आंध्र प्रदेश के अनाकापल्ली जिले (Anakapalli district) के एजेंसी क्षेत्र में रहने वाले एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के सदस्य की मृत्यु ने एक बार फिर दूरदराज के आदिवासी बस्तियों में सड़क और परिवहन सुविधाओं की गंभीर कमी को उजागर कर दिया है.
आदिवासी परिवार को मृतक के शव को कई किलोमीटर तक पैदल उठाकर ले जाना पड़ा क्योंकि गांव तक कोई सड़क या वाहन सुविधा उपलब्ध नहीं थी.
दरअसल, अनाकापल्ली जिले के रोलुगुंटा मंडल की अर्ला पंचायत में कोंडु गांव (PVTG गांव) के रहने वाले 56 साल के कोरा सुब्बा राव (Korra Subbarao) की रविवार सुबह नरसीपटनम अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई.
शव को वापस कोंडु गांव ले जाने का खर्च उठाने में असमर्थ होने के कारण उनके परिवार को अस्पताल में पांच घंटे तक इंतजार करना पड़ा, जब तक कि अधिकारियों की मदद से ITDA एम्बुलेंस का इंतजाम नहीं हो गया.
नरसीपटनम एरिया सुपरिटेंडेंट ने परिवार को बताया कि एम्बुलेंस सेवा एजेंसी की सीमा तक ही सीमित है और इसे कोंडु जैसे पहाड़ी इलाकों के गांवों तक नहीं बढ़ाया जा सकता.
इसके बाद सुब्बा राव के बेटे कोंडाबाबू ने CPM जिला समिति के सदस्य के. गोविंदा राव से मदद मांगी, जिन्होंने यह मामला नरसीपटनम RDO के सामने उठाया.
फिर पडेरू ITDA प्रोजेक्ट ऑफिसर से संपर्क करने के बाद, शव को नरसीपटनम एरिया अस्पताल से पिथरीगड्डा गांव ले जाने के लिए एम्बुलेंस का इंतजाम किया जा सका.
हालांकि, अर्ला और पिथरीगड्डा के बीच रास्ते में एम्बुलेंस खड़ी चढ़ाई पर नहीं चढ़ पाई. इसलिए सुब्बा राव के परिवार और ग्रामीणों को शव को डेढ़ किलोमीटर तक पैदल उठाकर अपने गांव ले जाना पड़ा.
इस मौत ने एक बार फिर इलाके में सड़क संपर्क की खराब स्थिति को उजागर किया है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि गांव तक पक्की सड़क नहीं होने के कारण आपातकालीन स्थिति में मरीजों को अस्पताल पहुंचाना बेहद मुश्किल हो जाता है. बरसात के मौसम में स्थिति और भी खराब हो जाती है, जब कच्चे रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते हैं.
ग्रामीणों के अनुसार, दिसंबर 2024 में NREGA योजना के तहत 4.10 करोड़ की राशि मंजूर की गई थी.
ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क के नाम पर सिर्फ कुचले हुए पत्थर डाले गए थे, जो बारिश में बह गए.
हालांकि 2023-24 में 29 लाख खर्च करके चार पुलिया (culverts) बनाई गई थीं, लेकिन वे सड़कों से जुड़ी नहीं हैं.
आखिरकार, आदिवासी निवासियों ने खुद ही गड्ढों को भरा ताकि पुलिया के बीच के रास्तों पर आवाजाही हो सके. लेकिन इसका इस्तेमाल केवल दोपहिया वाहन के लिए ही कर सकते हैं. इसलिए परिवार और ग्रामीणों को सुब्बा राव के शव को पैदल ही कोंडु ले जाना पड़ा.
इस तरह की यह पहली घटना नहीं है. इससे पहले भी अनाकापल्ली एजेंसी क्षेत्र में सड़क और परिवहन सुविधाओं के अभाव के कारण गर्भवती महिलाओं को डोली (अस्थायी स्ट्रेचर) में अस्पताल ले जाना पड़ा था और समय पर इलाज न मिलने से बच्चों की मृत्यु जैसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं.
यह स्थिति दिखाती है कि प्राथमिक चिकित्सा तक पहुंच, आपातकालीन परिवहन और स्वास्थ्य केंद्रों तक कनेक्टिविटी अभी भी बड़ी समस्या है.
ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ताओं और आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा वर्षों से सड़क निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास के दावे किए जाते रहे हैं लेकिन इन दूरदराज की आदिवासी बस्तियों तक उनका लाभ नहीं पहुंचा है.
उनका कहना है कि सड़क संपर्क के अभाव में ग्रामीणों को स्वास्थ्य, शिक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी मूलभूत सेवाओं तक पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.
उन्होंने राज्य सरकार और एकीकृत जनजातीय विकास अभिकरण (ITDA), पडेरू से मांग की है कि प्रभावित गांवों को जल्द से जल्द सड़क संपर्क से जोड़ा जाए ताकि भविष्य में ऐसी दुखद घटनाएं दोबारा न हो.

