ओडिशा की 13 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) में से एक चुक्तिया भुंजिया जनजाति (Chuktia Bhunjia) संख्यात्मक रूप से छोटी जनजाति है.
यह आदिवासी समुदाय प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड प्रजातीय समूह से संबंधित है. ‘भुंजिया’ नाम का अर्थ है जो मिट्टी या भूमि पर रहता है.
सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान
भुंजिया जनजाति बैगा और छत्तीसगढ़ी की मिश्रित बोली बोलती है. यह जनजाति दो भागों में विभाजित है, चुक्तिया भुंजिया और चिंदा भुंजिया.
पहला वर्ग विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) का प्रतिनिधित्व करता है. दूसरा वर्ग शायद ‘हालबा’ और ‘गोंड’ का मिश्रित वंशज है, और खुद को सुनाबेड़ा पठार की पहाड़ियों का मूल निवासी मानता है.
साल 2007 के सर्वेक्षण के अनुसार, सीबीडीए, सुनाबेड़ा माइक्रो प्रोजेक्ट क्षेत्र में चुक्तिया भुंजिया की जनसंख्या 2269 (पुरुष 1124 और महिला 1145) थी. 2001-2007 की अवधि के दौरान उनके बीच वृद्धि दर 3.96 प्रतिशत थी. लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 1018 महिलाएं है.
उनके बीच साक्षरता दर 18.77 प्रतिशत थी (पुरुषों के लिए 28.55 प्रतिशत और महिलाओं के लिए 9.17 प्रतिशत).
चुक्तिया भुंजिया की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान उनके पवित्र रसोई-घर से अलग झलकती है. यह एक छोटा सा छप्पर होता है, जो अन्य कमरों से थोड़ा दूर बनाया जाता है और चारों तरफ से घिरा होता है ताकि उनकी शादीशुदा बेटी सहित किसी भी बाहरी व्यक्ति के स्पर्श से इसे बचाया जा सके.
अगर कोई बाहरी व्यक्ति रसोई के छप्पर को छू लेता है, तो उसमें आग लगा दी जाती है और उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है. जब तक नया रसोईघर नहीं बन जाता, तब तक खाना एक अस्थायी बंद या खुली जगह में बनाया जाता है.
महिलाएं कोई अंतःवस्त्र नहीं पहनती हैं बल्कि केवल साड़ी पहनती हैं. वे मनके और सिक्कों के हार, पीतल और कांच की चूड़ियां, एल्यूमीनियम या चांदी के बने झुमके पहनती हैं.
महिलाएं अपने बालों को बहुत ही शालीन तरीके से संवारती हैं और सिर के पीछे एक भारी फुंदने को बांधकर बालों को अपनी जगह पर बनाए रखने के लिए पिन लगाकर एक बड़ा जूड़ा बनाती हैं.
गोदना (टैटू) चुक्तिया भुंजिया महिलाओं के शारीरिक सौंदर्य को और बढ़ाता है. पीढ़ियों से युवा और बुर्जुग दोनों महिलाएं अपने हाथों और बाहों को कई तरह डिजाइनों के गोदना निशानों से सजाती रही हैं.
हालांकि, अब आधुनिकता के प्रभाव में युवा पीढ़ी ऐसे गोदना के निशान नहीं बनवाते हैं.
चुक्तिया भुंजिया पुरुष मुख्य रूप से कपड़े का एक टुकड़ा (लंगोट/धोती) पहनते हैं. वहीं समृद्ध वर्ग अंडरवियर और शर्ट पहनता है.
बस्ती और आवास
चुक्तिया भुंजिया की बस्तियों का आकार अलग-अलग होता है, जो 8-10 घरों से लेकर 50-60 घरों तक होता है. गांव की सीमा की रक्षा कई देवी-देवता करते हैं जो गांव को बुरी आत्माओं के प्रवेश से बचाते हैं.
चुक्तिया भुंजिया परिवारों के घर एक विशेष तरीके से व्यवस्थित होते हैं. दो या दो से अधिक परिवार एक विस्तृत खुली जगह लेकर अपने व्यक्तिगत घर बनाते हैं.
एक भुंजिया घर में आमतौर पर तीन झोपड़ियां होती हैं: सबसे बड़ी झोपड़ी रहने-सह-भंडारण कक्ष के रूप में काम आता है. इसके बगल में बनी दूसरी झोपड़ी का उपयोग पशुओं के लिए किया जाता है और सामने वाली तीसरी झोपड़ी रसोई होती है.
