पत्थर की खुदाई से राजमहल पहाड़ी के साथ आदिम जनजाति के अस्तित्व का संकट

राजमहल की पहाड़ी पर उत्खनन के कारण पर्यावरीण असंतुलन बढ़ने, जैव विविधता खत्म होने, महत्वपूर्ण पौधों के नष्ट होने के साथ गंगा में गाद भी बढ़ रहा है. साहिबगंज जिला गंगा के किनारे स्थित है.

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झारखंड के संथाल परगना में राजमहल पहाड़ियों पर अंधाधुंध पत्थर खनन न सिर्फ सदियों पुराने जीवाश्मों के लिए हानिकारक साबित हो रहा है बल्कि आदिम जनजाति पहाड़िया समुदाय के विलुप्त होने का खतरा भी पैदा कर रहा है.

साहिबगंज जिले के बोरियो ब्लॉक के छोटे पचरुखी गांव के सौर्य पहाड़िया (पहाड़िया समुदाय के विभिन्न संप्रदायों में से एक) आज अवैध खनन के कारण कृषि और आजीविका के सिकुड़ते अवसरों के साथ क्षेत्र में लगातार पर्यावरणीय गिरावट के तहत जीने को मजबूर हैं.

क्योंकि आसपास के दर्जनों पत्थर-खनन इकाइयों में अक्सर विस्फोट होते रहते हैं इसलिए छोटी पचरुखी और उसके आसपास के गांवों को बार-बार होने वाले जमीन के अंदर होने वाले कंपन के आदी हो गए हैं.

एक स्थानीय कार्यकर्ता सूर्य पहाड़िया ने कहा, “ऐसा लगता है जैसे हमारे गांव के चारों ओर पत्थर की खदानों में विस्फोट होने पर भूकंप आ रहा है. यह हमारे फूस के कॉटेज के लिए खतरा है.” उन्होंने कहा कि स्टोन क्रशर प्लांट से निकलने वाले धूल के कण स्थानीय वनस्पतियों और जीवों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं.

पहाड़िया ने कहा, “बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियों के कारण पहाड़ी की चोटी पर सभी प्राकृतिक धाराएं या तो सूख गई हैं या विलुप्त होने के कगार पर हैं. ये पीने के पानी और सिंचाई का एकमात्र स्रोत हुआ करते थे.”

उन्होंने कहा कि उनके समुदाय के सदस्यों द्वारा जीविका के लिए उन्हें बेचने के लिए वन उपज खरीदने की प्रथा समान रूप से प्रभावित हुई है.

साहिबगंज और पाकुड़ जिले दुर्लभ जीवाश्मों के अस्तित्व के लिए प्रसिद्ध हैं. साहिबगंज कॉलेज के भूविज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर रंजीत कुमार के मुताबिक जीवाश्म एक सौ मिलियन वर्ष से अधिक पुराने हैं.

उन्होंने कहा कि यह गंभीर चिंता का विषय है. साथ ही सुझाव दिया कि लुप्तप्राय आदिवासी समूहों और स्थानीय जैव विविधता को बचाने के लिए अंधाधुंध खनन गतिविधि को तुरंत रोका जाना चाहिए.

छोटी पचरुखी, अमजोला, पांगडो, धोकुटी और गुरमी जैसे कई गांव इस समस्या का सामना कर रहे हैं और प्रशासनिक हितधारक इस मुद्दे पर आंखें मूंद रहे हैं.

बोरियो के जेएमएम विधायक लोबिन हेम्ब्रोम ने टाइम्स ऑफ इंडिया को फोन पर बताया, “मेरे पास स्थानीय लोगों को जुटाने और साहिबगंज जिले में सभी अवैध खनन और कोल्हू संयंत्रों को जबरन बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है.” हेम्ब्रम ने हाल ही में परिवहन को अवरुद्ध करके एक आंदोलन शुरू किया था.

जिला खनन अधिकारी विभूति कुमार ने पहाड़िया समुदाय की दुर्दशा के बारे में कोई जानकारी होने से इनकार किया. हालांकि उन्होंने आश्वासन दिया कि अवैध खनन के खिलाफ उचित कदम उठाए जाएंगे. उन्होंने कहा कि सभी तरह के अवैध खनन को रोकने के प्रयास भी जारी हैं.

राजमहल की पहाड़ियां 2600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है और अरावली के बाद इसे भारत की सबसे पुरानी पहाड़ी श्रृंखलाओं में एक बताया जाता है. ये पहाड़ियां 6.8 से 11.8 करोड़ वर्ष पुरानी हैं.

राजमहल की पहाड़ी पर उत्खनन के कारण पर्यावरीण असंतुलन बढ़ने, जैव विविधता खत्म होने, महत्वपूर्ण पौधों के नष्ट होने के साथ गंगा में गाद भी बढ़ रहा है. साहिबगंज जिला गंगा के किनारे स्थित है.

भारत के सबसे प्राचीन पहाड़ी श्रृंखला में एक राजमहल की पहाड़ियों पर दुनिया के सबसे पुराने पादप जीवाश्म पाए जाते हैं. इन्हें जुरासिक काल का बताया जाता है. ये जीवाश्म पृथ्वी के विकास, मानव सभ्यता के विकास सहित कई अध्ययनों में कारगर माने जाते हैं.

2020 में तैयार साहिबगंज डिस्ट्रिक्ट एनवायरमेंट प्लान के मुताबिक जिले में 180 माइंस हैं और 451 क्रशर हैं. वहीं झारखंड सरकार के खान एवं भूतत्व विभाग की वेबसाइट पर सितंबर 2021 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक साहिबगंज में 424 माइनिंग लीज हैं, जिसमें 115 फिलहाल कार्यशील हैं और 309 अस्थायी रूप से कार्यशील नहीं हैं.

कुल लीज और कार्यशील दोनों स्तर पर राज्य में साहिबगंज अव्वल है. इसके बाद दूसरा नंबर साहिबगंज से सटा जिला पाकुड़ का आता है जो राजमहल की पहाड़ी क्षेत्र के अंतर्गत ही स्थित है. पाकुड़ में कुल 345 लीज हैं, जिनमें 79 कार्यशील हैं.

हालांकि झारखंड में राजनीतिक और पर्यावरणीय दोनों स्तरों पर यह चिंता लगातार जाहिर की जाती रही है कि इस क्षेत्र में अवैध माइंस व क्रशर का दायरा कहीं अधिक विस्तृत है. इसके संचालन और संरक्षण के लिए राजनीतिक प्रभुत्व व बाहुबल का भी आरोप लगाया जाता रहा है.

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