HomeElections 2024कोल्हान के 'टाइगर' चम्पाई के बदले सुर और बीजेपी की उम्मीदें

कोल्हान के ‘टाइगर’ चम्पाई के बदले सुर और बीजेपी की उम्मीदें

अमित शाह से मुलाकात के बाद अपनी पहली सोशल मीडिया पोस्ट में चम्पाई सोरेन ने जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दे पर नहीं बल्कि संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठ की बात उठाई है.

कोलहान टाइगर… चम्पाई सोरेन को झारखंड की राजनीति में इसी नाम से जाना जाता है. दिशोम गुरु शिबू सोरेन के सबसे करीबी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक सदस्यों में से एक चम्पाई सोरेन अब भारतीय जनता पार्टी जॉइन करने जा रहे हैं. 

30 अगस्त को चंपई सोरेन के साथ लोबिन हेंब्रम भी बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर आदिवासी नेता चम्पाई सोरेन ने सोमवार (26 अगस्त) को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी. 

इस बैठक में झारखंड बीजेपी के प्रभारी असम के सीएम हेमंत बिस्व सरमा भी मौजूद थे. इसके साथ ही यह भी साफ हो गया कि वह भाजपा में शामिल होंगे.

असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने ट्वीट कर यह जानकारी साझा की कि चंपाई सोरेन 30 अगस्त को रांची में आधिकारिक रूप से भाजपा में शामिल होंगे. 

बीजेपी को यह उम्मीद होगी कि चम्पाई सोरेन के भाजपा में आने से कोल्हान क्षेत्र की राजनीति भाजपा के पक्ष में झुक जाएगी.

चम्पाई सोरेन ने जेएमएम के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई . वे पार्टी के संस्थापक शिबु सोरेन के विश्वासपात्र साथी रहे. उनका पार्टी में कितना सम्मान था इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद विगत 2 फरवरी 2024 को चंपई सोरेन झारखंड के 7वें सीएम बने थे. 

3 जुलाई 2024 तक उन्होंने इस पद पर कार्य किया. हेमंत सोरेन के जेल से बाहर आने के बाद चम्पाई सोरेन को पद छोड़ना पड़ा था. इसको लेकर हाल में उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री के तौर पर उनको घोर अपमान का सामना करना पड़ा और इसी वजह से उनको अलग रास्ता चुनने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

चम्पाई सोरेन ने यह भी आरोप लगाया था कि जुलाई के पहले हफ्ते में उनके सभी सरकारी कार्यक्रम पार्टी नेतृत्व की ओर से उन्हें बिना सूचना के अचानक रद्द कर दिए गए थे. जब उन्होंने वजह पूछी तो अधिकारियों ने बताया कि तीन जुलाई को पार्टी विधायकों की बैठक है. तब तक वे किसी सरकारी कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकते हैं. 

इसके बाद चम्पाई सोरेन ने घोषणा की थी कि वह जल्द ही अपने अगले राजनीतिक कदम पर फैसला करेंगे. वह राजनीति नहीं छोड़ेंगे और उनके लिए नया सियासी दल बनाने का विकल्प हमेशा खुला है. हां, यदि रास्ते में कोई अच्छा दोस्त मिल गया तो उसके साथ भी आगे बढ़ सकते हैं. 

उनके इस बयान के बाद से ही उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रहीं थीं. हांलाकि एक कार्यक्रम में उन्होंने यह संकेत दिया था कि वे एक नए राजनीतिक दल की स्थापना कर सकते हैं. लेकिन अंतत: उन्होंने बीजेपी की सदस्यता लेने का फ़ैसला किया है.

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, और पश्चिमी सिंहभूम जिले शामिल हैं. यह क्षेत्र हमेशा से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र साबित हुआ है. 

आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) का वर्चस्व है. 

भाजपा के लिए यहां चुनावी सफलता हासिल करना हमेशा कठिन रहा है. यह क्षेत्र 2020 के झारखंड विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए विशेष रूप से निराशाजनक साबित हुआ, जब पार्टी को यहां एक भी सीट नहीं मिल पाई. इसके विपरीत, जेएमएम ने यहां 14 में से 11 सीटें जीतकर भाजपा को करारी हार दी.

कोल्हान में भाजपा की चुनौती

कोल्हान में भाजपा के लिए चुनौतियों का मुख्य कारण क्षेत्र की आदिवासी पहचान और राजनीतिक परिवेश है. आदिवासी समाज के लिए उनकी संस्कृति, परंपराएं और अधिकार अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं. आमतौर पर आदिवासी राजनीतिक निर्णयों का मूल्यांकन इन पहलुओं के आधार पर करते हैं. 

भाजपा की विचारधारा और नीतियों के प्रति आदिवासी समाज में संदेह और असंतोष का माहौल रहा है, जो चुनावी परिणामों में भी झलकता है. भाजपा की नीतियों को अक्सर आदिवासी अधिकारों और हितों के खिलाफ माना जाता है, जिससे पार्टी के लिए समर्थन जुटाना मुश्किल हो जाता है.

2020 के विधानसभा चुनावों में कोल्हान के छह विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया. पूर्वी सिंहभूम जिले में, भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली. इसी प्रकार, सरायकेला-खरसावां और पश्चिमी सिंहभूम जिलों में भी भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. 

यहां तक कि जमशेदपुर (पूर्व) सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास भी अपनी सीट नहीं बचा सके, जो भाजपा के लिए एक बड़ा झटका था.

