जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) ने हाल ही में एक आधिकारिक मेमोरेंडम जारी किया है. इसमें कहा गया है कि वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत वन भूमि के इस्तेमाल का तरीका बदलने (डायवर्जन) के लिए ग्राम सभाओं की सहमति लेने का कोई प्रावधान नहीं है.
यह बात कानून को कमजोर करती है और इसके एक बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन करती है.
अभी जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है, उसमें किसी विकास परियोजना को मंज़ूरी देने के लिए सभी संबंधित ग्राम सभाओं की सहमति ज़रूरी होती है.
इस प्रक्रिया के केंद्र में स्थानीय लोगों की आजीविका, सामुदायिक भूमि अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रावधान है.
यह शर्त यह पक्का करती है कि प्रस्तावित परियोजना से उस इलाके के पर्यावरण या पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान न पहुंचे, जिससे वनों पर निर्भर समुदायों (जो ज़्यादातर आदिवासी समूहों से होते हैं) के जीवन पर बुरा असर न पड़े.
सबसे अहम बात यह है कि ग्राम सभाओं की सहमति का प्रावधान इन समुदायों की भागीदारी को दर्शाता है. यह एक ऐसे मुद्दे पर लोकतांत्रिक तरीके से फ़ैसला लेने की प्रक्रिया है जो सीधे तौर पर उनके जीवन को प्रभावित करता है.
लेकिन अगर सहमति की इस ज़रूरत को कम किया जाता है, तो समुदायों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा खत्म हो जाएगी. इससे सरकार और उसकी एजेंसियां, जंगल और आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोगों की इच्छा और हितों के खिलाफ़ विकास परियोजनाएं शुरू कर सकेंगी.
यह बात एक संसदीय समिति के उस प्रस्ताव से आई है जिसमें परियोजनाओं को मंज़ूरी देने के लिए सभी संबंधित ग्राम सभाओं की सहमति की ज़रूरत नहीं होगी.
सभी ग्राम सभाओं से सहमति लेने में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों का हवाला देते हुए, समिति ने सहमति की सीमा को घटाकर 70-75 प्रतिशत करने का सुझाव दिया, जिसे उसने “क्वालिफ़ाइड सुपर-मेजोरिटी” (खास तरह की भारी बहुमत) कहा.
यह दावा किया गया था कि पूरी सहमति की ज़रूरत के कारण प्रोजेक्ट में देरी होती है, कभी-कभी तो सालों लग जाते हैं. हालांकि, सीमा कम करने से प्रक्रियाओं में हेरफेर की गुंजाइश बन जाती है.
विकास से सबसे ज़्यादा प्रभावित गांव अल्पसंख्यक स्थिति में आ सकते हैं और इस तरह उनकी जायज़ आपत्तियों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.
हालांकि FRA में सभी ग्राम सभाओं से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत के बारे में साफ़ तौर पर नहीं कहा गया है लेकिन यह कानून की भावना के अनुरूप है. कानून की किसी और तरह से व्याख्या करने से इसका मकसद ही खत्म हो जाता है.
आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों और विपक्षी दलों ने MoTA (जनजातीय मामलों के मंत्रालय) के इस कदम की आलोचना की है कि वह इस मामले से खुद को अलग कर रहा है.
उनका कहना है कि यह मामला मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है और उन्होंने इस मेमोरेंडम को वापस लेने की मांग की है.
इन संगठनों का तर्क है कि मंत्रालय का रुख़ बड़ी कंपनियों के पक्ष में है.
सहमति लेने में होने वाली देरी के खिलाफ़ दिए गए तर्क पर सवाल उठाते हुए, उन्होंने कहा है कि लंबी सरकारी प्रक्रियाओं के कारण भी काम पेंडिंग रहता है.
पर्यावरण कानूनों और आदिवासी अधिकारों को कमज़ोर करने के बजाय, सरकार को उन्हें मज़बूत करना चाहिए. जब ये सुरक्षा उपाय कई मोर्चों पर भारी दबाव में हो तो सरकार इनके लागू होने में ढिलाई नहीं बरत सकती.
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने FRA को गलत समझा है – जयराम रमेश
हाल ही में कांग्रेस नेता और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव जयराम रमेश ने भी जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) की इस राय की आलोचना की थी. जिसमें कहा गया है कि सड़कों, खनन या उद्योगों जैसी परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग की अनुमति देने में ग्राम सभा की सहमति आवश्यक नहीं है.
जयराम रमेश ने कहा कि मंत्रालय की यह स्थिति वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) की गंभीर गलत व्याख्या को दर्शाती है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंत्रालय अपनी ही पिछली गाइडलाइनों और आधिकारिक रुख से पीछे हट रहा है.
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
यह विवाद जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा 31 अगस्त को राष्ट्रीय जलविद्युत निगम लिमिटेड (NHPC/NHPCL) को भेजे गए एक आधिकारिक ज्ञापन के बाद सामने आया.
ज्ञापन में मंत्रालय ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 में वन क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए ग्राम सभा से मंजूरी लेने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस तरह की मंजूरी का विषय उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता.
वन अधिकार अधिनियम क्या है?
वन अधिकार अधिनियम, 2006 का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन संबंधी अधिकारों को कानूनी मान्यता देना है.