घर मिट्टी का बना होता है और जंगली घास से छाया होता है. रहने वाले कमरे और रसोई-घर को छोड़कर इसमें दरवाजे नहीं होते हैं. फर्श को गोबर या लाल मिट्टी से लीपा जाता है और दीवारों को लाल और सफेद मिट्टी से रंगा जाता है. भुंजिया के अधिकांश घरों की दीवारों पर फूलों और जानवरों के चित्र बने होते हैं.
खान-पान
चावल चुक्तिया भुंजिया का मुख्य भोजन है. मुख्य रूप से अरवा (सूरज की रोशनी में सुखाया गया) चावल खाया जाता है. वे मक्का, बाजरा और छोटे मोटे अनाज, दालें और सब्जियां जैसे पपीता, कद्दू, बैंगन, शकरकंद, सरसों और अन्य तिलहन भी खाते हैं.
चावल के मांड के साथ पकाए गए मोटे अनाज और सब्जियों के विभिन्न व्यंजन उनके मुख्य खाद्य पदार्थ हैं.
महुआ का फूल चुक्तिया भुंजिया जनजाति का पसंदीदा भोजन है क्योंकि यह स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है. वे फूलों को तलते हैं और उनकी जेली-बॉल्स बनाकर भविष्य के उपयोग के लिए रख लेते हैं.
पुरुष और महिलाएं दोनों मांसाहारी हैं और शराब/नशे से परहेज करने वाले हैं. कभी-कभी, वे उन जानवरों का मांस खाते हैं जिन्हें वे पालते हैं, बलि देते हैं और शिकार करते हैं; वे अंडे और मछली भी खाते हैं.
महिलाओं को मुर्गे का मांस खाने की मनाही है और गर्भवती महिलाएं बलि के मांस का सेवन करने से बचती हैं.
पुरुष और महिला दोनों चाय पीते हैं. भुंजिया पुरुषों में तंबाकू पाउडर चबाना बहुत लोकप्रिय है. इसके अलावा पुरुष देसी बीड़ी या सिगरेट पीते हैं. उनके द्वारा इकट्ठा की गई कई प्रकार की जड़ें और कंद, फल, फूल आदि उनके भोजन की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं. बांस के कोपल (कराड़ी) भी उनका पसंदीदा खाद्य पदार्थ है.
जीविका और अर्थव्यवस्था
चुक्तिया भुंजिया का आर्थिक निर्वाह खेती-किसानी पर आधारित है. वे छोटे टुकड़ों में गीली भूमि (wetland) की खेती करते हैं और साथ ही झूम खेती (shifting cultivation) भी करते हैं जिसे वे ‘बेवर’ कहते हैं.
बेवर खेत में वे छोटे मोटे अनाज उगाते हैं, जैसे रागी, सुआन, गुल्जी आदि, दालें और सब्जियां जैसे उड़द, कांदुला, झुडुंग (बीन्स), बैंगन आदि, और रामतिल (तिलहन).
वे बाड़ी भूमि (किचन गार्डन) में बाजरा और जान्हा, खीरा और सरसों जैसे मोटे अनाज की खेती करते हैं.
धान की खेती मैदानी गीली जमीनों में छिटकाव और रोपाई (दाही) विधियों से की जाती है. हल, गाड़ी खींचने और कटाई के लिए बैलों और भैंसों का उपयोग किया जाता है.
डग वेल (कुआं) योजनाओं का लाभ उठाने वाले कुछ प्रगतिशील किसान अब गन्ना जैसी नकदी फसलें और केला, टमाटर, बंदगोभी और मिर्च जैसी सब्जियां उगाने में सक्षम हैं.
खेती-किसानी के अलावा ये लोग शिकार, फल-मूल इकट्ठा करना, पशुपालन, मछली पकड़ना और मजदूरी जैसे अन्य आर्थिक काम को अपनाते हैं.
पशुपालन उनके बीच बहुत लोकप्रिय नहीं है लेकिन ये लोग गाय, बैल, बकरी, भेड़, भैंस, कुत्ता, मुर्गी, कबूतर और तोता पालते हैं. बकरियां और मुर्गियां मुख्य रूप से बलि के उद्देश्यों के लिए और अक्सर आकस्मिक खर्चों को पूरा करने के लिए बिक्री हेतु पाली जाती हैं.
चुक्तिया भुंजिया जंगलों से बांस इकट्ठा करते हैं. बांस को पट्टियों में काटते हैं और सिंगा, मछली पकड़ने के उपकरण, अनाज जमा करने के लिए टोकरियां और घरों और बाड़ में उपयोग के लिए बांस के ढांचे बनाते हैं.
