HomeAdivasi Dailyपश्चिम बंगाल: मास्टरजी का ‘वैक्सीन रथ’ बना आदिवासी औरतों के लिए वरदान

पश्चिम बंगाल: मास्टरजी का ‘वैक्सीन रथ’ बना आदिवासी औरतों के लिए वरदान

वैक्सिनेशन के लिए उन्होंने एक स्कूल बस किराए पर ली, और उसका नाम 'वैक्सीन रथ' रखा. इस बस के ज़रिए 500 औरतों को उनके वैक्सिनेशन की तारीख़ के हिसाब से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित अकालपुर ब्लॉक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में वैक्सिनेशन के लिए ले जाया गया.

पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान ज़िले के 34 साल के एक प्राइमरी स्कूल टीचर, दीप नारायण नायक ने बेहद अहम काम को अंजाम दिया है. उन्होंने अकेले ही यह सुनिश्चित किया कि ज़िले के दुर्गम आदिवासी गाँवों की स्तनपान कराने वाली माताओं और वरिष्ठ नागरिकों सहित कम से कम 500 औरतों को कोविड-19 वैक्सीन की पहली डोज़ मिले.

इस मुश्किल काम को पूरा करने के लिए उन्होंने न सिर्फ़ इन औरतों को सलाह दी, बल्कि CoWin ऐप पर 1,000 से ज़्यादा आदिवासी औरतों का रजिस्ट्रेशन किया. इसके लिए उन्होंने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के सौ से ज़्यादा मोबाइल नंबरों की व्यवस्था की.

उन्होंने औरतों को गांव के सबसे पास वाले वैक्सिनेशन सेंटर तक पहुंचाने के लिए एक बस को ‘वैक्सीन रथ’ में भी बदल दिया.

दीप नारायण नायक ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, “मैं जमुरिया ब्लॉक के कुछ आदिवासी गांवों में सौ छात्रों और उनके माता-पिता को पढ़ाने के लिए नियमित रूप से जाता हूं. वहां मैंने देखा कि भले ही सरकार हर किसी पर वैक्सीन लगवाने का दबाव डाल रही थी, लेकिन इन गांवों में किसी भी आदिवासी महिला को वैक्सीन नहीं लगा था. इससे न सिर्फ़ उनकी सेहत को ख़तरा है, बल्कि उनके बच्चों पर भी जोखिम बढ़ जाता है.”

नायक को इलाक़े के लोग प्यार से ‘रास्तार मास्टर’ (गली का शिक्षक) कहते हैं. उन्होंने पाया कि जोबा अट्टपारा और उसके आसपास के तीन-चार गांवों में 500 से ज़्यादा औरतों को वैक्सीन नहीं लगा था. इन गांवों में मुंडा और टुडू जैसे आदिवासी समुदायों के लोग रहते हैं.

CoWin ऐप पर इन सबके नाम रजिस्टर करना एक चुनौती था. बेहद ग़रीब परिवारों से आने वाली इन औरतों के पास स्मार्टफोन नहीं था, न ही इतनी सारी औरतों का एक ही मोबाइल पर रजिस्ट्रेशन हो सकता था.

नायक ने इस मुश्किल का भी हल निकाला. वो कहते हैं, “ज़्यादा से ज़्यादा, CoWin पर एक मोबाइल नंबर से सिर्फ़ चार लोगों को रजिस्टर किया जा सकता है. मेरे पास तीन मोबाइल नंबर थे. इसलिए, मैंने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों और गाँव के लोगों से नंबर लेना शुरू किया. इन नंबरों से मैंने लगभग 500 औरतों को रजिस्टर किया.”

वैक्सिनेशन के लिए उन्होंने एक स्कूल बस किराए पर ली, और उसका नाम ‘वैक्सीन रथ’ रखा. इस बस के ज़रिए 500 औरतों को उनके वैक्सिनेशन की तारीख़ के हिसाब से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित अकालपुर ब्लॉक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में वैक्सिनेशन के लिए ले जाया गया.

पहली डोज़ लगवाने से इन औरतों की वैक्सीन को लेकर झिझक दूर हो गई है. इनमें से कई ने कहा है कि अब वो दूसरी डोज़ के लिए खुद जाने को तैयार हैं.

इन 500 औरतों को देखकर आसपास के गांवों की कई औरतों के मन से भी वैक्सीन का डर हट गया है. नायक ने अब तक लगभग 1,160 औरतों का रजिस्ट्रेशन कराया है. अब उन्हें किसी ‘रथ’ की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि कई लोग वैक्सीन के लिए खुद ही सेंटर जा रहे हैं.

नायक ने आदिवासियों के मन से वैक्सीन से जुड़े कई मिथक भी दूर किए. कई आदिवासियों को लगता था कि वैक्सीन लगवाने से उनकी मौत हो सकती है, या वो नपुंसक हो सकते हैं. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

नायक की कोशिशों की तारीफ़ करते हुए जमुरिया ब्लॉक के चिकित्सा अधिकारी डॉ अविनाश बेसरा ने कहा कि उन्होंने एक बेहद चुनौतीपूर्ण काम को अंजाम दिया है. नायक ने अकेले ही आदिवासी औरतों की काउंसलिंग की, उन्हें ऐप पर रजिस्टर किया और उन्हें सेंटर तक पहुंचाया. इसका एक बड़ा फ़ायदा यह हुआ है कि अब आसपास के गांवों से भी औरतें वैक्सीन लगवाने के लिए आगे आ रही हैं.

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