छत्तीसगढ़ में जंगल बचाने के लिए 300 किलोमीटर के पैदल मार्च पर निकले आदिवासी

पैदल मार्च कर रहे आदिवासियों के नेताओं का कहना है कि इसके बावजूद मोदी सरकार ने गैरकानूनी तरीके से 7 कोल ब्लॉक का आवंटन राज्य सरकारों की कंपनियों को कर दिया. राज्य सरकारों ने इन कोल ब्लाकों को विकसित करने और खनन (MDO) के नाम पर अडानी कंपनी को सौंप दिया है.

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छत्तीसगढ़ में हसदेव नदी को बचाने के लिए आदिवासी पद यात्रा कर सरगुजा से राजधानी रायपुर के लिए निकले हैं. आदिवासियों का यह जत्था शुक्रवार को रतनपुर पहुंचाऔर 13 अक्टूबर को रायपुर पहुंच कर राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपेंगे

सरगुजा से 4 अक्टूबर को ये आदिवासी पैदल पैदल राजधानी रायपुर के लिए निकल पड़े थे. 

हसदेव जंगल उत्तरी कोरबा, दक्षिणी सरगुजा व सूरजपुर जिले में स्थित एक विशाल क्षेत्र है.यह जंगल जैव विविधता से भरी हसदेव नदी और उस पर बने मिनीमाता बागी बांध का केचमेंट है.

यहाँ से जांजगीर-चाम्पा, कोरबा, बिलासपुर के नागरिकों और खेतो की प्यास बुझाती है. इसके अलावा यह हाथी जैसे महत्वपूर्ण वन्य प्राणियों का रहवास और उनके आवाजाही का रास्ता (Elephant Corridor) भी है.

वर्ष 2010 में ख़ुद केन्द्रीय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हसदेव क्षेत्र में खनन को प्रतिबंधित रखते हुए इस पूरे जंगल को ‘नो-गो क्षेत्र घोषित किया था. 

वर्ष 2015 में हसदेव अरण्य क्षेत्र की 20 ग्रामसभाओं ने प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार को भेजे थे . इन ग्राम सभाओं ने कहा था कि उनके क्षेत्र में किसी भी कोल ब्लॉक का आबंटन/ नीलामी न की जाये. 

हसदेव नदी और जंगल

इन ग्राम सभाओं ने यह भी कहा था कि ऐसा किया गया तो आदिवासी और ग्राम सभाएँ इसका पुरजोर विरोध करेंगे. ग्राम सभाओं ने इन प्रस्तावों में कहा था कि अपने जल-जंगल-जमीन, आजीविका और संस्कृति की रक्षा करने का अधिकार संविधान से मिला है. संविधान की अनुसूचि 5 और पेसा कानून 1996 आदिवासियों को यह अधिकार देता है.

पैदल मार्च कर रहे आदिवासियों के नेताओं का कहना है कि इसके बावजूद मोदी सरकार ने गैरकानूनी तरीके से 7 कोल ब्लॉक का आवंटन राज्य सरकारों की कंपनियों को कर दिया. राज्य सरकारों ने इन कोल ब्लाकों को विकसित करने और खनन (MDO) के नाम पर अडानी कंपनी को सौंप दिया है. 

ग्राम सभाओं के द्वारा कोल ब्लॉक आवंटन का विरोध व आन्दोलन के बाद जून 2015 में राहुल गांधी ने भी वादा किया था कि वो जंगल बचाने की लड़ाई का समर्थन करते हैं.  लेकिन सत्ता में आने के बाद कांग्रेस पार्टी अपने वादे से मुकर रही है.  

हरदेव इलाक़े के ग्रामीणों ने साल 2019 में ग्राम फतेहपुर में 75 दिनों तक पर प्रदर्शन किया. आदिवासियों का कहना है कि वो अपने जल-जंगल-जमीन पर निर्भर हमारी आजीविका, हमारी संस्कृति और पर्यावरण को बचाने के लिए अहिंसक सत्याग्रह और आन्दोलन करने के लिए बाध्य हैं.

राज्य की राजधानी रायपुर के लिए पैदल मार्च पर निकले आदिवासियों की प्रशासन कई माँगे हैं. –

हसदेव अरण्य क्षेत्र की समस्त कोयला खनन परियोजना निरस्त करो.

ग्रामसभा सहमति के बिना हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोल बेयरिंग एक्ट 1957 के तहत किए गए सभी भूमि अधिग्रहण को तत्काल निरस्त करो.

पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी कानून से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के पूर्व ग्रामसभा से अनिवार्य सहमति के प्रावधान को लागू करो.

परसा कोल ब्लाक के लिए फर्जी प्रस्ताव बनाकर हासिल की गई वन स्वीकृति को तत्काल निरस्त करो एवं ग्रामसभा का फर्जी प्रस्ताव बनाने वाले अधिकारी और कम्पनी पर FIR दर्ज करो.

घाट्बर्रा के निरस्त सामुदायिक वनाधिकार को बहाल करते हुए सभी गाँव में सामुदायिक वन संसाधन और व्यक्तिगत वन अधिकारों को मान्यता दो.

पेसा कानून 1996 का पालन करो. 

(यह रिपोर्ट मार्च का नेतृत्व कर रहे लोगों की तरफ़ से भेजी गई जानकारी पर आधारित है. इसमें सरकार का पक्ष शामिल नहीं है.)

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