आदिवासी विकास का ‘मिशन मोड’ बनाम हक़ीकत

कमेटी ने यह नोट किया है कि कई बार तो जो घटी हुई राशी आदिवासी मंत्रालय को दी जाती है वह भी पूरी ख़र्च नहीं होती है. मसलन सरकार ने साल 2020-21 के लिए आदिवासी मंत्रालय को 7355 करोड़ रूपये का बजट दिया था. इसके अगले साल यानि साल 2021-22 में यह बजट घटा कर 7084 कर दिया गया. कमेटी ने पाया है कि साल 2020-22 में जो 7084 रूपये आदिवासी मंत्रालय को ख़र्च के लिए दिए गए, उसमें से मात्र 4070 करोड़ रूपये ही ख़र्च हो सके.

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संसद में जब भी कोई मंत्री बोलने उठता है तो वह यह दावा ज़रूर करता है कि नरेन्द्र मोदी सरकार ‘मिशन मोड’ (mission mode) में काम कर रही है. ऐसे ही दावे आदिवासी मामलों का मंत्रालय भी करता है.

लेकिन देश के आदिवासी इलाकों के विकास के लिए योजनाओं की घोषणा करना एक बात है और विकास के लिए धन मुहैया कराना दूसरी बात है. मसलन सरकार ने आदिवासी इलाकों के लिए प्रधानमंत्री आदि आदर्श ग्राम योजना और प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन जैसी योजनाएं शुरू की हैं.

सरकार का दावा है कि पहले की सरकारों की अपेक्षा नरेन्द्र मोदी सरकार आदिवासी इलाकों में बेहतर फ़ोकस के साथ काम कर रही है.

आदिवासी मंत्रालय का दावा है कि उसने आदिवासी समुदायों के सामाजिक, आर्थिक सशक्तिकरण के साथ साथ उनके शैक्षिणिक सशक्तिकरण पर भी ध्यान दिया है. मंत्रालय ने दावा किया है आदिवासी इलाकों में सरकार के अलग अलग मंत्रालय की 265 योजनाओं की समीक्षा की है.

इन योजनाओं की समीक्षा के बाद शिक्षा, सेहत, कृषि, रोज़गार और हाउसिंग के साथ साथ सड़क संपर्क और पीने की पानी की व्यवस्था से जुड़ी योजनाओं को लागू करने में कमी को दूर करने के कदम उठाए हैं. 

मंत्रालय ने बताया है कि आदिवासियों के कम से कम 1,17000 गांवों में इन योजनाओं के लागू करने में कमी देखी गई है. अब आदिवासी मंत्रालय इन गांवों में योजनाओं में आ रही मुश्किलों या कमियों को दूर किये जाने पर काम कर रहा है. 

ये सरकार के दावे हैं, हक़ीकत नहीं है. 

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थाई समिति ने आदिवासी विकास के दावों की पड़ताल की है. इस समिति ने संसद में जो रिपोर्ट पेश की है उससे सरकार के दावों की हक़ीकत सामने आती है.

संसदीय समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि आदिवासी मंत्रालय के लिए बजट में जिस धनराशी की घोषणा की जाती है, उसे बाद में कम कर दिया जाता है.

इसके साथ ही कमेटी ने यह भी नोट किया है कि कई बार तो जो घटी हुई राशी आदिवासी मंत्रालय को दी जाती है वह भी पूरी ख़र्च नहीं होती है. मसलन सरकार ने साल 2020-21 के लिए आदिवासी मंत्रालय को 7355 करोड़ रूपये का बजट दिया था. इसके अगले साल यानि साल 2021-22 में यह बजट घटा कर 7084 कर दिया गया. 

आदिवासी मंत्रालय के बजट में कटौती की बात यहीं पर नहीं रूक जाती है. कमेटी ने नोट किया है कि बजट में आवंटित धनराशी में और कटौती की गई. अंतत आदिवासी मंत्रालय को साल 2021 में 5472.50 करोड़ रूपये ही दिए गए थे. जबकि साल 2021-22 में सिर्फ़ 6126 करोड़ रूपये ही दिए गए. 

आदिवासी मंत्रालय के कामकाज की समीक्षा के दौरान कुछ तथ्यों पर कमेटी हैरान रह गई है. कमेटी अपनी रिपोर्ट में नोट करती है कि एक तरफ वित्त मंत्रालय बजट में कटौती कर रहा है तो दूसरी तरफ आदिवासी मंत्रालय पिछले दो साल के दौरान जो पैसा मिलता है उसे भी ख़र्च नहीं कर पाता है. 

कमेटी ने पाया है कि साल 2020-22 में जो 7084 रूपये आदिवासी मंत्रालय को ख़र्च के लिए दिए गए, उसमें से मात्र 4070 करोड़ रूपये ही ख़र्च हो सके. इस सिलसिले में मंत्रालय ने जो सफ़ाई देते हुए कहा है कि कोविड की वजह से जमीन पर काम प्रभावित हुआ है. 

इसलिए निर्धारित पैसा ख़र्च नहीं हो पाया है. हांलाकि कमेटी कहती है कि आदिवासी मंत्रालय की यह सफ़ाई स्वीकार नहीं की जा सकती है. कमेटी ने कहा है जब मंत्रालय यह दावा करता है कि उसने आदिवासी विकास से जुड़ी योजनाओं को लागू करने में हो रही कमियों को चिन्हित कर लिया है तो फिर यह बहानेबाज़ी नहीं होनी चाहिए थी. 

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