इस कानून में ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण है. किसी वन क्षेत्र में परियोजना प्रस्ताव आने पर स्थानीय स्तर पर वन अधिकार समिति और ग्राम सभा की प्रक्रिया शुरू होती है. इसके बाद मामला उप-मंडल और जिला स्तर की समितियों तक जाता है.
FRA की धारा 5 ग्राम सभाओं को वन्यजीवों, जंगलों और जैव विविधता की रक्षा करने तथा सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, पुनर्जीवन और टिकाऊ प्रबंधन की जिम्मेदारी और अधिकार देती है.
इसका मतलब है कि ग्राम सभा केवल औपचारिक संस्था नहीं है, बल्कि सामुदायिक वन संसाधनों और स्थानीय वन अधिकारों की सुरक्षा में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है.
जब किसी वन भूमि को खनन, बांध, सड़क या किसी अन्य गैर-वन उपयोग के लिए परिवर्तित किया जाता है, तो सामान्यतः वन मंजूरी की प्रक्रिया अपनाई जाती है.
यह प्रक्रिया दो चरणों में होती है. पहले चरण में सरकार सैद्धांतिक या ‘इन-प्रिंसिपल’ मंजूरी देती है. इसके बाद अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया आती है, जिसमें ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.
जयराम रमेश ने मंत्रालय की 2012, 2018 और 2023 की पिछली स्थितियों का हवाला देते हुए कहा था कि पहले मंत्रालय स्वयं वन भूमि से जुड़े परियोजना प्रस्तावों में ग्राम सभा की सहमति को आवश्यक मानता रहा है.
उन्होंने यह भी कहा कि मंत्रालय की अपनी वेबसाइट यह स्पष्ट करती है कि वन अधिकार अधिनियम को लागू करने की जिम्मेदारी जनजातीय कार्य मंत्रालय की है.
यह विवाद उस समय और बढ़ गया जब सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अगस्त की शुरुआत में NHPC से संबंधित एक रिपोर्ट जारी की.
रिपोर्ट में कहा गया कि कई जलविद्युत परियोजनाओं में 100 प्रतिशत ग्राम सभा सहमति की आवश्यकता के कारण देरी हो रही है.
समिति ने उल्लेख किया कि कुछ परियोजनाएं इसलिए लंबे समय से रुकी हुई हैं क्योंकि कुछ ग्राम पंचायतों से सहमति प्राप्त करने में देरी हो रही है.
समिति ने राष्ट्रीय महत्व वाली बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के लिए 100 प्रतिशत सहमति की आवश्यकता को घटाकर 70–75 प्रतिशत करने की सिफारिश भी की.
कानून में अस्पष्टता
विवाद का एक महत्वपूर्ण कारण कानूनी अस्पष्टता है.
वन अधिकार अधिनियम में यह स्पष्ट रूप से नहीं लिखा है कि वन भूमि पर गैर-वन परियोजना शुरू करने के लिए 100 प्रतिशत ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है.
लेकिन दूसरी ओर कानून ग्राम सभा को वन अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधनों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण अधिकार देता है.
FRA केवल कुछ चुनिंदा जनजातीय राज्यों तक सीमित कानून नहीं है. इसे देश के लगभग 20 राज्यों में लागू किया गया है.
समस्या यह भी है कि कई ग्राम सभाओं के पास अपने वन क्षेत्रों से संबंधित पर्याप्त रिकॉर्ड, नक्शे और प्रशासनिक सहायता नहीं होती. ऐसे में बड़ी परियोजनाओं के सामने उनके लिए अपने अधिकारों की प्रभावी ढंग से रक्षा करना कठिन हो सकता है.
जयराम रमेश की मुख्य आपत्ति
जयराम रमेश का तर्क है कि वन अधिकार अधिनियम द्वारा ग्राम सभाओं को दिए गए सुरक्षा उपायों को केवल तकनीकी या औपचारिक प्रक्रिया नहीं माना जा सकता.
उनके अनुसार, यदि जनजातीय कार्य मंत्रालय स्वयं वन अधिकार अधिनियम के संचालन से दूरी बनाता है, जबकि उसी समय वनवासियों और उनके अधिकारों पर दबाव बना हुआ है, तो यह कानून की मूल भावना को कमजोर करेगा.
उन्होंने मंत्रालय की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसे वन अधिकार अधिनियम के तहत अपने वैधानिक दायित्व से पीछे नहीं हटना चाहिए.
वन क्षेत्र को साफ़ करने के लिए ग्राम सभा की मंज़ूरी से जुड़े मामलों से खुद को अलग रखने का जनजातीय मामलों के मंत्रालय का रुख़, इस मुद्दे से जुड़े अहम मामलों में उसके पहले के स्टैंड के ही अनुरूप है.
इनमें निकोबार मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट या मध्य प्रदेश, कर्नाटक और कई अन्य राज्यों में FRA (वन अधिकार अधिनियम) को लागू करने से जुड़े दूसरे स्वतंत्र मामले शामिल हैं.
वन अधिकारों से जुड़े इन मामलों में भी जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने कहा है कि इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है. मंत्रालय का तर्क है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि FRA के तहत इस क़ानून को लागू करने की ज़िम्मेदारी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों की है.

