मणिपुर की नगा जनजातियों ने पीएम मोदी से शांति वार्ता में तेज़ी लाने की अपील की

चंदेल नागा पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन ने प्रधानमंत्री कार्यालय से नाइन-प्वाइंट और 16-प्वाइंट समझौतों की पिछली गलतियों से बचकर समावेशी और सम्मानजनक निपटान की प्रक्रिया में तेज़ी लाने का भी आग्रह किया.

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मणिपुर के चंदेल ज़िले में रहने वाली नगा आबादी की नौ जनजातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले चंदेल नगा पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (Chandel Naga Peoples Organization) ने बुधवार को पीएम नरेंद्र मोदी से भारत-नगा शांति प्रक्रिया में तेज़ी लाने का आग्रह किया.

संगठन ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर शांति समझौते पर हस्ताक्षर को लेकर गतिरोध को तोड़ने में उनके हस्तक्षेप की मांग की. पत्र पर नगा पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष आरडी डेविड बोयस ने हस्ताक्षर किए.

अगस्त 2015 में केंद्र और एनएससीएन-आईएम NSCN (I-M) के बीच ऐतिहासिक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट (Framework Agreement) पर हस्ताक्षर के ठीक सात साल बाद हस्तक्षेप का आह्वान आया है.

सीएनपीओ ने पीएम मोदी को लिखे पत्र में लिखा है, “भारत पिछले 75 वर्षों से अपने नेतृत्व, आर्थिक विकास और अन्य मानवीय प्रयासों के लिए वैश्विक सुर्खियों में रहा है और देश मोदी के नेतृत्व में वैश्विक ध्यान आकर्षित कर रहा है. इस गौरव के दौरान भारत को लंबे समय से लंबित नगा मुद्दों में से एक को हल करने का प्रयास करना चाहिए.”

पत्र में आगे लिखा गया है, “3 अगस्त, 2015 के समझौते के दौरान, पीएम ने भारत-नगा राजनीतिक संघर्ष के स्थायी सम्मानजनक और समावेशी समाधान के मार्ग में आशा और दिशा दी थी.”

सीएनपीओ ने प्रधानमंत्री कार्यालय से नाइन-प्वाइंट और 16-प्वाइंट समझौतों की पिछली गलतियों से बचकर समावेशी और सम्मानजनक निपटान की प्रक्रिया में तेज़ी लाने का भी आग्रह किया.

पत्र में लिखा है, “भारत उपनिवेशवाद का शिकार होने के नाते, हम मानते हैं कि वह नगाओं की वैध आकांक्षाओं को उतना ही समझ सकता है जितना 1947 में आजादी से पहले भारतीयों ने किया था.”

उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री, उनकी मंत्रिपरिषद और सांसदों को एक समावेशी समाधान लाने और शांति प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिए निर्णायक होने की जरूरत है ताकि यह नगाओं को उनके स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित न करे.”

नौ नगा जनजातियों के संगठन ने यह भी बताया कि केंद्र और एनएससीएन (आई-एम) समूह ने 1 अगस्त, 2022 को नागालैंड के वाणिज्यिक केंद्र दीमापुर के पास चौमुकेदिमा में “इंडो-नगा” युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर करने के 25 साल पूरे किए. संगठन और केंद्र के बीच युद्धविराम 1 अगस्त, 1997 को लागू हुआ था.

क्या है ऐतिहासिक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट

3 अगस्त, 2015 को सबसे बड़े नगा विद्रोही संगठन, नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड यानी एनएससीएन और भारत सरकार के बीच शांति समझौता हुआ था. इस समझौते को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘ऐतिहासिक’ बताया था.

दरअसल उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है. इन संगठनों का दावा है कि नगा कभी भारत का हिस्सा नहीं थे और अपनी संप्रभुता को लेकर उन्होंने कई दशकों तक हिंसक आंदोलन चलाए हैं.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता वर्ष 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुईवाह और तत्कालीन वार्ताकार आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

हालांकि, संगठन के अलग झंडे, संविधान और ग्रेटर नगालिम के अपने मांग पर अड़े होने की वजह से वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है. संगठन का कहना है कि सरकार ने एनएससीएन-आईएम की अलग झंडे और संविधान की मांग को माना था लेकिन आरएन रवि ने इसे खारिज कर दिया था. वर्तमान में इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख एके मिश्रा वार्ताकार की भूमिका में हैं.

शुरू हो गया है विवाद

लेकिन हाल ही में केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता कर रहे नगा संगठनों की अगुवाई कर रहे नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड [इसाक-मुइवा] (एनएससीएन-आईएम) ने दावा किया कि दशकों से चल रही इस समस्या के अंतिम समाधान में देर होने की वजह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा उनके अलग झंडे और अलग संविधान की मांग पर आपत्ति जताया जाना है.

पिछले महीने डेक्कन हेराल्ड में छपी खबर के मुताबिक, वर्तमान में सीजफायर का पालन कर रहे संगठन ने अब एक बयान में कहा कि आरएसएस ने इस प्रक्रिया को रोक दिया है और इसकी (संगठन की) मांगों पर सवाल उठाए हैं.

संगठन ने अपने बयान में कहा था, “विडंबना यह है कि यह मामला तो बहुत पहले ही सुलझ गया था लेकिन आरएसएस का सवाल के बीच आ गया कि दो झंडे और दो संविधान कैसे हो सकते हैं. आरएसएस/हिंदुत्व के घोषणापत्र ने फ्रेमवर्क समझौते के मुख्य समझौते का तीखा खंडन किया. देरी का असल बिंदु यहीं से शुरू हुआ.”

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