कुछ ही घंटों में द्रौपदी मुर्मू होंगी देश की प्रथम नागरिक    

साल 2015 में जब उन्हें पहली बार राज्यपाल बनाया गया, उससे ठीक पहले तक वे मयूरभंज जिले की बीजेपी अध्यक्ष थीं. साल 2002 से 2009 और साल 2013 से अप्रैल 2015 तक इस मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहीं. इसके बाद वह झारखंड की राज्यपाल मनोनीत कर दी गईं और बीजेपी की सक्रिय राजनीति से अलग हो गईं.

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देश का 15वां राष्ट्रपति कौन होगा, ये आज तय हो जाएगा. राष्ट्रपति चुनाव के लिए 18 जुलाई को मतदान हो चुका है और आज 11 बजे से संसद भवन में काउंटिंग शुरू हो गई है. सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर से द्रौपदी मुर्मू जबकि विपक्ष की तरफ से यशवंत सिन्हा उम्मीदवार हैं.

द्रौपदी मुर्मू की जीत की काफी संभावना जताई जा रही है. अगर वह जीत हासिल करती हैं तो देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बन जाएंगी.

कौन हैं द्रौपदी मुर्मू

द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून 1958 को मयूरभंज जिले के बैदापोसी गाँव में हुआ था. वो संथाल आदिवासी हैं और उनके पिता बिरंची नारायण टुडू अपनी पंचायत के मुखिया रहे हैं.

मुर्मू जिस संथाल समाज से ताल्लुक रखती हैं उससे जुड़े लोग मूल रूप से पूर्वी भारत के राज्य जैसे- झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार, असम और त्रिपुरा में रहते हैं. आबादी के तौर पर देखें तो यह झारखंड की सबसे बड़ी जनजाति है.

साल 1979 में भुवनेश्वर के रमादेवी महिला कॉलेज से बीए पास करने वाली द्रौपदी मुर्मू ने अपने पेशेवर करियर की शुरुआत ओडिशा सरकार के लिए क्लर्क की नौकरी से की.

उस दौर में मुर्मू सिंचाई और ऊर्जा विभाग में जूनियर सहायक थीं. बाद के सालों में वह शिक्षक भी रहीं. मुर्मू ने रायरंगपुर के श्री अरविंदो इंटिग्रल एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर में मानद शिक्षक के तौर पर पढ़ाया.

सियासी करियर

वहीं द्रौपदी मुर्मू ने अपने सियासी करियर की शुरुआत वार्ड काउंसलर के तौर पर साल 1997 में की थी. रायरंगपुर विधानसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर दो बार (साल 2000 और 2009) विधायक भी बनीं.

पहली बार विधायक बनने के बाद वे साल 2000 से 2004 तक नवीन पटनायक के मंत्रिमंडल में स्वतंत्र प्रभार की राज्यमंत्री रहीं.

साल 2015 में जब उन्हें पहली बार राज्यपाल बनाया गया, उससे ठीक पहले तक वे मयूरभंज जिले की बीजेपी अध्यक्ष थीं. साल 2002 से 2009 और साल 2013 से अप्रैल 2015 तक इस मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहीं.

इसके बाद वह झारखंड की राज्यपाल मनोनीत कर दी गईं और बीजेपी की सक्रिय राजनीति से अलग हो गईं. द्रौपदी मुर्मू झारखंड की पहली महिला और आदिवासी राज्यपाल थीं. वो झारखंड में सबसे लंबे वक्त तक राज्यपाल रहीं. वह छह साल, एक महीना और 18 दिन इस पद पर रहीं.

मुर्मू झारखंड की पहली राज्यपाल हैं, जिन्हें अपने पांच साल के टर्म को पूरा करने के बाद भी उनके पद से नहीं हटाया गया. वो यहां की लोकप्रिय राज्यपाल रहीं, जिनकी प्रतिष्ठा सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में थी.

अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई अहम फैसले लिए. हाल के सालों में जब कुछ राज्यपालों पर पॉलिटिकल एजेंट की तरह काम करने के आरोप लगने लगे हैं, द्रौपदी मुर्मू ने राज्यपाल रहते हुए खुद को इन विवादों से दूर रखा.

