लैंड रिकॉर्ड्स डेटा बैंक में त्रुटि दर्ज होने के बाद जनजाति प्रमाण पत्र देना मुश्किल

अब चूँकि लैंड रिकॉर्ड्स डेटा बैंक बन रहे हैं, इसलिए अगर डेटा में मामूली सा भी फ़र्क़ नज़र आता है तो स्थानीय अधिकारी जाति प्रमाण पत्र जारी करने से बचते हैं.

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लैण्ड बैंक रिकार्ड्स डेटा बैंक में अगर एक भी शब्द का अंतर होता है, तो स्थानीय अधिकारी आदिवासी को जनजाति प्रमाण पत्र देने में आना कानी करते हैं. यह  बात जनजाति कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने कही है. अर्जुन मुंडा लोकसभा में एक सवाल का जवाब दे रहे थे.

लोक सभा में छत्तीसगढ़ के सांसद चुन्नी लाल साहू ने सवाल उठाया था कि सिनोनिम फ़ोनेटिक में मात्रात्मक त्रुटियों की वजह से कई आदिवासी समुदाय के लोगों को जनजाति प्रमाण पत्र नहीं दिया जाता है. इस सिलसिले में उन्होंने छत्तीसगढ़ की 5 जनजातियों का नाम भी लिया. इन आदिवासी समुदायों में भुइयाँ, धनवान, किसान, सबर, स्वरा और धनगर शामिल हैं. 

सांसद चुन्नी लाल साहू ने सरकार से सवाल पूछते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में 42 अनुसूचित जनजातियों में राजस्व रिकॉर्ड में सिनोनिम फ़ोनेटिक में मात्रात्मक त्रुटियाँ हैं. इस वजह से इन समुदायों को जनजाति प्रमाण पत्र मिलने में मुश्किल आती है.

उन्होंने आगे कहा कि इन जातियों को पर्याय शब्द में शामिल किया गया है. लेकिन इसके बावजूद इन समुदायों को जनजाति प्रमाण पत्र नहीं मिल रहा है. 

उन्होंने अपनी बात की समर्थन में कहा कि इन परिवारों में से जिनके पास ज़मीन है उनके पास मिसल के रिकॉर्ड हैं, उन्हें तो जाति प्रमाणपत्र मिल जाता है. लेकिन जिनके पास ज़मीन नहीं है, उन लोगों को मुश्किल हो रही है. 

इस सिलसिले में जनजाति कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा है कि राज्य सरकारें इस तरह के मामलों की समीक्षा करती हैं. 

इसके बाद जाति प्रमाण पत्र जारी किये जाते हैं. उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि इस सिलसिले में केन्द्र सरकार की तरफ़ से राज्य सरकारों को निर्देश भी दिए गए हैं. इस तरह के मामलों को निपटाने के लिए कमेटियाँ भी बनाई गई हैं. 

अर्जुन मुंडा ने कहा कि आमतौर पर स्थानीय अधिकारियों को इस तरह की त्रुटि की जानकारी रहती थी. जब उनके सामने इस तरह के मामले आते थे जिनमें मात्रा या उच्चारण की वजह से गड़बड़ी होती थी तो स्थानीय अधिकारी इन त्रुटियों को दूर कर जाति प्रमाण पत्र जारी कर देते थे.

लेकिन अब चूँकि लैंड रिकॉर्ड्स डेटा बैंक बन रहे हैं, इसलिए अगर डेटा में मामूली सा भी फ़र्क़ नज़र आता है तो स्थानीय अधिकारी जाति प्रमाण पत्र जारी करने से बचते हैं. 

हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, कोरबा और सरगुजा में मैं भी भारत की टीम को ऐसी शिकायत सुनने को मिलीं कि वहाँ भी कई आदिवासी समुदायों के लोगों को जनजाति प्रमाण पत्र पाने में मुश्किल होती है.

मसलन पंडो आदिवासी समुदाय को राज्य में आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा गया है. लेकिन इन आदिवासियों के कुछ परिवारों के नाम के साथ भुइयार दर्ज कर लिया गया. इस वजह से इन परिवारों को जनजाति प्रमाण पत्र नहीं मिल पाते हैं.

जनजाति मंत्रालय ने संसद को आश्वासन दिया है कि इस तरह के मामलों को निपटाने के लिए प्रयास किए जाएँगे.

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