केरल: अट्टपाड़ी के आदिवासियों ने मांगे एफ़आरए के तहत ज़मीन के अधिकार

अधिनियम के अनुसार, आदिवासी लोगों का जंगल के अंदर अपनी पारंपरिक भूमि पर अधिकार है, जहां वो सालों से रह रहे हैं और खेती कर रहे हैं.

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केरल के अट्टपाड़ी के आदिवासियों ने राज्य सरकार से मांग की है कि वन अधिकार अधिनियम (एफ़आरए), 2006 के तहत आदिवासियों को भूमि आवंटन में गतिरोध को ख़त्म किया जाए.

अगली (Agali) पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में शनिवार को आयोजित आदिवासी बस्तियों के लोगों और संगठनों की एक बैठक हुई. इसमें इस बात पर चर्चा हुई कि राज्य में एफ़आरए के तहत आदिवासियों को ज़मीन न दिया जाना, सरकार द्वारा आदिवासी विरोधी कार्रवाई के बराबर है.

अधिनियम के अनुसार, आदिवासी लोगों का जंगल के अंदर अपनी पारंपरिक भूमि पर अधिकार है, जहां वो सालों से रह रहे हैं और खेती कर रहे हैं.

बैठक में सरकार से ज़िला स्तरीय समिति द्वारा स्वीकार किए गए एफ़आरए के तहत भूमि आवंटन के 436 आवेदन जारी करने की मांग की गई.

इस बीच, एफ़आरए के तहत अट्टपाड़ी और अगली वन रेंज के आदिवासियों को भूमि आवंटित करने पर राजस्व और वन विभागों के बीच दो साल के लंबे गतिरोध की वजह से पालक्काड ज़िला कलेक्टर मृण्मयी जोशी की शिकायत पर शुक्रवार को मण्णारक्काड़ संभागीय वन अधिकारी (डीएफ़ओ) जयप्रकाश को ट्रांस्फ़र कर दिया गया.

जोशी ने राजस्व मंत्री से शिकायत की कि डीएफ़ओ ने एफ़आरए पर ज़िला स्तरीय समिति (डीएलसी) द्वारा पारित भूमि आवंटन के आदेश पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था.

डीएलसी ने 436 आवेदनों में से केवल 403 को मंज़ूरी दी थी, और हालांकि डीएफ़ओ ने बैठक में इसका विरोध नहीं किया, लेकिन बाद में आदेश पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया. इसको लेकर कलेक्टर और डीएफ़ओ के बीच ठन गई थी.

देश में FRA को लागू हुए 15 साल हो चुके हैं. लेकिन केरल में कई आदिवासी अभी भी अधिनियम से मिलने वाले अधिकारों से वंचित हैं. यह अधिनियम आदिवासियों को व्यक्तिगत, सामुदायिक और विकास के अधिकार देता है. हालांकि राज्य सरकार ने व्यक्तिगत अधिकारों के तहत आदिवासियों को ज़मीन दी है, लेकिन सामुदायिक अधिकार अभी भी उनकी पहुंच से काफ़ी दूर हैं.

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