हसदेव में कोल वाशिंग का विरोध, पेसा के नियमों पर भी उठे सवाल

आलोक शुक्ला ने छत्तीसगढ़ में पेसा क़ानून के नियमों के साथ छेड़छाड़ और बड़े बदलाव के आरोप भी लगाए हैं. उनका कहना है कि जब छत्तीसगढ़ में पेसा को लागू करने का काम शुरू हुआ था तो उसके लिए सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की गई थी. हसदेव आंदोलन में फिर से हलचल और पेसा क़ानून पर उठ रहे विरोध के स्वरों को छत्तीसगढ़ में सत्ता संघर्ष से भी जोड़ा जा रहा है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जुड़े एक वरिष्ठ अधिकार ने बताया है कि हसदेव आंदोलन और पेसा के नियमों पर नए आंदोलन का दबाव बनाने के पीछे मुख्यमंत्री की छवि को बिगाड़ना है.

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छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल में एक बार फिर कुछ हलचल नज़र आ रही है. ख़बरें है कि पिछल कुछ दिनों में यहाँ के आदिवासियों ने कोल वाशिंग प्लांट में चल रहे काम को रुकवा दिया है. आदिवासियों का कहना है कि कोल वाशिंग प्लांट माइनिंग यानि खनन उद्योग का ही एक हिस्सा है. 

हसदेव बचाओ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आलोक शुक्ला और कई और कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया के ज़रिए यह ख़बर दी है. इस सिलसिले में MBB ने आलोक शुक्ला से फ़ोन पर बातचीत की है.

आलोक शुक्ला का कहना है कि जब सरकार का कहना है कि हसदेव जंगल में पारसा ब्लॉक में फ़िलहाल खनन की सभी गतिविधियों को होल्ड कर दिया गया है तो यह काम क्यों हो रहा है. आख़िर कोल वाशिंग का काम भी तो इसी प्रोजेक्ट से जुड़ा हुआ है.

इससे साबित होता है कि सरकार ने दरअसल खनन का काम बंद करने की घोषणा भर की है. असल में यहाँ पर काम लगातार चल रहा है. आलोक शुक्ला कहते हैं, “उनका फ़ैसला एक धोखा है, दरअसल काम तो लगातार चालू है. हाँ जंगल में पेड़ नहीं काटे जा रहे हैं क्योंकि आदिवासी धरने पर बैठे हैं.”

आलोक शुक्ला कहते हैं, “ यहाँ पर निर्माण और कोल वाशिंग का काम लगातार चल रहा है और यह बंद ही नहीं हुआ है. जब आदिवासी विरोध करते हैं तो काम बंद हो जाता है, जैसे ही प्रदर्शन बंद होता है और आदिवासी लौट जाते हैं फिर से काम चालू कर दिया जाता है.”

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राज्य सरकार पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए आलोक शुक्ला कहते हैं कि उन्होंने कई वीडियो जारी कर यह घोषणा की थी कि राहुल गांधी के ऐलान की वजह से पारसा ब्लॉक में खनन का काम होल्ड पर रखा जा रहा है. यानि वहाँ पर अब खनन की कोई गतिविधि नहीं होगी. 

लेकिन सच्चाई यह है कि वहाँ पर काम बंद नहीं हुआ है. 

आलोक शुक्ला ने छत्तीसगढ़ में पेसा क़ानून के नियमों के साथ छेड़छाड़ और बड़े बदलाव के आरोप भी लगाए हैं. उनका कहना है कि जब छत्तीसगढ़ में पेसा को लागू करने का काम शुरू हुआ था तो उसके लिए सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की गई थी.

इस विचार विमर्श के बाद जो नियमों का जो प्रारूप तैयार हुआ था उसमें यह ग्राम सभा की सहमति को काफ़ी महत्व दिया गया था. उसमें कंसेंट (Consent) शब्द का इस्तेमाल किया गया था.

लेकिन जो नियमों का अंतिम रूप सामने आया है उसमें ऐसे बदलाव किये गए हैं जो इस क़ानून के उद्देश्य को ही बदल देते हैं. उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण में ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए. 

लेकिन सहमति और विचार-विमर्श या बातचीत में फ़र्क़ है. छत्तीसगढ़ सरकार ने जो नियम बनाए हैं उनके अनुसार भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों से बातचीत की जाएगी. यानि ग्राम सभा की शक्तियों को कम किया गया है. 

उनका आरोप है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दबाव में इन नियमों में बदलाव किये गए हैं और इस क़ानून को कमज़ोर कर दिया गया है. उन्होंने याद दिलाया कि जब मुख्य सचिव से पूछा गया कि भूमि अधिग्रहण क़ानून 2013 इस बदलाव से कमज़ोर होगा, तो उनका कहना था कि अगर किसी को इस तरह की शिकायत होगी तो वह कलेक्टर के पास जा सकता है.

कलेक्टर को अगर अधिकार दिया जाएगा तो आप समझ सकते हैं कि वह तो सरकार यानि परोक्ष रूप से कॉरपोरेट के साथ ही खड़ा होगा.

हसदेव आंदोलन में फिर से हलचल और पेसा क़ानून पर उठ रहे विरोध के स्वरों को छत्तीसगढ़ में सत्ता संघर्ष से भी जोड़ा जा रहा है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जुड़े एक वरिष्ठ अधिकार ने बताया है कि हसदेव आंदोलन और पेसा के नियमों पर नए आंदोलन का दबाव बनाने के पीछे मुख्यमंत्री की छवि को बिगाड़ना है.

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