भूपेश बघेल का दावा, बस्तर के आदिवासी इलाक़ों में तेज़ी से हो रहा विकास

बघेल ने अपनी सरकार द्वारा लघु वनोपज की खरीद के लिए एमएसपी देने की नीति लागू करने से आदिवासियों के जीवन में समृद्धि लाने का भी दावा किया है. उनका कहना है कि इससे महुआ की खरीदारी बढ़ गई है, और काजू से लेकर बाजरा और महुआ तक का मूल्यवर्धन किया जा रहा है.

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छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित बोधघाट परियोजना स्थानीय लोगों की सहमति के बिना शुरू नहीं की जाएगी. राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोमवार को यह बात कही. उन्होंने यह भी दावा किया कि आदिवासी बहुल बस्तर इलाक़े में विकास कार्य तेजी से किए जा रहे हैं.

कांकेर में एक प्रेस कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री ने कहा, “विकास कार्य जनता के सरोकारों से जुड़े हैं. बोधघाट परियोजना किसी भी हाल में तब तक शुरू नहीं की जाएगी, जब तक बस्तर के लोग इसे शुरू करने की मंजूरी नहीं देते. पिछले साढ़े तीन साल में बस्तर विकास के मामले में अच्छी रफ्तार से आगे बढ़ा है. ग्रामीण विकास और कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा लिए गए फैसलों ने यहां के लोगों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है.”

राज्य की कांग्रेस सरकार द्वारा शुरु की गई न्याय योजना के बारे में बघेल ने कहा कि इसके तहत निर्धारित समय पर लाभार्थियों के बैंक खातों में धन दिया जाता है. उनका कहना है कि इससे राज्य भर में ज़्यादा से ज़्यादा बैंक खोलने की मांग हो रही है.

बघेल ने अपनी सरकार द्वारा लघु वनोपज की खरीद के लिए एमएसपी देने की नीति लागू करने से आदिवासियों के जीवन में समृद्धि लाने का भी दावा किया है. उनका कहना है कि इससे महुआ की खरीदारी बढ़ गई है, और काजू से लेकर बाजरा और महुआ तक का मूल्यवर्धन किया जा रहा है. शिक्षा के क्षेत्र में स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल के माध्यम से और स्वास्थ्य में मोबाइल मेडिकल यूनिट के माध्यम से लोगों को बेहतर सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं.

मुख्यमंत्री ने कहा कि जनहित के किसी भी कार्य में देरी न हो इसके सख्त निर्देश दिए गए हैं. कुछ जगहों पर सेटलमेंट में गड़बड़ी की शिकायतें मिली हैं. इसके लिए ड्रोन सर्वे के ज़रिए इस गड़बड़ी को दूर करने के निर्देश दिए गए हैं.

क्या है बोधघाट परियोजना?

बोधघाट जलविद्युत परियोजना, जिसे पहले 1970 के दशक के अंत में स्थापित करने का प्रस्ताव था, ने आदिवासी इलाकों में पर्यावरणीय चिंताओं पर विवाद खड़ा कर दिया था. 1980 के दशक में, तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने परियोजना को बंद करने की प्रक्रिया शुरू की, हालांकि इस पर अंतिम फैसला 1997 में लिया गया.

दिसंबर 2018 में सत्ता में आने के बाद, भूपेश बघेल सरकार ने बोधघाट परियोजना को एक मल्टी परपस सिंचाई परियोजना के रूप में पुनर्जीवित करने का फैसला लिया और केंद्र ने काम को आगे बढ़ाने के लिए अपनी सैद्धांतिक सहमति भी दे दी.

राज्य सरकार ने कहा था कि 22,653 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित होने वाली प्रस्तावित परियोजना से नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर जिलों में सालाना 3.66 लाख हेक्टेयर इलाके में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होगी. इसके अलावा 300 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा. जल विद्युत परियोजना के तहत दंतेवाड़ा जिले के बरसूर गांव के पास इंद्रावती नदी पर एक बांध का निर्माण होना है.

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