बस्तर में विकास की आड़ में क्या आदिवासी बन रहे हैं निशाना?

स्थानीय आदिवासियों को डर है कि उनके इलाकों में पुलिस की गतिविधियों में बढ़ोतरी से अत्याचार और हत्याओं के मामले भी कई गुना बढ़ जाएंगे.

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बेचाघाट पुल के प्रस्तावित निर्माण के विरोध में छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के पखंजूर में हजारों की तादाद में आदिवासी ग्रामीण जमा हैं.

अपने विरोध के 34वें दिन उन्होंने इलाके में एक महापंचायत बुलाई. इस महापंचायत में फैसला लिया गया है कि मांगें पूरी नहीं होने पर राज्य के शहरी इलाकों में अशांति पैदा की जाएगी.

इन मांगों में बस्तर के अंदरूनी इलाकों में बेचाघाट पुल के निर्माण और पक्की सड़कों के निर्माण पर पूर्ण विराम शामिल है.

सोमवार को आदिवासी महापंचायत ने स्थानीय विधायक अनूप नाग का घेराव कर अपनी गतिविधियां शुरू करने का फैसला लिया.

महापंचायत में हिस्सा लेने वाली दक्षिण बस्तर की आदिवासी नेता सोनी सोरी ने कहा, “प्रशासन स्थानीय आदिवासियों की सहमति के बिना बस्तर के अंदरूनी इलाकों में लगातार चौड़ी पक्की सड़कें, पुलिस कैंप और पुल बना रहा है. इन गतिविधियों से आदिवासियों में यह डर पैदा हो गया है कि या तो पुलिस बल नक्सलियों के नाम पर उनका शिकार करेंगे या फिर उन्हें फर्जी मामलों में फंसाकर जेल भेज दिया जाएगा.”

स्थानीय आदिवासियों ने शिकायत की कि निर्माण गतिविधियों में तेजी लाने से उनका शांतिपूर्ण जीवन बाधित हो रहा है. उन्हें डर है कि उनके इलाकों में पुलिस की गतिविधियों में बढ़ोतरी से अत्याचार और हत्याओं के मामले भी कई गुना बढ़ जाएंगे. माओवादी अक्सर उन्हें पुलिस मुखबिर के तौर पर निशाना बनाते हैं.

स्थानीय आदिवासी गज्जू पड्डा ने कहा, “हम अस्पताल, स्कूल और कॉलेज चाहते थे लेकिन इसके बजाय इस छठी अनुसूची क्षेत्र में बिना सहमति के पक्की, बड़ी सड़कें और पुल लगातार बनाए जा रहे हैं. यह हमारे संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है. हम अपने अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा को तत्काल लागू करने की मांग कर रहे हैं.”

एक स्थानीय पत्रकार ने बताया कि आदिवासियों में यह भावना है कि बस्तर के खनिज और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की साजिश लगातार रची जा रही है. इसलिए आदिवासी लगातार इन गतिविधियों का विरोध कर रहे हैं.

हालांकि, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि नक्सली इन आदिवासियों को अपनी ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. पुलिस अधिकारी आदिवासी नेताओं के संपर्क में हैं और जल्द ही समस्या का समाधान ढूंढा जाएगा.

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