आदिवासियों की मांग: ‘बांध हटाओ, डांग बचाओ’

सात बांधों के निर्माण की वजह से इस परियोजना से लगभग 7,500 हेक्टेयर भूमि पानी में डूब जायेगी, 75 गांव प्रभावित होंगे और 35,000 से ज्यादा ग्रामीण विस्थापित हो जायेंगे.

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गर्मी का मौसम शुरू होने से पहले जहां एक तरफ सरकारी तंत्र पानी की कमी से निपटने की तैयारी शुरू कर रहा है, तो दूसरी ओर प्रस्तावित रिवर लिंकिंग परियोजना को लेकर डांग जिले के आदिवासी इलाके में तापमान बढ़ रहा है.

गुजरात के डांग, वलसाड, सूरत और नवसारी जिलों के आदिवासी नेता इस साल के केंद्रीय बजट में घोषित पर-तापी-नर्मदा रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए राज्य की राजधानी गांधीनगर में डेरा डाले हुए हैं.

बांधों के निर्माण की वजह से इस परियोजना से लगभग 7,500 हेक्टेयर भूमि पानी में डूब जायेगी, 75 गांव प्रभावित होंगे और 35,000 से ज्यादा ग्रामीण विस्थापित हो जाएंगे.

रिवर लिंकिंग परियोजना में पश्चिमी घाट के ज्यादा पानी (surplus) इलाकों से सौराष्ट्र और कच्छ के कम पानी वाले इलाकों में पानी लाने का प्रस्ताव है. इसके लिए 6 बांध बनाए जाने हैं, जिनमें से तीन डांग में, एक वलसाड में और दो महाराष्ट्र में बनेंगे.

परियोजना की वजह से डांग, वलसाड और तापी जिलों में सैकड़ों आदिवासी विस्थापित हो जायेंगे. सागौन, बांस और दूसरी लकड़ियों से भरपूर डांग के जंगल भी जलमग्न हो जाएंगे.

2007-2008 में आदिवासियों के कड़े विरोध के बाद यह परियोजना रुक गई थी. आदिवासी नेताओं ने अब आरोप लगाया है कि केंद्र ने नर्मदा योजना की “नाकामी” को “छिपाने” के लिए इस परियोजना को डिजाइन किया है.

आदिवासी नेताओं का आरोप है कि उन्होंने नर्मदा योजना, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, उकाई जैसी कई परियोजनाएं देखी हैं जहां आदिवासियों को उनकी भूमि से विस्थापित होने के लिए मुआवजा अभी तक नहीं दिया गया है.

दक्षिण गुजरात के वरिष्ठ आदिवासी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता सुखराम राठवा से इस बारे में मुलाकात की. आदिवासी नेताओं ने कहा कि वे चाहते हैं कि निर्वाचित प्रतिनिधि विधानसभा में इस परियोजना पर चर्चा करें.

कार्यकर्ता मुकेश पटेल ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “नदी जोड़ने की परियोजना के नाम पर हम अपने आदिवासियों को उनकी वन भूमि से विस्थापित नहीं होने देंगे. हमारा नारा है ‘बांध हटाओ, डांग बचाओ.'”

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