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गुवाहाटी एक्सपेंशन प्रोजेक्ट के लिए आदिवासी काउंसिल इलाके से ज़मीन अधिग्रहण का विरोध

विरोध करने वालों ने सरकार से परियोजना को रोकने, भूमि अधिग्रहण पर पुनर्विचार करने और प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है.

असम में गुवाहाटी विस्तार परियोजना (Guwahati expansion project) के लिए एक आदिवासी स्वायत्त परिषद क्षेत्र से भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है, जिसका स्थानीय संगठनों और आदिवासी समूहों ने विरोध किया है.

रिपोर्ट के अनुसार, उनका कहना है कि इस कदम से स्थानीय लोगों की जमीन, आजीविका और अधिकारों पर असर पड़ेगा.

दरअसल, राज्य के दो आदिवासी छात्र संगठनों ने गुवाहाटी के विस्तार प्रोजेक्ट के लिए राभा हासोंग ऑटोनॉमस काउंसिल (RHAC) के तहत आने वाले इलाकों से ज़मीन अधिग्रहण के प्रस्ताव का विरोध किया है.

RHAC छह वैधानिक स्वायत्त आदिवासी परिषदों में से एक है. लेकिन इन्हें भारत के संविधान की छठी अनुसूची के तहत अन्य तीन परिषदों को मिलने वाली प्रशासनिक, न्यायिक और वित्तीय शक्तियां नहीं मिली हुई हैं.

RHAC के दायरे में गोलपारा और कामरूप ज़िलों के बड़े इलाके आते हैं. 3 जून को, गुवाहाटी मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMDA) ने RHAC के तहत आने वाले गांवों और कामरूप ज़िले के अज़ारा और पलाशबाड़ी रेवेन्यू सर्कल में आदिवासी बेल्ट और ब्लॉक में हाउसिंग और शहरीकरण विभाग के लिए ज़मीन अधिग्रहण का प्रस्ताव जारी किया.

गुवाहाटी शहर विस्तार प्रोजेक्ट का यह प्रस्ताव 24 मई, 2026 को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और GMDA के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के बीच हुई बातचीत के बाद आया.

ऑल राभा स्टूडेंट्स यूनियन (ARSU) और ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (ABSU) की स्थानीय इकाइयों के मुताबिक, प्रस्तावित अधिग्रहण से राभा हासोंग ऑटोनॉमस काउंसिल एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन होगा और आदिवासियों के ज़मीन के अधिकारों पर बुरा असर पड़ेगा.

ARSU यूनिट के सचिव अशोक नोंगबाग ने कहा कि सरकार ने कई गांवों में ज़मीन अधिग्रहण के लिए नोटिस जारी किए हैं, जिनमें जावे में 203 बीघा (66.99 एकड़), देओराली में 676 बीघा (223.03 एकड़) और जंघलियापारा में 280 बीघा (92.4 एकड़) ज़मीन शामिल है.

उन्होंने कहा, “ये गांव RHAC 2005 संशोधन अधिनियम के तहत आने वाले 779 गांवों में से हैं और आदिवासी बेल्ट और ब्लॉक का हिस्सा हैं.”

आदिवासी बेल्ट और ब्लॉक असम में तय किए गए खास भौगोलिक इलाके हैं. इन्हें 1886 के एक अधिनियम के तहत बनाया गया था ताकि मूल निवासियों और पिछड़े वर्गों के ज़मीन के अधिकारों और आजीविका को गैर-आदिवासी प्रवासियों द्वारा छीने जाने से बचाया जा सके.

ARSU के अध्यक्ष आनंद राभा ने मंगलवार (14 जुलाई, 2026) को पत्रकारों से कहा, “हम 2009 से मांग कर रहे हैं कि RHAC और आदिवासी बेल्ट और ब्लॉक के गांवों को GMDA में शामिल न किया जाए. इसलिए, ARSU और ABSU मिलकर गुवाहाटी विस्तार प्रोजेक्ट के लिए रेवेन्यू गांवों को शामिल करने की बार-बार की जा रही साजिशों का विरोध करते हैं.”

वहीं अशोक नोंगबाग ने कहा कि ज़मीन अधिग्रहण का प्रस्ताव RHAC को ‘छठी अनुसूची’ वाली आदिवासी परिषद के तौर पर अपग्रेड होने से रोकने की एक चाल थी.

उन्होंने कहा, “आदिवासी बेल्ट और ब्लॉकों को तोड़ने की साजिश के अलावा सरकार उन रैती किसानों को ज़मीन का मालिकाना हक पाने से वंचित करने की कोशिश कर रही है जो सालों से खेती करके अपनी जीविका चला रहे हैं.”

‘रैती’ का मतलब उन किसानों से है जो निजी या लीज़ पर ली गई ज़मीन पर खेती करते हैं.

ARSU और ABSU यूनिट्स ने सरकार से आग्रह किया कि वे RHAC के तहत आने वाले 779 गांवों को GMDA शहरीकरण प्रोजेक्ट से बाहर रखें और आदिवासी बेल्ट और ब्लॉकों को फिर से वर्गीकृत करने के “आदिवासी-विरोधी” कदम को रोकें.

दो अन्य संगठनों – ऑल असम भूमिपुत्र खिलोनजिया कचारी समाज (AABKKS) और आदिवासी भूमिपुत्र पीपल्स पार्टी, ने भी ज़मीन अधिग्रहण प्रस्ताव का विरोध किया है.

कचारी जनजातियों का एक समूह है, जिसमें बोडो, दिमासा और राभा शामिल हैं, जिन्हें असम का सबसे पुराना निवासी माना जाता है.

AABKKS ने कहा कि GMDA की नज़र अकेले आजारा रेवेन्यू सर्कल के छह गांवों में 2,662 बीघा (878.46 एकड़) ज़मीन पर है. इस अधिग्रहण के लिए लगभग ₹1,190 करोड़ का मुआवज़ा देना होगा.

गुवाहाटी और आसपास के इलाकों में इसी तरह की अन्य परियोजनाओं को लेकर भी हाल के महीनों में जमीन और विस्थापन के मुद्दे पर विरोध देखा गया है.

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