रघुबर दास के कार्यकाल में आदिवासी नाराजगी

रघुबर दास, जो झारखंड के पहले गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री थे, के कार्यकाल के दौरान आदिवासी समुदायों में भाजपा के प्रति असंतोष बढ़ा. रघुबर दास की सरकार पर आरोप लगे कि उन्होंने आदिवासी हितों की अनदेखी की और विवादास्पद भूमि अधिग्रहण से जुड़े फैसले लिए थे.  

उनके कार्यकाल में प्रस्तावित “छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी)” और “संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी)” में संशोधन ने आदिवासी समाज में भारी विरोध का कारण बना. इन संशोधनों से आदिवासी भूमि की सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी, जिससे आदिवासी समाज में गहरा असंतोष फैल गया. 

रघुबर दास पर यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने आदिवासी अधिकारों और संस्कृति की अनदेखी की, जिससे आदिवासी समाज भाजपा से और दूर हो गया. सरकार की नीतियों के तहत कई आदिवासी भूमि अधिग्रहण के मामले सामने आए, जिससे आदिवासी समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ी. 

आदिवासियों को यह महसूस हुआ कि उनकी भूमि और संसाधनों पर बाहरी लोगों का अधिकार बढ़ रहा है, जबकि उनकी स्वयं की सुरक्षा और समृद्धि का ध्यान नहीं रखा जा रहा है.

इसके अलावा, रघुबर दास के कार्यकाल में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और विकास परियोजनाओं का लाभ भी आदिवासी समुदायों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचा. 

आदिवासी समुदायों ने यह महसूस किया कि उनकी बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज किया जा रहा है. आदिवासियों को यह लगा कि रघुबर दास की  सरकार की प्राथमिकताएं उद्योग और व्यापारी हैं. इन कारणों से, 2020 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों, विशेष रूप से कोल्हान, में भारी नुकसान उठाना पड़ा.

चम्पाई सोरेन का भाजपा में शामिल होना: संभावित प्रभाव

चम्पाई सोरेन कोल्हान क्षेत्र के एक प्रमुख आदिवासी नेता हैं. उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के बैनर तले इस क्षेत्र में आदिवासी अधिकारों और स्वायत्तता के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है. 

इसलिए भाजपा को यह उम्मीद ज़रूर होगी कि उनके पार्टी में शामिल होना निश्चित रूप से राजनीतिक समीकरणों को बदल सकता है.

आख़िर चम्पाई सोरेन को कोल्हान का टाइगर कहा जाता है. लेकिन बीजेपी में शामिल होने के साथ ही टाइगर के सुर बदल गए हैं.

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से मुलाकात के बाद उनका जो पहला बयान आया है उसमें उन्होंने संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर बात की है.

चम्पाई सोरेन ने अमित शाह से मुलाक़ात के बाद जो सोशल मीडिया पोस्ट लिखी है उसमें कहीं भी आदिवासी अधिकार, सरना धर्म को मान्यता या झारखंड को केंद्रीय सहायता जैसी कोई बात नहीं की है.

इसके अलावा चम्पाई सोरेन पर यह आरोप भी लग सकता है कि हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद मिली मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने को मजबूर होने के बाद की हताशा में वो बीजेपी में शामिल हुए हैं.

भाजपा के लिए चुनौतियाँ

इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती हैं कि चम्पाई सोरेन के भाजपा में शामिल होने से पार्टी को कोल्हान में कदम जमाने के लिए कुछ ज़मीन मिलने सकती है. लेकिन चम्पाई सोरेन के बीजेपी में शामिल होने का निर्णायक लाभ पार्टी को मिलेगा, यह कहना मुश्किल है. 

इस क्षेत्र में भाजपा को अपनी विचारधारा और नीतियों के प्रति आदिवासी समुदायों में शंका को दूर करना होगा. आदिवासी समाज में भाजपा की छवि को सुधारने के लिए पार्टी को उनके मुद्दों पर संवेदनशीलता से काम करना होगा. 

चम्पाई सोरेन क्षेत्र में अपनी विश्वसनीयता और अनुभव के दम पर भाजपा के लिए यह काम करने की कोशिश ज़रुर कर सकते हैं. सिर्फ़ कोल्हान ही नहीं झारखंड के सभी आदिवासी इलाकों में बीजेपी को आदिवासी भूमि अधिकार की रक्षा के प्रति एक स्पष्ट नीति बनानी होगी.  

इस मामले में कोल्हान क्षेत्र में आदिवासियों का भरोसा जीतना बीजेपी के लिए आसान नहीं है. चम्पाई सोरेन के बीजेपी में शामिल होने के बाद बेशक पार्टी को एक बड़ा नेता मिल गया है. लेकिन बीजेपी की नीतियों के प्रति आदिवासियों की धारणा बदलेगी यह देखना होगा. 

लोकसभा चुनाव में यह देखा गया था कि पश्चिमी सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र से बीजेपी के टिकट पर लड़ कर गीता कोड़ा चुनाव हार गई थीं. वे चुनाव से तुरंत पहले कांग्रेस पार्टी छोड़ कर बीजेपी में शामिल हुई थीं.

गीता कोड़ा आदिवासी मामलों पर काफ़ी संवेनशील रही हैं और अपने क्षेत्र में काफ़ी लोकप्रिय सांसद थीं. लेकिन कोल्हान के आदिवासियों को उनका बीजेपी में शामिल होना पसंद नहीं आया था. 

वैसे इस मामले में बीजेपी के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और चम्पाई सोरेन ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है.

बीजेपी के नज़रिये से देखें तो चम्पाई सोरेन को पार्टी में शामिल कर बीजेपी परसेप्शन की लड़ाई जीत सकती है. लेकिन चम्पाई सोरेन के सामने आदिवासियों का दशकों पुराना भरोसा खोने का ख़तरा है.

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