पोडु किसानों पर अत्याचार से विद्रोहियों की सेना खड़ी हो सकती है

पहले ही आदिवासी महिला और पोडू किसानों को घसीटते हुए वन कर्मचारियों और पुलिस के वीडियो फुटेज ने आदिवासी युवाओं में अशांति पैदा कर दी है. खासकर तत्कालीन आदिलाबाद, करीमनगर, वारंगल और खम्मम में.

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तेलंगाना के सैकड़ों पोडू किसान, जिन्हें जबरदस्ती अपनी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, वो बेहद मुश्किल समय से गुजर रहे हैं. उनके बच्चे एक अंधकारमय भविष्य की ओर देख रहे हैं और बारहमासी एक डर में जी रहे हैं.

पिछले हफ्ते मंचीयरयाल ज़िले के कोयापोशागुडेम गांव में अधिकारियों ने कई परिवारों के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार, मारपीट, घसीटना और कई परिवारों को बेदखल करना यह सब ठीक उन असहाय बच्चों के सामने किया, जो बेकाबू होकर रोने लगे.

नाइकपोड आदिवासी महिलाएं, जिन्हें सादा-सीधा माना जाता है और ये बाहरी दुनिया के सामने ज्यादा उजागर नहीं होती हैं, वे मुख्य रूप से मामूली वन उपज पर निर्भर रहती हैं और जंगलों से इकट्ठा होने वाले बांस से चटाई, टोकरियां और अन्य सामान बनाती हैं.

वहीं कुछ नाइकपोड परिवारों के पास कृषि भूमि है और उनमें से कई पोडु भूमि में खेती करते हैं जो जंगलों के किनारे रहते हैं. ये लोग तेलंगाना में बहुत दयनीय परिस्थितियों में रहते हैं.  इसके बावजूद पुलिस और वन अधिकारियों द्वारा इन निर्दोष आदिवासियों पर उनके बच्चों के सामने शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस सब का बच्चों के दिमाग पर स्थायी प्रभाव पड़ेगा.

उनका मानना ​​है कि ये बच्चे कट्टरपंथी के रूप में बड़े हो सकते हैं और सिस्टम के खिलाफ़ मजबूत भावनाओं को विकसित कर सकते हैं. क्योंकि वे बहुत अधिक मानसिक पीड़ा से गुजरते हैं जो उनकी विचार प्रक्रियाओं को प्रभावित करेगा. कई मनोवैज्ञानिक शोधों ने साबित किया कि ऐसी घटनाओं का असर बच्चों पर ज्यादा होगा.

आदिलाबाद के मनोचिकित्सक डॉ ओम प्रकाश ने कहा कि 11 साल से कम उम्र के बच्चों के बचपन में इस तरह के डरावने दृश्य और परेशान करने वाली घटनाएं देखने के बाद उनके व्यक्तित्व पर कई प्रभाव पड़ते हैं. उन्होंने कहा कि बच्चों के बड़े होने के दौरान क्रूर घटनाओं के संपर्क में आने से उनमें ‘पैनिक डिसऑर्डर’ और ‘एगोराफोबिया’ हो सकता है और इस तरह की घटनाएं लंबे समय में उनके व्यक्तित्व को आकार देंगे.

डॉ ओम प्रकाश ने कहा, “बुरी घटनाओं का बच्चों के व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और वे उन लोगों के खिलाफ दुश्मनी पैदा करेंगे जिन्होंने उनके परिवार के सदस्यों को नुकसान पहुंचाया है.”

दरअसल कोयापोशागुडेम में पोडु की खेती में शामिल कई स्तनपान कराने वाली माताओं को एक महीने पहले गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था. माताओं को अपने स्तनपान कराने वाले बच्चों से अलग करने के लिए पहले से ही वन कर्मचारियों को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

पहले ही आदिवासी महिला और पोडू किसानों को घसीटते हुए वन कर्मचारियों और पुलिस के वीडियो फुटेज ने आदिवासी युवाओं में अशांति पैदा कर दी है. खासकर तत्कालीन आदिलाबाद, करीमनगर, वारंगल और खम्मम में.

पोडू की खेती से बेदखल करने के लिए कथित तौर पर आदिवासी क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं दिन पर दिन बढ़ रहे हैं. हाल ही में कोयापोशागुडेम में दिल दहला देने वाले दृश्य देख आदिवासी समुदाय के लोगों ने दुख जताया. आदिवासी युवाओं ने आदिवासी महिलाओं और कई युवाओं के साथ अमानवीय व्यवहार की घटनाओं की कड़ी निंदा की, जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए.

टुडुम देब्बा आदिलाबाद जिले के महासचिव पुरका बापुराव ने कहा कि आदिवासी महिलाओं के साथ वन विभाग के अधिकारियों और पुलिस द्वारा दुर्व्यवहार की घटनाओं ने आदिवासी युवाओं में अशांति पैदा की और यहां तक ​​कि गैर-आदिवासियों ने भी ऐसी घटनाओं की कड़ी निंदा की.

आदिवासी संगठन टुडुम देब्बा ने पोडु भूमि की खेती के लिए आदिवासियों पर वन विभाग और पुलिस अधिकारियों के अत्याचारों के विरोध में सोमवार को पूर्व आदिलाबाद में बंद का आयोजन किया था.

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