सामाजिक जीवन
परिवार भुंजियाओं के बीच सबसे छोटी सामाजिक इकाई है. इनके समाज में एकल (nuclear) परिवार देखने को मिलता है, जिसमें माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं. परिवार का आकार 3 से 10 या उससे भी अधिक सदस्यों तक भिन्न होता है.
बेटे की शादी होने के बाद वह उसी गांव में एक अलग जगह पर अपने परिवार के साथ रहता है. बेटी अपनी शादी के बाद अपने पिता का घर छोड़ देती है और अपने पति के साथ रहती है.
अविवाहित बेटे और बेटियां अपनी शादी तक अपने माता-पिता के साथ रहते हैं. माता-पिता की मृत्यु के बाद अविवाहित भाई-बहन अपनी शादी तक अपने शादीशुदा भाई के साथ रहते हैं.
परिवार का मुखिया आमतौर पर सबसे बड़ा पुरुष सदस्य होता है. इस तरह एक भुंजिया परिवार पितृस्थानीय, पितृवंशीय और पितृसत्तात्मक होता है.
चुक्तिया भुंजियाओं में समगोत्री संबंध (incest) वर्जित है. उनके समाज में विवाह को संतान उत्पति और आर्थिक उद्देश्यों के लिए पुरुष और महिला का मिलन माना जाता है. एक पुरुष या तो अपनी बुआ की बेटी से या अपनी मौसी/मामी की बेटी से शादी कर सकता है. इनके समाज में तलाक की सामाजिक अनुमति है.
धार्मिक जीवन और त्योहार
चुक्तिया भुंजिया कई देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. इनकी सर्वोच्च देवी को ‘सुनादेई’ के नाम से जाना जाता है. वह सुनाबेड़ा गांव के एक मंदिर में स्थापित हैं. सुनादेई की पूजा से तीन अनुष्ठानिक पदाधिकारी जुड़े हैं: पुजारी, छत्रिया और कटारिया.
पुजारी सुनादेई की पूजा में धार्मिक प्रमुख होता है, जो भोजन और प्रार्थना अर्पित करता है. छत्रिया पूजा के समय छाता खोलकर रखता है और कटारिया पशु की बलि देता है.
मुख्य पूजा सितंबर-अक्टूबर के महीने में दशहरा पर होती है जिसमें 84 गांवों के सभी भुंजिया सुनाबेड़ा में इकट्ठा होते हैं और देवी की पूजा करते हैं. इस दौरान बकरे और तोते की बलि दी जाती है.
मान्यता है कि अगर सही ढंग से देवी को प्रसन्न किया जाए तो वह गांव और ग्रामीणों के लिए बारिश और समृद्धि लाती है और बांझ महिलाओं को बच्चों का आशीर्वाद देती है.
ये लोग अब कई हिंदू देवी-देवताओं की भी पूजा करते हैं.
चुक्तिया भुंजिया दशहरा, बीज पवित्रीकरण और महुआ एकत्रीकरण जैसे अवसरों पर तीन वार्षिक मेले और त्योहार मनाते हैं, जो आजीविका और सामाजिक-शारीरिक भलाई से संबंधित हैं.
दशहरा के दौरान अक्टूबर-नवंबर के महीने में सुनादेई के मंदिर में 15 दिनों तक चलने वाला त्योहार आयोजित किया जाता है. प्रतिदिन सुनादेई के मंदिर में एक दीपक जलता रहता है. त्योहार के 15वें दिन, जिसमें दूर-दराज से लोगों का भारी जमावड़ा होता है, जलते हुए दीपक को एक बड़े और पुराने बरगद के पेड़ के नीचे लिंग (भगवान शिव का प्रतीक) के निवास स्थान पर लाया जाता है.
बरगद के पेड़ की खासियत यह है कि यह बिना ज्यादा जड़ों के सहारे चट्टानों पर खड़ा है, इसलिए इसे पवित्र माना जाता है,
मार्च-अप्रैल के महीने में बरगद के पेड़ के नीचे एक और त्योहार मनाया जाता है. इस त्योहार की खासियत यह है कि साल में पहली बार इस अवसर पर दाही खेती (झूम खेती) की पूजा की जाती है और इस दौरान पहली फसल को अर्पित किया जाता है.
राजनीति
भुंजियाओं के राजनीतिक संगठन में ग्राम परिषद और अंतर-ग्राम परिषद शामिल हैं. प्रत्येक भुंजिया गांव अपनी ग्राम परिषद और पारंपरिक नेताओं के समूह के साथ एक स्वतंत्र सामाजिक-राजनीतिक इकाई है.
