आरकु घाटी का बम्बू चिकन और कॉफ़ी, लाइफ़ लाइन है तो ज़ोखिम भी है

आरकु घाटी की ख़ूबसूरती, बम्बू चिकन और कॉफ़ी सैलानियों को खींचती है तो बिज़नेस और मुनाफ़े का अवसर यहाँ व्यापारियों को भी खींच रहा है. आपको शायद ही कहीं बताया जाएगा कि यह शत-प्रतिशत आदिवासी इलाक़ा है. इसकी अपनी अलग भाषा बोली और जीने का तौर तरीक़ा है.

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आरकु घाटी की ख़ूबसूरत पहाड़ियों और दिलकश नज़ारों के लिए जानी जाती है. यहाँ की ख़ूबसूरती के अलावा दो और चीज़ें हैं जो लोगों को सैलानियों को यहाँ खींच लाती हैं. पहली है चीज़ है बम्बू चिकन और दूसरी है यहाँ की कॉफ़ी.

आरकु घाटी की ख़ूबसूरती, बम्बू चिकन और कॉफ़ी सैलानियों को खींचती है तो बिज़नेस और मुनाफ़े का अवसर यहाँ व्यापारियों को भी खींच रहा है. आप आरकु घाटी पर जानकारी जुटाने की कोशिश करेंगे तो आपको आरकु की ख़ूबसूरती और बम्बू चिकन, कॉफी के बारे में जानकारी मिलेगी.

आपको शायद ही कहीं बताया जाएगा कि यह शत-प्रतिशत आदिवासी इलाक़ा है. इसकी अपनी अलग भाषा बोली और जीने का तौर तरीक़ा है. मैं भी भारत की टीम को एक बार फिर आरकु घाटी जाने का मौक़ा मिला.

फिर एक बार यहाँ के आदिवासियों से मिले, उनके साथ रहे और खूब बातें हुईं. इसी सिलसिले की एक यह एक कहानी है.

आरकु घाटी के आदिवासी गाँवों में एक है गुंजाईगुड़ा. पहाड़ी ढलान पर बसा यह एक छोटा सा गाँव कोंडा दोरा आदिवासियों का है. यहाँ पर हमारी मुलाक़ात गुरूमूर्ती के परिवार से हुई थी.

गुरुमूर्ती के परिवार के साथ हमें ट्राइबल किचन का एपिसोड शूट करना था. जैसा अक्सर होता है कि खाना भी बना और इस परिवा से लंबी बातचीत भी हुई. उन्होंने हमें बताया कि अब उस गाँव के आदिवासी अपनी परंपरागत फ़सलों के अलावा कॉफ़ी और काली मिर्च की पैदावार करते हैं. जिन परिवारों के पास ज़मीन नहीं है या कम ज़मीन है वो मज़दूरी करते हैं.

इनमें से ज़्यादातर खेत मज़दूर हैं और कॉफी के बड़े बाग़ानों में काम करते हैं. उन्होंने बताया कि कॉफ़ी की खेती से निश्चित ही आदिवासी किसानों को लाभ मिला है. लेकिन जिस तरह से अक्सर मीडिया में बदलाव की पॉज़िटिव कहानियाँ छपती हैं, उतना बड़ा बदलाव तो नहीं आया है.

बेशक कॉफ़ी और काली मिर्च की बाज़ार में माँग भी है और दाम भी अच्छे मिलते हैं. लेकिन आदिवासियों के छोटे खेतों में इसकी सीमित मात्रा ही पैदा होती है. अंततः मुनाफ़े का बड़ा हिस्सा व्यापारियों को ही मिलता है.

उन्होंने बताया कि इस इलाक़े में एक एनजीओ काम करता है. यह एनजीओ किसानों को कॉफी को प्रोसेस करने की मशीन उपलब्ध करवाता है. कॉफी प्रोसेस होने के बाद एनजीओ किसानों से काफ़ी ख़रीद लेता है.

आदिवासी नेता सुरेंद्रा किल्लो से बातचीत के दौरान की फ़ोटो

यहाँ के एक आदिवासी नेता सुरेंद्रा किल्लो ने हमें बताया कि दरअसल यह एनजीओ भी किसी व्यापारी की तरह ही काम करता है. आरकु घाटी में संवैधानिक प्रावधानों के तहत ग़ैर आदिवासी ज़मीन नहीं ख़रीद सकता है.

लेकिन इस संगठन ने एक ट्रस्ट बना कर आदिवासियों से ज़मीनें लीज़ पर लेकर कॉफी उत्पादन शुरू किया है. वो कहते हैं कि बेशक कॉफी से आदिवासियों को रोज़गार मिला है. लेकिन जितनी मज़दूरी या लाभ मिलना चाहिए उतना नहीं मिल रहा है.

वो कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कॉफ़ी की क़ीमत काफ़ी है. आरकु कॉफी अब एक बड़ा ब्रांड है. लेकिन अफ़सोस कि यह एनजीओ भी आदिवासी किसानों और मज़दूरों को पूरी मज़दूरी या दाम नहीं देता है.

इस तरह की कई बातें और कहानियाँ हमें इस गाँव और आस-पास के गाँवों में मिलती चली गई. गुरूमूर्ती के परिवार ने हमें कहा कि हम उनके साथ रात का खाना खाएँ. उन्होंने हमारी टीम के लिए बांस में भर बनाए जाने वाला चिकन बनाया. यह वीडियो आप उपर देख सकते हैं.

इस बातचीत में कई और बातें भी पता चलीं. इन बातों में कई बातें सुन कर अच्छा लगा. मसलन अब आदिवासी अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं. वो धीरे धीरे संगठित हो रहे हैं और अपने हक़ों की बात कर रहे हैं.

लेकिन ज़्यादातर बातें परेशान करने वाली थीं. मसलन आरकु घाटी में नशीले पदार्थों का सेवन बढ़ रहा है. इसके अलावा नियमों को धता बता कर या फिर चालाकी से आदिवासियों की ज़मीनें हड़पी जा रही हैं.

आदिवासियों में जो जानकारी लोग हैं या फिर जो राजनीति में हैं, वो बेबस नज़र आते हैं. ये लोग बेशक लगातार लड़ भी रहे हैं और लोगों को जागरूक भी बना रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि ज़मीन क़ब्ज़ा करने वाले हों या फिर कॉफी का धंधा करने वाले इन सभी के पास पैसे की भरमार है.

पैसे के दम पर वो आदिवासी नेताओं और जागरूक लोगों की आवाज़ को दबा देते हैं. इस बातचीत में जिन तथ्यों का ज़िक्र हो रहा था वो हमने भी यहाँ घूमते हुए महसूस किया था. आरकू घाटी में विकास हो रहा है. अच्छी सड़कें बन रही हैं और सैलानियों की आमद बढ़ रही है.

इससे यहाँ रोज़गार बढ़ा है, लेकिन विकास के लिए निवेश करने वाले की प्राथमिकता अंततः अधिक से अधिक मुनाफ़ा है. विकास के साथ आदिवासियों और ग्रामीणों के साथ धोखाधड़ी और शोषण का जो ख़तरा होता है, वो यहाँ साफ़ दिखाई देता है.

विकास के साथ अपनी ज़मीन और जंगल लूट जाने के जोखिम के बीच आरकु घाटी का आदिवासी भी जी रहा है.

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