झारखंड: TAC के गठन को लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल आमने-सामने

13 पेज की नोटिंग में राज्यपाल ने कहा है कि यह संविधान की पांचवीं अनुसूची में उन्हें दिए गए अधिकारों और शक्तियों का अतिक्रमण है

0
329

झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने राज्य सरकार द्वारा ट्राइब्स एडवाइजरी काउंसिल (टीएसी) के गठन के लिए राजभवन से परामर्श न किए जाने पर नाराजगी जताई है.

फाइल पर 13 पेज की नोटिंग में राज्यपाल ने कहा है कि यह संविधान की पांचवीं अनुसूची में उन्हें दिए गए अधिकारों और शक्तियों का अतिक्रमण है

4 जून, 2021 को हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार ने ‘झारखंड जनजाति सलाहकार परिषद नियम, 2021’ को अधिसूचित किया था. इसमें टीएसी के गठन के नियमों में संशोधन किया गया था.

टीएसी संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले इलाकों में आदिवासियों के विकास से संबंधित मुद्दों पर एक सलाहकार यूनिट है.

राज्य के 24 में से 13 जिलों को अनुसूचित क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृतकिया गया है.

अधिसूचना ने टीएसी के गठन की शक्ति राज्यपाल के कार्यालय से मुख्यमंत्री को ट्रांसफर कर दी.

इसके तहत, राज्य सरकार ने 22 जून, 2021 को टीएसी का पुनर्गठन किया, जिसमें मुख्यमंत्री को अध्यक्ष और राज्य के आदिवासी मामलों के मंत्री को डिप्टी चेयरपर्सन बनाया गया. तीन आदिवासी विशेषज्ञों के अलावा विपक्षी भाजपा के तीन समेत 15 विधायक भी टीएसी का हिस्सा हैं.

राज्यपाल रमेश बैस, जिन्होंने पिछले साल 14 जुलाई को द्रौपदी मुर्मू से पदभार संभाला था, ने संबंधित फाइल मांगी.

द हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, अधिकारियों ने कहा कि कानूनी राय लेने के बाद राज्यपाल ने करीब दो हफ्ते पहले फाइल को 13 पन्नों के डिटेल्ड ऑब्जर्वेशन और आगे की कार्रवाई के सुझावों के साथ लौटा दिया.

एचटी का कहना है कि इस नोटिंग में राज्यपाल ने देश के शीर्ष कानून अधिकारी, अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और संवैधानिक प्रावधानों समेत कई कानूनी विशेषज्ञों की कानूनी राय का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि राज्यपाल के पास पांचवीं अनुसूची से जुड़े मामलों में विवेकाधीन शक्तियां हैं.

हालांकि राज्यपाल ने अधिसूचना को रद्द नहीं किया, लेकिन उन्होंने चार सुझाव दिए हैं. इनमें उन्हें अनुसूचित जनजातियों के दो सदस्यों को परिषद में नियुक्त करने की अनुमति देना; राज्यपाल द्वारा दिए गए सुझावों को परिषद द्वारा सर्वोच्च विचार दिया जाना; टीएसी द्वारा लिए गए सभी फैसलों को राज्यपाल के कार्यालय में अनुमोदन के लिए भेजना; और जनजातियों के कल्याण को प्राथमिकता दिया जाना.

राज्य सरकार के अधिकारियों ने पुष्टि की कि उन्हें राज्यपाल की टिप्पणी मिल गई है. हालांकि उनके सुझावों पर कोई फैसला अभी नहीं लिया गया है.

मुख्य सचिव सुखदेव सिंह और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव विनय चौबे दोनों ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. हालांकि, एक दूसरे अधिकारी ने हिंदुस्तान टाइम्स को कहा कि फाइल को मुख्यमंत्री के सामने रखा गया है.

पांचवीं अनुसूची संविधान में एक विशेष प्रावधान है और राज्यपाल को इसमें विवेकाधीन शक्तियां दी गई हैं. संविधान के अनुच्छेद 166 और 162 के तहत, सरकार द्वारा लिए गए सभी कार्यकारी फैसले राज्यपाल के नाम पर किए जाते हैं.

हालाँकि, ऐसे सभी मामलों में राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बाध्य होते हैं. लेकिन पांचवीं अनुसूची के मामले में, संविधान राज्यपाल को विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है और उसे प्रधानता दी जाती है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here