राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु (Droupadi Murmu) की हालिया पश्चिम बंगाल (West Bengal) यात्रा एक महत्वपूर्ण आदिवासी सम्मेलन के लिए थी.
यह केवल एक औपचारिक सरकारी कार्यक्रम नहीं था. यह संथाल आदिवासी समुदाय से जुड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था. एक ऐसा मंच जहाँ शिक्षा, संस्कृति, पहचान और सामाजिक सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी थी.
लेकिन विडंबना यह है कि आज इस यात्रा की चर्चा सम्मेलन के कारण नहीं, बल्कि उससे जुड़े विवाद के कारण हो रही है.
जिस कार्यक्रम को आदिवासी समाज की आवाज़ बनने का अवसर मिल सकता था, वह राजनीतिक बयानबाज़ी और प्रोटोकॉल विवाद के शोर में लगभग गुम हो गया.
सम्मेलन का महत्व
संथाल भारत के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक हैं. झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार के बड़े हिस्से में उनकी आबादी है. इतिहास गवाह है कि इस समुदाय ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
ऐसे में संथाल समुदाय पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का महत्व स्वाभाविक रूप से बहुत बड़ा था.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उपस्थिति इस कार्यक्रम को और भी महत्वपूर्ण बना देती थी. वे स्वयं संथाल समुदाय से आती हैं और देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं. राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु का राजनीति और सामाजिक जीवन का लंबा अनुभव है.
भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति कहने को तो सर्वोच्च पद है लेकिन राष्ट्रपति की सर्वोच्चता को प्रतीकात्मक ही ज़्यादा माना जाता है. लेकिन आदिवासी मामलों में राष्ट्रपति को संविधान में विशेष अधिकार दिए गए हैं.
इस दृष्टि से राष्ट्रपति पद पर आसीन द्रोपदी मुर्मु के अनुभव निश्चित ही महत्वपूर्ण हैं और इस सम्मेलन में उनकी शिरकत हर लिहाज़ से बेहद अहम थी.
विवाद कैसे केंद्र में आ गया
लेकिन इस सम्मेलन से पहले और उसके दौरान जो घटनाएँ हुईं, उन्होंने पूरे कार्यक्रम को एक अलग ही दिशा दे दी. राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कार्यक्रम स्थल और आयोजन से जुड़ी कुछ बातों पर नाराज़गी जताई. इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार के बीच बहस शुरू हो गई.
केंद्र के Ministry of Home Affairs ने इस मामले में रिपोर्ट माँगी. जबकि Mamata Banerjee की सरकार ने अपना स्पष्टीकरण भेज दिया. इस बीच Narendra Modi और राज्य सरकार के बीच बयानबाज़ी तेज़ हो गई.
देखते ही देखते यह मामला राष्ट्रीय राजनीति का विषय बन गया. टीवी स्टूडियो और सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गई. प्रोटोकॉल, राजनीतिक टकराव और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर.
लेकिन इस पूरी बहस में वह सम्मेलन लगभग गायब हो गया जिसके लिए राष्ट्रपति पश्चिम बंगाल गई थीं.
असली मुद्दा जो छूट गया
संथाल समाज आज भी कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है. शिक्षा की कमी, रोजगार के सीमित अवसर, सांस्कृतिक पहचान की चुनौतियाँ और भूमि अधिकार जैसे मुद्दे आज भी उनकी जिंदगी को प्रभावित करते हैं.
ऐसे समय में यदि एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन इन मुद्दों को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला सकता था, तो वह एक महत्वपूर्ण अवसर होता. लेकिन दुर्भाग्य से मीडिया और राजनीति दोनों का ध्यान विवाद पर टिक गया.
यह स्थिति केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है. भारत में अक्सर आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दे तब ही चर्चा में आते हैं जब वे किसी राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन जाते हैं.
इस मामले में यह स्पष्ट है कि अगर राज्य सरकार से तैयारियों में अगर चुक हुई या फिर किसी राजनीतिक मकसद से सम्मेलन का स्थान बदला गया तो जो लोग राष्ट्रपति के सम्मान को लगे ठेस से चिंतित हैं, वे भी मौके पर चौका ही मारने की फ़िराक में हैं.

