तेलंगाना: आदिवासियों के खेत क़ब्ज़ा करने के चक्कर में वन विभाग

राज्य के वारंगल ज़िले में आदिवासी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. ख़बरों के अनुसार वारंगल ज़िले में जब वन विभाग द्वारा पोडु ज़मीन पर क़ब्ज़े का विरोध कर रहे आदिवासियों को बलपूर्वक हटाया गया तो एक महिला ने ज़हर खा लिया. इस महिला को किसी तरह से पास के सरकारी अस्पताल में पहुँचाया गया.

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तेलंगाना में पोडु ज़मीन के मसले पर आदिवासी लगातार आंदोलन कर रहे हैं. इस सिलसिले में कई दिन से लगातार प्रदर्शनों का सिलसिला चल रहा है. पोडु ज़मीन दरअसल जंगल की वो ज़मीन है जिस पर आदिवासी खेती करते हैं. 

पिछले बुधवार यानि 10 फ़रवरी को वन विभाग (Forest Department) ने भद्राद्री कोठागुडम ज़िले के कई ब्लॉक में पोडु ज़मीन का समतलीकरण शुरू किया था. वन विभाग इस ज़मीन पर वृक्षारोपण करने की योजना बना रहा है. 

जंगल में इस ज़मीन पर आदिवासी और यहां रहने वाले दूसरे समुदाय लंबे समय से खेती कर रहे हैं. 

आदिवासियों ने वन विभाग की इस कार्यवाही के विरोध में प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन का नेतृत्व मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी कर रही है. इससे पहले मंगलवार को भी आदिवासियों ने प्रदर्शन किया था. 

राज्य के वारंगल ज़िले में आदिवासी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. ख़बरों के अनुसार वारंगल ज़िले में जब वन विभाग द्वारा पोडु ज़मीन पर क़ब्ज़े का विरोध कर रहे आदिवासियों को बलपूर्वक हटाया गया तो एक महिला ने ज़हर खा लिया. इस महिला को किसी तरह से पास के सरकारी अस्पताल में पहुँचाया गया. 

प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे खम्मम ज़िले के सीपीएम के नेता भुकैया वीरभद्रम का कहाना है कि राज्य के मुख्यमंत्री पोडु ज़मीन के मामले में अपने वादे से मुकर रहे हैं. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने चुनाव के समय यह वादा किया था कि वो पोडु ज़मीन के मसले का समाधान निकालेंगे. 

आदिवासी संगठन तेलंगाना गिरजन संघम प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहा है

उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी लंबे समय से राज्य सरकार से माँग कर रहे हैं कि इस मसले को सुलझाने के लिए एक कमेटी का गठन किया जाए. इस कमेटी में अधिकारी, आदिवासी संगठन, आदिवासी कार्यकर्ता और विशेषज्ञों को रखा जाना चाहिए. 

उन्होंने कहा कि इस कमेटी को इस पूरे मसले को सुलझा कर जल्दी से जल्दी वनाधिकार क़ानून 2006 (Forest Rights Act 2006) के तहत आदिवासी किसानों को ज़मीन के पट्टे दिए जाने चाहिएं. 

लेकिन सरकार आदिवासियों के खेतों पर ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा कर वहाँ पर वृक्षारोपण करना चाहती है. राज्य सरकार राज्य में ग्रीन कवर बढ़ाने के लिए वृक्षारोपण कार्यक्रम चला रही है जिसे हरिता हरम कहा जा रहा है. 

2015 से अभी तक आदिवासियों और सरकारी अधिकारियों के बीच कई हिंसक झड़प इस मसले की वजह से हो चुकी हैं. इसके साथ साथ कई आदिवासी संगठन पिछले कई साल से लगातार अपनी ज़मीन बचाने और मालिकाना हक़ पाने के लिए आंदोलन भी कर रहे हैं. 

आदिवासी संगठनों का कहना है कि जब वनाधिकार क़ानून 2006 को संयुक्त आंध्र प्रदेश राज्य में लागू किया गया था तो उस समय लगभग 25 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर आदिवासी खेती कर रहे थे. 

जनजातीय कार्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार तेलंगाना में जुलाई 2020 के अंत तक वनाधिकार क़ानून 2006 के तहत कुल 1,83,679 दावा पत्र सरकार को मिले हैं. लेकिन अभी तक सिर्फ़ 93, 639 आदिवासियों को ही ज़मीन का पट्टा दिया गया है. 

2017 से 2019 के बीच पोडु ज़मीन के दावों में से सिर्फ़ 145 आदिवासियों को पट्टा दिया गया है. 

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