मध्य प्रदेश: आदिवासियों में एनीमिया से लड़ने के लिए अब होम्योपैथिक दवाएं

आदिवासी आबादी पर किए गए परीक्षणों से पता चला है कि डिंडोरी ज़िले में 4 फीसदी आदिवासी डायबिटीज से प्रभावित थे और 8.16 फीसदी प्री-डायबिटिक थे. वहीं मंडला ज़िले में 4.26 फीसदी डायबिटीज और 24.26 फीसदी प्री-डायबिटिक पाए गए, जो राष्ट्रीय औसत 12 फीसदी से काफी अधिक है.

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मध्य प्रदेश में सिकल सेल एनीमिया (Sickle cell disease) से पीड़ित आदिवासियों पर किए गए सर्वे में पाया गया कि होम्योपैथिक उपचार उनपर कारगर साबित हो रहा है. एक अधिकारी ने कहा कि मध्य प्रदेश के चार ज़िलों में किए गए एक अध्ययन के तहत कम से कम 1,656 आदिवासी सिकल सेल रोग से प्रभावित पाए गए और होम्योपैथी उपचार के लिए अच्छी प्रतिक्रिया दी.

उन्होंने कहा कि डिंडोरी, मंडला, छिंदवाड़ा और शहडोल ज़िलों में आयुष विभाग के तहत सरकारी होम्योपैथी कॉलेज ने 23,320 लोगों का परीक्षण किया गया. अधिकारी ने कहा कि यह योजना बैगा और भारिया की विशेष पिछड़ी जनजातियों में सिकल सेल रोग की व्यापकता की जांच के लिए शुरू की गई थी.

इस स्टडी के प्रमुख डॉक्टर निशांत नंबीशन ने कहा कि सिकल सेल एनीमिया RBC के आकार को प्रभावित करता है, जो शरीर के सभी भागों में ऑक्सीजन ले जाती हैं. परियोजना के तहत, कॉलेज की एक टीम ने 23,320 लोगों की घर-घर स्क्रीनिंग की और उनमें से 1,656 को सिकल सेल एनीमिया से प्रभावित पाया.

यह परियोजना विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (All India Institute of Medical Sciences), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research), भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science) और मौलाना आजाद राष्ट्रीय संस्थान (Maulana Azad National Institute of Technology) के वैज्ञानिकों के तकनीकी सहयोग से लागू की गई थी. अधिकारी ने कहा कि प्रौद्योगिकी विभाग भी इसमें शामिल है.

डॉक्टर नंबीशन ने कहा, “स्वास्थ्य विभाग द्वारा दिए गए पारंपरिक एलोपैथिक उपचार के अलावा, प्रभावित व्यक्तियों को होम्योपैथी दवाएं भी दी गईं और उनके परिणाम काफी उत्साहजनक थे.”

स्थिति के बारे में बात करते हुए अधिकारी ने कहा कि सिकल सेल आसानी से टूट जाते हैं और मर जाते हैं. लाल रक्त कोशिकाएं (Red blood cells) आमतौर पर लगभग 120 दिनों तक जीवित रहती हैं, उन्हें बदलने की जरूरत होती है लेकिन सिकल सेल 10 से 20 दिनों में मर जाते हैं, जिससे एनीमिया होता है.

उन्होंने कहा कि पर्याप्त आरबीसी के बिना शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है और इससे थकान होती है. रोग गंभीर दर्द का कारण बनता है. दर्द तब शुरू होता है जब सिकल के आकार के आरबीसी छाती, पेट और जोड़ों में रक्त के प्रवाह को रोकते हैं.

डॉक्टर नंबिसन ने कहा, “सरकार ने परियोजना के तहत 100 व्यक्तियों पर अध्ययन के लिए 3.58 करोड़ रुपये से अधिक की मंजूरी दी है लेकिन टीम ने 23,320 लोगों की जांच की है.”

आदिवासी आबादी पर किए गए परीक्षणों से पता चला है कि डिंडोरी ज़िले में 4 फीसदी आदिवासी डायबिटीज से प्रभावित थे और 8.16 फीसदी प्री-डायबिटिक थे. वहीं मंडला ज़िले में 4.26 फीसदी डायबिटीज और 24.26 फीसदी प्री-डायबिटिक पाए गए, जो राष्ट्रीय औसत 12 फीसदी से काफी अधिक है.

अधिकारी ने कहा कि परियोजना की सफलता को ध्यान में रखते हुए, जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने राज्य के 22 आदिवासी ज़िलों में सिकल सेल एनीमिया के परीक्षण और इलाज के लिए 187 करोड़ रुपये की एक और परियोजना को मंजूरी दी है.

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