखी है क्योंकि उनके अपने घर नहीं हैं.

जिन कुछ लोगों को सालों पहले सरकारी घर मिले थे, उनका कहना है कि समय के साथ वे घर खराब हो गए हैं और अब उनकी तुरंत मरम्मत या उन्हें बदलने की ज़रूरत है.

बुनियादी सुविधाओं की कमी के अलावा इलाके में हाथियों के बार-बार आने-जाने से खेती पर भी असर पड़ा है, जिससे फसलें बर्बाद हुई हैं और आदिवासी परिवारों की आजीविका और कमज़ोर हुई है.

इन चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए ITDA के अधिकारियों ने कहा कि एजेंसी अपनी ज़िम्मेदारियां निभा रही है.

वहीं, JDA ने विकास की धीमी गति के लिए 2023 से सरकारी फंड न मिलने को ज़िम्मेदार ठहराया. उनका कहना है कि आर्थिक मदद न मिलने से इलाके में कल्याणकारी और बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट्स को लागू करने में रुकावट आई है.

स्थानीय वार्ड सदस्य नवीन जुआंग ने कहा, “सरकारी अधिकारी साल में एक बार आते हैं और फिर गायब हो जाते हैं. वे ठेकेदारों को काम सौंप देते हैं जो उसे पूरा नहीं करते. जब मैं ये मुद्दे उठाता हूँ, तो भी कोई नहीं सुनता. प्रोजेक्ट्स अधूरे ही रह जाते हैं.”

संपर्क करने पर JDA के एक अधिकारी ने बताया, “सरकारी फंड न मिलने की वजह से 31 मार्च, 2023 से यह प्रोजेक्ट रुका हुआ है. हमने कई प्रस्ताव भेजे हैं और फंड जारी होते ही गाँवों में विकास का काम फिर से शुरू हो जाएगा.”

जहां एक तरफ़ लोग भरोसेमंद पेयजल, सुरक्षित घर और बेहतर सार्वजनिक सुविधाओं का इंतज़ार कर रहे हैं.

वहीं दूसरी तरफ़ यह स्थिति ओडिशा के सबसे कमज़ोर आदिवासी इलाकों में सरकारी घोषणाओं और उनके अमल के बीच के अंतर को उजागर करती है.

(Representative image)

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