स्पेशल रिपोर्ट: फ़ौरी राहत नहीं, क़ानूनी हक़ आदिवासी को बचाएगा

जब हम गाँव के पास पहुँच तो अजीब नज़ारा हमारी आँखों के सामने था. गाँव के बाहर ही लोग दो-दो, चार-चार के ग्रुप में बैठे थे. इन के बीच में कुछ औरतें पतीले और मटका ले कर बैठी थीं. मुझे समझते देर नहीं लगी कि यहाँ पर महुआ की शराब और हंडिया (Rice Beer) पी जा रही है. ऐसे आसार नहीं थे कि यहां पर कोई ढंग की बातचीत हो पाएगी. क्योंकि ज़्यादातर लोग नशे में थे. जब परिवार, गाँव और जीविका की बात शुरू हुई तो नशे के बावजूद लोग चिंतित नज़र आने लगे. उनमें से कई हमें अपने घरों के पीछे ले गए. घरों के पीछे पहाड़ी ढलानों पर मक्के के खेत थे. मक्का के पौधे कुम्हलाए हुए थे. उन्होंने बताया कि उनके यहाँ दो प्रकार के खेत होते हैं, एक बड़गी जो घर के पास पहाड़ी ढलानों पर होते हैं. दूसरे खेत घाटी में समतल होते हैं.

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22 जुलाई, 2022 को हम एक बार फिर झारखंड के सफ़र पर निकले थे. इस बार हमने तय किया था कि संताल परगना के ज़िलों के आदिवासियों से मिलेंगे. वैसे तो हम कोई ऐसी बंदिश नहीं रखते हैं कि किसी ख़ास इलाक़े में एक ख़ास आदिवासी समुदाय से ही मुलाक़ात करनी है. लेकिन उस इलाक़े के सबसे बड़े समुदायों के साथ साथ सबसे कमज़ोर आदिवासी समुदायों से मिलने की कोशिश भी रहती है.

संताल परगना में हमने तय किया था कि संतालों के अलावा पहाड़िया समुदाय के लोगों से भी ज़रूर मिलेंगे. झारखंड की यात्रा पर निकलने से पहले वहाँ के अपने दोस्तों से मौसम का हाल लिया था. क्योंकि यह मौसम वहाँ पर भारी बारिश का होता है. हमारे ज़्यादातर दोस्तों ने बताया था कि बारिश कम ही है. इसलिए हमारी शूटिंग में शायद ज़्यादा समस्या ना आए. 

हम लोग दोपहर क़रीब 12.30 बजे राँची एयरपोर्ट से दुमका के लिए निकल गए. रांची से निकलते ही सड़क के दोनों तरफ़ पहाड़ी ढ़लान और खेत नज़र आ रहे थे. पहाड़ हरे भरे दिखाई दे रहे थे. दोनों तरफ़ के खेतों में भी हरियाली दिखाई दे रही थी.  

लेकिन खेतों में लोग मौजूद नहीं थे, दूर दूर तक फैलों खेतों में घास की हरियाली थी. जबकि यह मौसम तो ऐसा होता है जब इन खेतों में धान की रोपाई होती है. मैंने कई बार इस मौसम में झारखंड को देखा है जब दूर दूर तक खेतों में धान रोपते किसान परिवार नज़र आते हैं. 

यह मौसम होता है जब यहाँ के गाँव सुनसान मिलते हैं और खेत आबाद होते हैं. किसान परिवार सुबह सूरज निकलने से पहले ही खेतों में पहुँच जाता है. शाम तक खेतों में धान की रोपाई का काम चलता है.

शाम को घर पहुँचते हैं तो थोड़ा बहुत जो भी मिलता है  खा पी कर जल्दी ही सो जाते हैं. क्योंकि दिन भर तो खेत में कमर सीधी करने का भी टाइम नहीं मिलता है. जिन परिवारों के पास खेत नहीं है वो भी धान रोपाई में व्यस्त होते हैं. उनके लिए भी यह मज़दूरी कमाने का समय होता है. 

लेकिन इस बार खेतों में सन्नाटा पसरा है. धान की पौध अभी भी उखाड़ी नहीं गई है. सड़क पर दौड़ती गाड़ी में एयरकंडिशनर की वजह से बाहर के मौसम की उमस का अहसास नहीं हो रहा था. लेकिन यह साफ़ था की इस बार का यह सफ़र सुहाना तो नहीं होगा. 

मयूरक्षी नदी में मानसून में भी पानी नहीं है

हम लोग देर शाम दुमका ज़िले के कुकरतोपा गाँव में पहुँचें. यहाँ पर हमें गाँव के माँझी हड़ाम यानि समाज और गाँव के मुखिया से मिलना था. कुकरतोपा के माँझी हड़ाम का नाम मंगल मूर्मु है. 

