दिल्ली में लाल किला के सामने जनजाति सांस्कृतिक समागम में अमित शाह ने संविधान के हवाले से कहा कि देश के हर नागरिक को अपने धर्म में सम्मान से जीने का हक़ है. इसकी अगली लाइन में आदिवासियों की भिन्न भिन्न धार्मिक आस्थाओं और प्रकृति पूजा को सनातन धर्म से जोड़ दिया.
लाल किले पर जमा बड़ी संख्या में आदिवासियों से उन्होंने धर्म परिवर्तन के ख़िलाफ़ एकजुट होने का आह्वान किया. इसके अलावा अमित शाह ने आदिवासियों को UCC यानी समान नागरिक संहिता से बाहर रखने का भरोसा दिया. अमित शाह ने कहा, ‘UCC से जनजातीय समाज को डरने की जरूरत नहीं है. गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों में जहां इसे लागू किया गया है, वहां जनजातीय समाज को इससे बाहर रखा गया है. जनजातीय समाज की परंपराओं के साथ कोई खिलवाड़ नहीं होगा.”
राष्ट्रीय स्यंव सेवक संघ (RSS) के एक संगठन जनजाति सुरक्षा मंच के इस कार्यक्रम में बोलते हुए अमित शाह ने डीलिस्टिंग का ज़िक्र करने से परहेज़ किया. लेकिन इस कार्यक्रम में मौजूद लोगों के मन में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं था कि इस कार्यक्रम का मुख्य मुद्दा डीलिस्टिंग ही है.
जनजाति सुरक्षा मंच ने ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर निकालने का अभियान चलाया है. इसी कड़ी में राजधानी दिल्ली में यह बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया था.
इस कार्यक्रम को बेशक सांस्कृतिक समागम का नाम दिया गया था, लेकिन यह पूरी तरह से एक राजनीतिक कार्यक्रम था. इस कार्यक्रम के मंच से दिए गए भाषणों से यह साफ़ था कि इसका मकसद ईसाई आदिवासियों का आरक्षण ख़त्म करने के लिए दबाव बढ़ाना है.
इस कार्यक्रम को दिल्ली सरकार और संस्कृति विभाग ने प्रायोजित किया था. हांलाकि यहां पर देश के कई इलाकों से आए आदिवासी कलाकारों को मुख्य मंच तक पहुंचने का मौका भी हासिल नहीं हुआ.
यह सरकारी खर्च पर एक ऐसा कार्यक्रम था जिसका मकसद सरकार पर अपनी मांग मनवाने के लिए दबाव बनाना था.
इस कार्यक्रम में मौजूद लोगों से बातचीत से इस बात का अंदाज़ा होता है कि जनजाति सुरक्षा मंच ने आदिवासी इलाकों में ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों के खिलाफ़ एक माहौल तैयार कर दिया है.
मसलन मध्य प्रदेश के बडवानी से आए डॉक्टर कैलाश सोलंकी यह कहने में बिलकुल नहीं झिझकते हैं कि उनके इस आंदोलन से सिर्फ समाज नहीं बल्कि कई आदिवासी परिवारों में भी ध्रुवीकरण पैदा हुआ है.
वे कहते हैं कि आदिवासी इलाकों में अगर एक परिवार के कुछ लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया है तो बाकी परिवार उनका बॉयकॉट कर रहा है. इसे वह अपने आंदोलन की जीत समझते हैं.
इसी तरह से छत्तीसगढ़ से आए नौजवानों का एक ग्रुप कहता है कि वे जानते हैं कि संविधान किसी भी नागरिक को कोई भी धर्म अपनाने का अधिकार देता है. वे आगे कहते हैं कि इसलिए यह सभा आयोजित की गई है. इस सभा का मुख्य मकसद सरकार पर संविधान में संशोधन करने का दबाव बनाना ही है.
नौजवानों का यह दल दावा करता है कि जो आदिवासी ईसाई धर्म अपना चुके हैं वे दोहरा फ़ायदा उठाते हैं. वे कहते हैं कि वे आदिवासी आरक्षण का लाभ भी लेते हैं और अल्पसंख्यकों को मिलने वाले अन्य लाभ भी लेते हैं.
त्रिपुरा के ढलाई ज़िले से आए नौजवानों से मुलाकात हुई तो मैने उनसे पूछा कि वो इतनी दूर से क्या उम्मीद लेकर पहुंचे हैं? उनका जवाब था, ‘धर्म की रक्षा’. ढलाई त्रिपुरा का सबसे पिछड़ा ज़िला है. ये नौजवान मानते हैं कि उनके इलाके में न सड़क है और न ही पीने का साफ़ पानी है.
लेकिन उन्हें अपनी संस्कृति भ्रष्ट हो जाने की चिंता सता रही है.
इस समागम में मौजूद ज़्यादतर लोगों ने बातचीत में कहा कि आदिवासी अगर हिंदू परंपराओं को मानता है तो इसमें चिंता की कोई बात नहीं है. क्योंकि हिंदू धर्म मानने के बावजूद आदिवासी अपनी परंपराओं को नहीं छोड़ते हैं.
इस कार्यक्रम में बिरसा मुंडा की जय के अलावा हर-हर महादेव और जय श्रीराम के नारे लगातार लगाए जा रहे थे.
मुझे लगता है कि लालकिले की इस सभा में मौजूद लगभग सभी आदिवासी जनजाति सुरक्षा मंच के अभियान से प्रभावित हैं. लेकिन इस कार्यक्रम से लौटने के बाद जब वे अपने इलाके में जाएंगे तो आदिवासी समाज में ईसाई आदिवासियों के खिलाफ़ ध्रुवीकरण के लिए ज़्यादा शिद्दत से काम करेंगे.
क्योंकि इस काम के लिए उन्हें अभी तक उनका संगठन तैयार कर रहा था, अब देश के गृहमंत्री ने ख़ुद इस काम की सिफ़ारिश की है?

