पुरुष-प्रधान कला में नाम कमाने वाली पहली आदिवासी महिला – मार्सुकोला कलावती

कलावती के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि वह इस कला के क्षेत्र में एक प्रमुख गायिका के रूप में उभर सकी हैं, जब परंपरा के अनुसार इसमें पुरुषों को दबदबा है.

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आदिलाबाद में गोंड और कोलम आदिवासियों के पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियों को गाने के रूप में सुनाना एक मशहूर कला है. और इस कला को जिंदा रखने का काम सदियों से पुरुष ही करते आए हैं. लेकिन अब 52 साल की एक आदिवासी महिला ने इस पुरुष-प्रधान कला में अपनी जगह बनाई है.

अपनी सुरीली आवाज़ से 52 साल की मार्सुकोला कलावती आदिवासी विवाह और दूसरे समारोहों में दर्शकों का मन मोह लेती हैं. वह अब तेलंगाना के तत्कालीन आदिलाबाद जिले और पड़ोसी महाराष्ट्र के नांदेड़ में काफ़ी लोकप्रिय हैं. उनकी गिनती तोटी और परधान आदिवासी समुदायों में इन कहानियों को पूरी तरहे से जानने और सुनाने वाले कुछ गिने-चुने मशहूर कलाकारों में होती है.

कलावती के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि वह इस कला के क्षेत्र में एक प्रमुख गायिका के रूप में उभर सकी हैं, जब परंपरा के अनुसार इसमें पुरुषों को दबदबा है. उनकी यह कामयाबी उनके पिता स्वर्गीय तोडासम भीम राव, जो खुद एक मशहूर तोटी कलाकार हैं, द्वारा दिए गए प्रशिक्षण की बदौलत है.

तोडासम भीम राव तोटी आदिवासियों के किसी कार्यक्रम में गोंड भाषा में गाना गाने वाले अकेले कलाकार थे. कुछ गानों के बोल उन्होंने खुद भी लिखे थे. उनके निधन के बाद, मार्सुकोला कलावती ने यह ज़िम्मा लिया, और इसे पूरे उत्साह के साथ कर रही हैं.

असल में मार्सुकोला कलावती का सपना स्कूल जाने का था. लेकिन अपने पिता की इस कला में रुचि, और परिवार की पहचान को बनाए रखने के लिए कलावती ने कला को अपनाया. आज आलम यह है कि इलाक़े की किसी आदिवासी शादी में उनकी मौजूदगी ज़रूरी हो गई है. वह इसके लिए पैसे नहीं मांगतीं. कार्यक्रम के आयोजक उन्हें जो देते हैं, वह उसी से संतुष्ट हो जाती हैं.

उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए, ऑल इंडिया रेडियो (AIR) ने उन्हें शो करने का मौक़ा दिया. आकाशवाणी ने उनके गीतों के वीडियो भी साझा किए, जो हिट हो गए.

कौन हैं तोटी?

तोटी आदिवासी समुदाय को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह यानि पीवीटीजी के तहत वर्गीकृत किया गया है. वो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की 12 आदिम जनजातियों में से एक हैं. उनकी पहचान गायक और कहानीकारों के रूप में होगी है. तोटी समुदाय के लिए अपनी आजीविका के लिए गोंडों के लिए गाते हैं, और उनसे बदले में खाने का सामान, जैसे कुछ किलो ज्वार ले लेते हैं.

गोंड आदिवासियों द्वारा तोटी गायकों को अपने पूर्वजों, अपनी सांस्कृतिक विरासत, और जीवन के बारे में गाना गाने के लिए आमंत्रित किया जाता है. उनकी संगीत मंडली में एक मुख्य गायक, जो आमतौर पर पुरुष होता है, और एक संगीतकार (आमतौर गायक की पत्नी), एक आदमी जो कीकरी नाम का एक वाद्य यंत्र बजाता है, एक दूसरा आदमी जो छोटी ढाकी बजाता है, और कुछ कोरस गायक होते हैं.

(तस्वीर सौजन्य: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस)

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