असम के साथ हुए सीमा समझौते के ख़िलाफ़ मेघालय के आदिवासियों का विरोध तेज़

दो सीमावर्ती गांवों - मलचपारा और सालबारी - के निवासियों ने कहा है कि वो इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ बिना लड़े हार नहीं मानेंगे. उन्हें डर है कि मेघालय से अलग होने पर वो अपने आदिवासी अधिकारों को खो देंगे.

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मेघालय में एक आदिवासी संगठन, खासी हिल्स ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल, ने पड़ोसी राज्य असम के साथ 50 साल पुराने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए दोनों राज्य सरकारों के बीच हुए समझौते का विरोध किया है. इसके साथ ही यह संगठन समझौते का विरोध करने वाले लोगों और संगठनों की लंबी सूची में शामिल हो गया है.

असम और मेघालय की सरकारों ने इसी साल 29 मार्च को 36.79 वर्ग किलोमीटर के विवादित क्षेत्रों को विभाजित करने के एस समझौते को अंतिम रूप दिया था. दोनों सरकारों ने पहले चरण में 12 विवादित क्षेत्रों में से छह पर चर्चा की थी.

खासी हिल्स ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (KHADC) का दावा है कि विवादित क्षेत्र, जिसपर सरकारें चर्चा कर रही हैं, निजी लोगों के हैं. ऐसे में मेघालय सरकार का इन क्षेत्रों पर खुद का कोई अधिकार नहीं है, न ही असम को यह क्षेत्र सौंपने का कोई अधिकार है.

केएचएडीसी के मुख्य कार्यकारी सदस्य टिटोस्स्टारवेल चाइन के मुताबिक सरकार को किसी भी हैंडओवर से पहले उचित मुआवजा और भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास अधिनियम, 2013 की धारा 41 के अनुसार संगठन की सहमति लेनी होगी.

केएचएडीसी संविधान की छठी अनुसूची के प्रावधानों के तहत मेघालय में बनाए गए तीन जनजातीय परिषदों में से एक है. यह तीनों परिषद उनको दिए गए क्षेत्रों के अंदर सरकार के रूप में काम करते हैं.

केएचएडीसी के अलावा, कुछ पारंपरिक संस्थान जैसे हिमा (एक खासी राज्य) और इलाक़े के ग्रामीण, जो असम में शामिल नहीं होना चाहते, उन्होंने मेघालय सरकार द्वारा सीमा सौदे की समीक्षा न करने पर अदालत जाने की धमकी दी है.

मेघालय सरकार ने कहा है कि समझौते पर दोबारा गौर नहीं किया जा सकता

उधर, मेघालय सरकार ने कहा है कि समझौते पर दोबारा गौर नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह 2011 में असम को सौंपे गए विवादित क्षेत्रों की सूची के आधार पर हुआ है. सीमा को फिर से बनाए जाने के अंतिम कदम से पहले संसद और दोनों राज्यों की विधानसभाओं द्वारा समझौते की पुष्टि की जानी बाकी है.

दो सीमावर्ती गांवों – मलचपारा और सालबारी – के निवासियों ने कहा है कि वो इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ बिना लड़े हार नहीं मानेंगे. उन्हें डर है कि मेघालय से अलग होने पर वो अपने आदिवासी अधिकारों को खो देंगे.

मलचपारा के नेता जेवाश संगमा ने कहा, “अगर सरकार हमारे विरोध को नज़रअंदाज़ करती है, तो उस सूरत में हम मामले को अदालत तक ले जाने के लिए कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रहे हैं.”

इन दो गांवों के अलावा दूसरे सीमावर्ती गांवों के असंतुष्ट लोग पिछले लगभग एक महीने से सीमा सौदे के खिलाफ विरोध रैलियां कर रहे हैं.

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