बुंदेलखंड के सूखे कंठों की प्यास बुझाने के नाम पर शुरू की गई देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’, अब विकास और विनाश के बीच एक बड़े संघर्ष का केंद्र बन गई है.
छतरपुर और पन्ना जिलों के सीमावर्ती जंगलों में हज़ारों आदिवासियों और किसानों ने सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है. यह विरोध अब केवल ज्ञापन तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘जल सत्याग्रह’ और ‘चिता आंदोलन’ जैसे अत्यंत भावुक और गंभीर स्वरूप अख्तियार कर चुका है.
आंदोलन का सबसे विचलित करने वाला दृश्य तब सामने आया जब ढोड़न बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों की आदिवासी महिलाएं जलती लकड़ियों के बीच बनी प्रतीकात्मक चिताओं पर लेट गईं.
प्रदर्शनकारियों का तर्क स्पष्ट है—पुनर्वास के नाम पर मिलने वाली मामूली राशि उनके पुस्तैनी जंगलों और जमीन का विकल्प नहीं हो सकती. ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन उन्हें बिना किसी ठोस वैकल्पिक व्यवस्था के बेदखल करने की तैयारी में है.
आंदोलन के प्रमुख बिंदु और संवैधानिक चुनौतियां
आदिवासी समाज और जय किसान संगठन के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन ने प्रशासन के समक्ष कई कड़े प्रश्न खड़े किए हैं:
- पेसा (PESA) कानून का उल्लंघन: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि अनुसूचित क्षेत्र होने के बावजूद ग्राम सभाओं की वास्तविक सहमति नहीं ली गई. कई मामलों में कागजी कोरम पूरा कर ‘फर्जी ग्राम सभा’ के प्रस्ताव पारित किए गए.
- अपर्याप्त मुआवजा नीति: सरकार द्वारा प्रस्तावित ₹12.5 लाख का विस्थापन पैकेज आज की महंगाई और जमीन की कीमतों के हिसाब से अपर्याप्त माना जा रहा है. आदिवासियों की मांग ‘जमीन के बदले जमीन’ की है.
- पारिस्थितिक तंत्र पर आघात: इस परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व का लगभग 5,803 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल बाघों का गलियारा (Corridor) नष्ट होगा, बल्कि लाखों पेड़ों की कटाई से स्थानीय सूक्ष्म जलवायु (Micro-climate) पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा.
प्रशासनिक रुख और गतिरोध
दूसरी ओर, शासन-प्रशासन का दावा है कि यह परियोजना बुंदेलखंड के 9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित करेगी और 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराएगी. अधिकारियों के अनुसार, मुआवजे का वितरण नियमानुसार किया जा रहा है और विकास के बड़े उद्देश्यों के लिए कुछ समझौते अनिवार्य हैं.
हालांकि, धरातल पर स्थिति इसके विपरीत बताई जाती है. पिछले कई दिनों से बांध निर्माण का कार्य पूरी तरह ठप है. भारी पुलिस बल की तैनाती के बावजूद ग्रामीणों का साहस डगमगाया नहीं है.
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी मांगों पर उच्च स्तरीय वार्ता नहीं होती और विस्थापन की शर्तें पारदर्शी नहीं की जातीं, वे अपनी जमीन से एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे.
केन-बेतवा परियोजना आज भारत के नीति-निर्धारकों के लिए एक बड़ी कसौटी है.