यहां से सेवानिवृति के बाद वो अपने गृह राज्य ओड़िशा के मयूरभंज जिले के रायरंगपुर में रहती हैं. यह उनके पैतृक गांव बैदापोसी का प्रखंड मुख्यालय है.

द्रौपदी मुर्मू की शादी श्याम चरण मुर्मू से हुई थी लेकिन कम उम्र में ही उनका निधन हो गया. उनकी तीन संतानें थीं लेकिन इनमें से दोनों बेटों की मौत भी असमय हो गई.

मुर्मू की बेटी इतिश्री मुर्मू हैं, जो रांची में रहती हैं. उनकी शादी गणेश चंद्र हेम्बरम से हुई है.

क्यों ख़ास हैं द्रौपदी मुर्मू

21 जून की देर शाम बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जब राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए के प्रत्याशी के तौर पर द्रौपदी मुर्मू के नाम की घोषणा की तो वह नई दिल्ली से करीब 1600 किलोमीटर दूर रायरंगपुर (ओड़िशा) के अपने घर में थीं.

अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद उन्होंने स्थानीय मीडिया से कहा, “मैं आश्चर्यचकित हूं और खुश भी क्योंकि मुझे राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया गया है. मुझे टीवी देखकर इसका पता चला. राष्ट्रपति एक संवैधानिक पद है और मैं अगर इस पद के लिए चुनी गई तो राजनीति से अलग देश के लोगों के लिए काम करूंगी. इस पद के लिए जो संवैधानिक प्रावधान और अधिकार हैं, मैं उसके अनुसार काम करना चाहूंगी. इससे ज्यादा मैं फिलहाल और कुछ नहीं कह सकती.”

जब द्रौपदी मुर्मू झारखंड की राज्यपाल थी तो उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई अहम फैसले लिए.

साल 2017 के शुरुआती महीने थे. झारखंड में बीजेपी के नेतृत्व वाली रघुबर दास सरकार थी. उस सरकार ने अदिवासियों की जमीनों की रक्षा के लिए ब्रिटिश हुकूमत के समय बने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) के कुछ प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव तैयार कराया.

विपक्ष के हंगामे और वॉकआउट के बावजूद रघुबर दास की सरकार ने उस संशोधन विधेयक को झारखंड विधानसभा से पारित करा दिया. फिर इसे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा गया. तब राज्यपाल रहीं द्रौपदी मुर्मू ने मई 2017 में यह विधेयक बिना दस्तखत सरकार को वापस कर दिया और पूछा कि इससे आदिवासियों को क्या लाभ होगा. सरकार इसका जवाब नहीं दे पाई और यह विधेयक क़ानूनी रूप नहीं ले सका.

उसी सरकार के कार्यकाल के दौरान जब पत्थलगड़ी विवाद हुआ तो द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के तहत बने ग्राम प्रधानों और मानकी, मुंडाओं को राजभवन में बुलाकर उनसे बातचीत की और इस मसले के समाधान की कोशिशें की.

वहीं दिसंबर 2019 में रघुबर दास सरकार के पतन के बाद जेएमएम नेता हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री बने. कुछ महीने बाद उनकी सरकार ने जनजातीय परामर्शदात्री समिति (TAC) के गठन में संशोधन से संबंधित एक विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा लेकिन द्रौपदी मुर्मू ने उसे भी सरकरा को लौटा दिया. वह विधेयक टीएसी के गठन में राज्यपाल की भूमिका को खत्म करता था.

राज्यपाल रहते हुए द्रौपदी मुर्मू ने सभी धर्मो के लोगों को राजभवन में एंट्री दी. उनसे मिलने वालों में अगर हिंदू धर्मावलंबी शामिल रहे, तो उन्होंने मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्मावलंबियों को भी राजभवन में उतनी ही इज्जत दी.

देश के वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 24 जुलाई को समाप्त हो जाएगा और 25 जुलाई को नए राष्ट्रपति शपथ लेंगे.

(Image Credit: REUTERS)

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