पारंपरिक ग्राम परिषद में ‘भल-भाई’ नाम के बुजुर्ग पुरुष सदस्यों की एक संस्था शामिल होती है. पारंपरिक पदाधिकारी- पुजारी, छत्रिया, कटारिया और सभी बरागों के सबसे बड़े पुरुष सदस्य ग्राम परिषद के प्रामाणिक सदस्य होते हैं.
आम तौर पर महिलाओं को बुजुर्गों की परिषद की बैठक में भाग लेने की अनुमति नहीं होती है, लेकिन उन्हें विवादों में पक्षों और गवाहों के रूप में बुलाया जाता है.
परिषद झगड़े, वर्जनाओं के उल्लंघन और संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे मामलों से संबंधित विवादों का निपटारा करती है. परिषद का निर्णय सर्वसम्मति पर आधारित, निष्पक्ष और दोनों पक्षों के लिए बाध्यकारी होता है.
आत्महत्या, हत्या, चोरी और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान जैसे मामलों का फैसला अदालत में किया जाता है.
सभी संबंधित गांवों के बुजुर्गों की परिषद के प्रतिनिधि अंतर-ग्राम परिषद का गठन करते हैं. अध्यक्ष, अंतर-ग्राम परिषद का मुख्य प्रवक्ता होता है, जिसे ‘कुढ़’ (Kurha) के नाम से जाना जाता है. यह विशेष बैठकों में सभी संबंधित गांवों के विवादों का निपटारा करता है.
पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद दोनों व्यवस्थाओं, भल-भाई और पीआरआई (पंचायती राज संस्थाएं) का सह-अस्तित्व है. पीआरआई के लागू होने के परिणामस्वरूप, चुने हुए जन प्रतिनिधियों ने महिलाओं के लिए आरक्षण के साथ भूमिकाएं संभाली हैं, जो विरोधाभास के बजाय सहयोग में काम कर रही हैं.
परिवर्तन और विकास
समय के साथ चुक्तिया भुंजिया समाज और आवास में कई बदलाव आए हैं.
चुक्तिया भुंजिया के समग्र विकास के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली से वित्तीय सहायता के साथ ओडिशा सरकार द्वारा साल 1993-94 में एक सूक्ष्म परियोजना (चुक्तिया भुंजिया विकास एजेंसी – CBDA) की स्थापना और वन संसाधनों को वन्यजीव अभयारण्य में बदलने से बड़े बदलाव आए हैं.
90 के दशक में ग्राम पंचायतों द्वारा शुरू किए गए गांव की सड़कों के निर्माण, ट्यूबवेलों की स्थापना, सेनेटरी कुओं की खुदाई और सिंचाई तालाबों जैसे विकास कार्यों को सीबीडीए, सुनाबेड़ा द्वारा तेज किया गया है.
वन अधिकारियों द्वारा पाबंदी के कारण दाही (झूम) खेती पर रोक लगा दी गई है. सीबीडीए द्वारा कार्यान्वित सीसीडी योजना 2007-08 के माध्यम से विकास पहलों ने सुनाबेड़ा पठार के गांवों को साल भर सुगम बना दिया और लाभदायक रोजगार प्रदान किया.
चुक्तिया भुंजिया बच्चों के लिए शैक्षिक विकास कार्यक्रम प्राथमिकता रहे हैं. सीबीडीए ने पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास किए.
साल 2008 में गांव सालेईपाड़ा में एक आवासीय शैक्षिक परिसर की स्थापना की गई, जिसमें कम से कम 200 चुक्तिया भुंजिया लड़कियों की प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एचएससी-पास चुक्तिया भुंजिया युवाओं को अनुबंध शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के रूप में लगाया गया.
तालाबों, कुओं, चेक डैमों की खुदाई और भूमि विकास और फसल प्रदर्शनों के माध्यम से वैज्ञानिक खेती ने कृषि गतिविधियों में महत्वपूर्ण बदलाव लाए हैं.
प्रगतिशील किसान अब गन्ना, केला, पपीता, बैंगन, टमाटर, बंदगोभी, फूलगोभी और मिर्च जैसी नकदी फसलें उगाते हैं.
कौशल उन्नयन और बकरी या भेड़ पालन के माध्यम से महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के संवर्धन से महिलाओं का सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण हुआ है.
पारंपरिक मान्यताओं को तोड़ते हुए चुक्तिया भुंजिया लोगों ने छतों पर खपरैल की टाइलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है.
आधुनिक विकासात्मक परिवर्तनों के बीच उनकी मुख्य धार्मिक गतिविधियों और त्योहारों में निरंतरता बनी हुई है, जो उनकी समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करती है.

