मध्य प्रदेश में आदिवासियों पर ज़ुल्म की इंतहा, कोरे भाषण से बात नहीं बनेगी

देशभर में आदिवासियों पर अत्याचार के मामले बढ़ते जा रहे हैं. लेकिन मध्य प्रदेश आदिवासियों के साथ अत्याचार के मामलें में देश में नंबर एक पर है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक 2020 में देश में अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ अत्याचार के 8,272 मामले दर्ज किए गए, जो 2019 के मुकाबले 9.3 फीसदी का उछाल है. इन मामलों में सबसे आगे रहा मध्य प्रदेश जहां कुल मामलों में से 29 फीसदी मामले (2,401) दर्ज किए गए.

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मध्य प्रदेश के इंदौर में 21 साल के आदिवासी छात्र को बंधक बनाकर उसे अमानवीय प्रताड़ना का शिकार बनाया गया है.  पुलिस ने इस मामले में उस आदिवासी छात्र के मकान मालिक समेत चार आरोपियों को सोमवार को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने इस बारे में यह जानकारी दी है.

तेजाजी नगर पुलिस थाने के प्रभारी आरडी कानवा ने बताया कि भारतीय दंड विधान की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और अन्य संबद्ध कानूनी प्रावधानों के तहत गिरफ्तार आरोपियों की पहचान नाजिम खान (35), आदिल खान (22), सद्दाम पटेल (35) और सलमान पटेल (27) के रूप में हुई है.

उन्होंने बताया कि 21 वर्षीय आदिवासी छात्र नाजिम खान का किरायेदार है और वह इस आरोपी के मकान में अपनी दो बहनों के साथ रहकर उच्च शिक्षा हासिल कर रहा है.

आरडी कानवा ने प्राथमिकी के हवाले से बताया कि मकान मालिक को संदेह था कि किरायेदार आदिवासी छात्र ने उसके बेटे को धमकाकर उससे 50,000 रुपये ऐंठ लिए हैं और उसने इस रकम से नया लैपटॉप खरीद लिया है.

उन्होंने बताया कि नाजिम खान आदिवासी छात्र को नौ जुलाई को यह झांसा देकर अपने साथ नायता मुंडला क्षेत्र के एक मकान में ले गया कि वहां से उसे बकरा खरीदना है.

मूलतः अलीराजपुर के निवासी छात्र का आरोप है कि खान और तीन अन्य आरोपियों ने उसे इस मकान में बंधक बना लिया. प्राथमिकी के मुताबिक आरोपियों ने छात्र के साथ गाली-गलौज और बुरी तरह मारपीट की और उसके प्राइवेट में छोटी बोतल से पेट्रोल डालकर उसे प्रताड़ित किया.

छात्र का आरोप है कि प्रताड़ना के दौरान उसे निर्वस्त्र कर मोबाइल कैमरा से उसका वीडियो भी बनाया गया और उसे धमकी दी गई कि अगर उसने किसी को आपबीती सुनाई, तो यह वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया जाएगा.

इस बीच, आदिवासी छात्र को प्रताड़ित किए जाने के खिलाफ हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं ने पुलिस नियंत्रण कक्ष के परिसर में बड़ी तादाद में जमा होकर घटना के आरोपियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है.

आदिवासियों के खिलाफ़ बढ़ते जा रहे अत्याचार के मामले

मध्य प्रदेश में दिन पर दिन आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार बढ़ता ही जा रहा है. हाल ही में प्रदेश के गुना ज़िले में सहरिया आदिवासी महिला रामप्यारी बाई को जमीन विवाद में दबंगों ने डीजल डाल कर आग लगा दी. बुरी तरह झुलसी आदिवासी महिला ने छह दिन तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने के बाद अस्पताल में दम तोड़ दिया.

गुना में आदिवासियों के साथ इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुई है. यहां आदिवासियों का शोषण आम बात है. इससे पहले साल 2020 में इसी ज़िले में एक मज़दूर को कथित तौर पर महज़ पांच हज़ार रुपये की उधारी नहीं चुका पाने की वजह से केरोसिन डालकर ज़िंदा जला दिया गया था. स्थानीय गैर-सरकारी संगठन के लोग इसे बंधुआ मजदूरी का मामला बताया था लेकिन सरकार इसे उधारी का मामला बताती रही.

