HomeAdivasi Dailyलिंगभेद, ग़रीबी धकेल रही है सहरिया आदिवासियों को सालों पीछे

लिंगभेद, ग़रीबी धकेल रही है सहरिया आदिवासियों को सालों पीछे

सहरिया राजस्थान का इकलौता पीवीटीजी समुदाय है. राज्य की 12 अधिसूचित जनजातियों में से सहरियाओं का सामाजिक-आर्थिक संकेतक सबसे ख़राब है.

राजस्थान के बारन ज़िले की शाहबाग और किशनगंज तहसील में रहने वाले सहरिया आदिवासी समुदाय के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के पीछे कुपोषण, लिंग अंतर, ग़रीबी, स्वास्थ्य सेवाओं तक ख़राब पहुंच और रूढ़िवादी मानसिकता मुख्य कारणों में से हैं.

हाल ही में आई एक रिपोर्ट में यह कहा गया है. रिपोर्ट मंडसौर यूनिवर्सिटी के मानविकी विभाग के सहायक प्रोफेसर संजय कुमार ने बनाई है. भारत में में 705 आदिवासी समूह हैं, जिनमें 75 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह यानि पीवीटीजी हैं.

सहरिया राजस्थान का इकलौता पीवीटीजी समुदाय है. राज्य की 12 अधिसूचित जनजातियों में से सहरियाओं का सामाजिक-आर्थिक संकेतक सबसे ख़राब है.

रिपोर्ट में प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं कि चूंकि शिक्षा से कोई तत्काल आर्थिक फ़ायदा नहीं होता, सहरिया अपने बच्चों को रोज़गार में लगाना पसंद करते हैं, जिससे पूरे परिवार की आय बढ़ती है.

2000-01 में भुखमरी की वजह से अपने बच्चों की मौत के बाद यह जनजाति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आई थी. इनपर ख़ास ध्यान देने के लिए, केंद्र सरकार ने 2011 में आदिम जनजातियों की घोषणा की थी.

सहरियाओं के अलावा, भील, डामोर, ढांका, गरासिया, काठोडी, कोकणा, कोली, मीणा, नायक, पटेलिया और भिलाला दूसरी प्राथमिक जनजातियां घोषित की गई थीं.

रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य की 12 अधिसूचित जनजातियों में से सहरिया समुदाय की साक्षरता दर सबसे कम है. राज्य और केंद्र सरकार के विशेष ध्यान के बावजूद सहरिया-बहुल दोनों तहसीलों में महिलाओं की साक्षरता दर 45% से भी कम है.

बारन स्थित संकल्प सोसायटी के प्रमुख रमेश चंद्रा ने बुनियादी साक्षरता कार्यक्रम में जनजाति के पिछड़ने की वजह के बारे में कहा कि राज्य में अत्याधिक ग़रीबी और अविश्वास ने सहरिया बच्चों को शिक्षा से दूर रखा है.

इलाक़े के स्कूल बुनियादी ढांचे और शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में खराब हैं. यहां पर पोस्टिंग को शिक्षक पनिशमेंट पोस्टिंग मानते हैं, और वो ज़्यादा समय यहां नहीं रहते.

सहरिया आदिवासी समुदाय की आबादी 400 गांवों में सबसे ज़्यादा है, और सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उनके 1 लाख परिवार हैं. इस समुदाय पर कोविड महामारी का भी गहरा असर पड़ा है.

बांसवाड़ा के एक आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता पीयूष पांड्या कहते हैं, “सहरिया भूमिहीन मज़दूर हैं, जो ज्यादातर खेती और बिल्डिंग निर्माण कार्य करते हैं. यह काम पिछले एक साल से कमोबेश बंद ही है. आजीविका के नुकसान से स्कूलों से बड़े पैमाने पर ड्रॉपआउट हुआ है. महामारी ने शिक्षा को बढ़ावा देने के सालों के प्रयास को मिटा दिया है.”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments