आदिवासियों के ट्रेक्टर नीलामी पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाई रोक, साहूकार से भी क्रूर बना बैंक

अदालत ने यह भी नोटिस किया कि आदिवासी किसान परिवारों ने जो लोन लिया था उसके मूलधन की तुलना में ब्याज की रक़म कई गुना ज़्यादा हो गई थी. साथ ही अदालत को यह भी बताया गया कि आदिवासी किसान परिवारों ने बैंक से आग्रह किया था कि लोन की रक़म चुकाने के लिए उन्हें कुछ समय और दे दिया जाए.

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एक आदिवासी किसान परिवार ने ट्रेक्टर ख़रीदने के लिए सहकारी बैंक से 6.90 लाख रूपये का लोन लिया. इस लोन पर बैंक ने 10 लाख से ज़्यादा का सिर्फ़ ब्याज लगाया है. ब्याज ना चुका पाने की सूरत में सहकारी बैंक ने आदिवासी परिवार का ट्रैक्टर ज़ब्त कर लिया है. बैंक ने इस ट्रैक्टर की नीलामी का ऐलान भी कर दिया. यह कहानी सीताबाई राउत के परिवार की है. 

महाराष्ट्र के नासिक ज़िले में कम से कम 32 आदिवासी परिवारों की यही कहानी है. इन परिवारों के ट्रैक्टर जब्त कर लिए गए और इनकी नीलामी की भी घोषणा कर दी गई. यहाँ के ज़िला मध्यवर्ती सहकारी बैंक ने 7 अप्रैल को इस सिलसिले में एक नोटिस जारी किया जिसमें 16 अप्रैल को इन परिवारों के ट्रेक्टरों की नीलामी का घोषणा कर दी गई.

इन परिवारों ने हार कर बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और अपनी फ़रियाद सुनाई. हाईकोर्ट ने पाया कि सहकारी बैंक के सचिव को यह अधिकार ही नहीं है कि वह इन परिवारों के ट्रैक्टर ज़ब्त कर ले. हाईकोर्ट के जजों ने पाया कि सहकारी बैंकों से जुड़े क़ानूनों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

अदालत ने यह भी नोटिस किया कि आदिवासी किसान परिवारों ने जो लोन लिया था उसके मूलधन की तुलना में ब्याज की रक़म कई गुना ज़्यादा हो गई थी. साथ ही अदालत को यह भी बताया गया कि आदिवासी किसान परिवारों ने बैंक से आग्रह किया था कि लोन की रक़म चुकाने के लिए उन्हें कुछ समय और दे दिया जाए. 

इस पूरे मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि बैंक ने एक तरह से दादागिरी दिखाते हुए नियमों के ख़िलाफ़ जा कर किसानों के ट्रेक्टर ज़ब्त किये थे. कोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया कि ज़्यादातर किसान परिवारों ने ट्रेक्टर के लिए लिए गए लोन में से आधे से ज़्यादा रक़म बैंक को लौटा दी है. 

यह मामला पिछले सप्ताह बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने आया था. इस पूरे मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने बैंक को आदेश दिया कि किसानों के ट्रेक्टर तुरंत वापस परिवारों को सौंप दिए जाएँ. 

आदिवासी इलाक़ों में संस्थागत क़र्ज़ की व्यवस्था का अभाव एक बड़ी समस्या है. इस वजह से आदिवासियों को साहूकारों और ज़मींदारों से क़र्ज़ लेना पड़ता है. इसके अलावा अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आदिवासी ठेकेदारों से भी क़र्ज़ लेते हैं.

क़र्ज़ का यह चक्र ऐसा बनता है जिसमें आदिवासी पीढ़ी दर पीढ़ी फँसता जाता है. क़र्ज़ के चक्कर में पड़कर आदिवासी अपनी ज़मीन गँवाने से ले कर बँधुआ मज़दूरी के जाल में फँसा हुआ है. इस तरह की स्थिति को बदलने का एक बड़ा रास्ता आदिवासियों के लिए बैंकों से लोन की व्यवस्था है.

लेकिन अफ़सोस कि आदिवासी इलाक़ों में बैंकों की मौजूदगी कम है. इसके अलावा बैंक जिन शर्तों पर लोन देते हैं, वो आदिवासी के पक्ष में नहीं जाती हैं. सहकारी बैंक आदिवासी इलाक़ों में बेशक बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं.

लेकिन आमतौर पर देखा गया है कि सहकारी बैंकों के प्रशासन पर धनवान और प्रभावशाली लोगों का क़ब्ज़ा बना रहता है. आदिवासी किसानों को क़र्ज़ देने और क़र्ज़ की वसूली दोनों ही मामलों में बैंक भी साहूकारों की तरह ही क्रूर बन जाते हैं. 

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