वहीं रामप्यारी बाई को जलाने की घटना के दो दिन बाद ही देवास ज़िले में एक आदिवासी महिला के साथ भीड़ ने घूसों, लात, बेल्ट और डंडों से पिटाई की. इतना ही नहीं आरोपियों ने महिला के कपड़े भी फाड़ दिए और उसके साथ दुर्व्यवहार किया. और ये सब इस महिला के साथ इसलिए किया गया क्योंकि कथित तौर पर उसका अपनी शादी के इतर भी संबंध थे.

मध्य प्रदेश में आदिवासियों पर अत्याचार की घटनाएं आम बात हो गई है. कभी नेमावर में आदिवासी परिवार को जमीन में जिंदा गाड़ दिया जाता है तो कभी नीमच में एक आदिवासी को जीप से बांधकर घसीटकर कर मार डाला जाता है.

क्या कहते हैं आंकड़ें?

वैसे तो देशभर में आदिवासियों पर अत्याचार के मामले बढ़ते जा रहे हैं. लेकिन मध्य प्रदेश आदिवासियों के साथ अत्याचार के मामलें में देश में नंबर एक पर है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक 2020 में देश में अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ अत्याचार के 8,272 मामले दर्ज किए गए, जो 2019 के मुकाबले 9.3 फीसदी का उछाल है. इन मामलों में सबसे आगे रहा मध्य प्रदेश जहां कुल मामलों में से 29 फीसदी मामले (2,401) दर्ज किए गए.

एनसीआरबी की रिपोर्ट में एक साल पहले के आंकड़े होते हैं. मध्य प्रदेश तीन साल से पहले पायदान पर बना हुआ है. इस साल के आंकड़े बताते हैं कि यह संख्या पिछले साल से लगभग 20 फीसदी अधिक है.

प्रदेश में आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार तो बढ़ते ही जा रहे है साथ ही इस तरह के मामलों का अदालतों में लंबित रहना भी बढ़ता जा रहा है. एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक अदालतों में आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार के कम से कम 10,302 मामले लंबित हैं. जिन मामलों में सुनवाई पूरी हुई उन्हें कन्विक्शन या सजा होने की दर महज 36 फीसदी है.

इसका मतलब है कि आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में पुलिस की जांच में कमी रह जाती है जिसकी वजह से आरोपियों को सजा नहीं हो पाती. बल्कि मामला इससे उल्टा है एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक जेलों में बंद कैदियों में अनुसूचित जनजाति के कैदियों की संख्या भी सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में ही है.

आदिवासी वोट बैंक

मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय राज्य की आबादी का करीब 22 फीसदी हैं और सभी राजनीतिक पार्टियों के बीच आदिवासियों के वोट हासिल करने की होड़ लगी रहती है. 2011 की जनगणना के मुताबिक मध्य प्रदेश में कुल जनसंख्या का 21.5 फीसदी आदिवासी हैं जो भारत में किसी भी राज्य की तुलना में सबसे अधिक है.

राज्य की 47 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. 2018 में बीजेपी ने मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों में 16 सीटें जीतीं जबकि 2013 में 31 सीटें थीं.

पिछले 19 सालों से बीजेपी राज्य में सत्ता में है लेकिन आदिवासियों के खिलाफ़ बेरोकटोक अत्याचार हो रहे हैं. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि सरकार ने आदिवासियों के ख़िलाफ़ अत्याचारों को रोकने और उनमें सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए प्रभावी उपायों पर ध्यान देने के बजाय लोकलुभावन फैसलों के माध्यम से इस समुदाय को लुभाने का सहारा लिया है.

आदिवासी वोटों को अपनी ओर करने का अभियान पिछले साल सितंबर में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में शुरू हुआ. अमित शाह ने जबलपुर में आदिवासियों को उज्जवला योजना के तहत पांच लाख से अधिक एलपीजी कनेक्शन वितरित किए.

साथ ही आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों शंकर शाह और रघुनाथ शाह के नाम पर छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी का नाम बदल दिया, जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 के विद्रोह में भाग लिया था.

वहीं पिछले साल 15 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनजाति गौरव दिवस समारोह में भाग लिया और पूर्व आदिवासी रानी कमलापति के नाम पर भोपाल में हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदल दिया. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी आदिवासियों में अपनी पहुंच को बनाए रखने के लिए तैयारियों में लगी हुई है. 

(इस आर्टिकल में इस्तेमाल की गई तस्वीर पुरानी है और सिर्फ़ आदिवासियों पर अत्याचार की कहानी को बताने के लिए एक प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल की गई है.)

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