बृंदा करात: आदिवासियों की खनिज संपदा कॉर्पोरेट कंपनियों को बांट रही है केंद्र सरकार

करात ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार संविधान की पांचवीं अनुसूची में आदिवासियों के लिए बनाए गए कानूनों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने आदिवासी लोगों से आरओएफआर, पेसा अधिनियम और जीओ जैसे अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए संघर्ष आयोजित करने का आह्वान किया, जो कई बलिदानों के बाद उन्हें मिला है.

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माकपा नेता और आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बृंदा करात ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह आदिवासी इलाक़ों की खनिज संपदा को जैसे एक थाली में परोसकर कॉरपोरेट कंपनियों को दे रही है. उन्होंने शुक्रवार को कहा कि सरकार की इस नीति का कड़ा विरोध किया जाना चाहिए.

शुक्रवार को पडेरू में गिरिजन संघम द्वारा आयोजित एक बैठक को संबोधित करते हुए करात ने कहा कि केंद्र सरकार कॉर्पोरेट समूहों को ज़्यादा मौक़े देने के लिए ही वन अधिकार अधिनियम और पर्यावरण अधिनियम में संशोधन करने की कोशिश कर रही है.

उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए शासन के पहले पांच सालों में, हजारों एकड़ जमीन निजी पार्टियों को सौंप दी गई है, जिसका सबसे बड़ा असर आदिवासी लोगों की आजीविका पर पड़ा है.

करात ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार संविधान की पांचवीं अनुसूची में आदिवासियों के लिए बनाए गए कानूनों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने आदिवासी लोगों से आरओएफआर, पेसा अधिनियम और जीओ जैसे अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए संघर्ष आयोजित करने का आह्वान किया, जो कई बलिदानों के बाद उन्हें मिला है.

उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी पर भी निशाना साधा, और कहा कि वो ‘अपनी कुर्सी की रक्षा’ करने के लिए मोदी सरकार की ‘जनविरोधी नीतियों’ का विरोध नहीं कर रहे.

झारखंड, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में आदिवासी इलाक़ों के एक अध्ययन से पता चला है कि 94% आदिवासी कोरोनोवायरस महामारी के दौरान अपनी शिक्षा को आगे नहीं बढ़ा सके.

करात ने कहा कि राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए, जिसमें G.O.3, जो एजेंसी इलाक़ों में आदिवासियों को 100% आरक्षण देता है, रद्द कर दिया गया था. उन्होंने यह भी मांग की कि राज्य सरकार इस संबंध में विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित करे.

इसके अलावा उन्होंने कहा कि आदिवासियों के हितों की रक्षा के उपाय किए बिना सिर्फ़ क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी अल्लूरी सीताराम राजू के नाम पर जिले का नाम रखना काफ़ी नहीं है. हालांकि वन अधिकार अधिनियम 2006 में लाया गया था, लेकिन आंध्र प्रदेश के लगभग आधे लाभार्थियों को आज तक उनकी ज़मीन का पट्टा नहीं मिला है.

आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के नेता चौ. नरसिंह राव, गिरिजन संघम के राज्य उपाध्यक्ष के. सुरेंद्र, नेता वी. तिरुपति राव, टी. रामकृष्ण, लक्कू, पृथ्वीराज, सीटू के नेता आर. शंकर राव, वी. उमामहेश्वर राव और अनंतगिरी जेडपीटीसी डी. गंगाराजू भी बैठक में शामिल हुए.

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