उनके परिवार के साथ ही रात का खाना बनाया और खाया गया था. मंगल मूर्मु और उनके परिवार के लोगों से लंबी बातचीत हुई. इस बातचीत में उनकी बात बार-बार घूम कर बारिश और रोपाई पर आ जाती थी.

मैंने जब उनसे उनकी सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं के बारे में पूछा तो उनका कहना था, “जब खेत में धान की रोपाई शुरू होती है तो संताल आदिवासी मुर्ग़े की बलि दे कर खेत में रोपाई का काम शुरू करते हैं. बलि इसलिए दी जाती है कि पुरखे और देवता अच्छी फ़सल दें. लेकिन इस बार तो पानी ही नहीं गिरा है तो फिर कैसी बलि और कैसा पर्व, सब कुछ संकट में नज़र आ रहा है.”

मैंने उनसे पूछा कि अगर बारिश नहीं हुई तो क्या होगा? उनका कहना था, “भूखे तो नहीं मरेंगे, सरकार से राशन में चावल मिल जाएगा, पिछले साल का भी कुछ धान रखा है. लेकिन यह समझ लीजिए की बस ज़िंदा भर रहेंगे. कुछ और नहीं कर सकेंगे. क्योंकि हमारी आमदनी का तो एक ही सहारा है जो हमारे खेत की फसल से आता है. “

उनके ही गाँव के एक और सज्जन उनके साथ मौजूद थे. उन्होंने कहा, “आप इंसानों की बात कर रहे हैं हम तो डरे हुए हैं कि हमारे जानवरों तक के लिए चारा नहीं मिलेगा. क्योंकि धान का पुआल नहीं होगा तो जब सर्दी का मौसम आएगा और जंगल में घास सूख जाएगी तो जानवरों को क्या खिलाएँगे.”

कुकरतोपा के माँझी बाबा (मंगल मुर्मु) कहते हैं, “हम सोच रहे हैं कि हमारे जाहरथान (पूजा स्थल) पर बारिश के लिये प्रर्थना करें. लेकिन मुश्किल ये है कि अब अगर बारिश हो भी जाए तो फसल रोपाई का समय तो निकल चुका है. अब तो बस उम्मीद है कि मनरेगा में कुछ मज़दूरी मिल जाए और सरकार सूखा घोषित कर कुछ और मदद सरकार किसानों को दे.”

हम देर रात कुकुरतोपा से अपने होटेल लौट आए. दुमका में मेरी साथी चित्रिता एक ख़ास कहानी की तलाश में थीं. वह चादरबदोनी नाम की एक आदिवासी लोक कला से जुड़े कलाकारों से मिलना चाहती थीं. 

इस बारे में पता लगाने और मदद के लिए हमने अपने दोस्तों को फ़ोन किया था. उन्होंने मदद करने का आश्वासन दिया था. ज़ाहिर है उन्हें पता लगाने के लिए कुछ समय की ज़रूरत थी. 

हमने तय किया कि जब तक हमारे दोस्त पता लगाते हैं हम भी अपनी तरफ़ से कोशिश करते हैं कि किसी ऐसे गाँव में पहुँच जाएँ जहां ऐसे कलाकारों से मुलाक़ात हो सकती है. चित्रिता को एक गाँव का नाम याद था, ‘नवासर’ और मसलिया पंचायत थी. 

हम सुबह ही उस गाँव की तलाश में निकल गए और कुछ इधर उधर भटक कर आख़िरकार उस गाँव में पहुँच गए. लेकिन अफ़सोस कि हम सही गाँव तो पहुँच गए थे लेकिन  गाँव में कलाकारों से मुलाक़ात नहीं हो पाई. 

सूखा पड़ा तो पशुओं के लिए चारा जुटाना भी मुश्किल हो जाएगा

कलाकारों में से एक गाँव में ही मौजूद था, लेकिन वह अकेला कुछ नहीं करना चाहता था. क्योंकि कम से कम आठ लोग एक ग्रुप में होते हैं. उन्होंने बताया कि उनके समूह के लीडर कहीं बाहर गए हैं और फ़ोन भी घर पर ही छोड़ गए हैं.

इसलिए उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है. उनके भतीजे मोटर साइकिल ले कर पास के एक गाँव में उन्हें तलाश करने भी गए थे. लेकिन वो वहां भी नहीं मिले थे. जब काफ़ी खोजबीन के बाद भी उनसे मुलाक़ात नहीं हुई तो मैंने परिवार से पूछा कि क्या उन्हें चिंता नहीं हो रही है कि वो कहां होंगे?

इस पर उनके साथी बाबूधन मूर्मू कहते हैं, “इसमें चिंता की कोई बात नहीं है. क्योंकि इस बार बारिश तो हुई नहीं है सो गाँव में किसी को कोई काम नहीं है. इस मौसम में यानि बारिश में ढोल और बाँसुरी सब शांत रहते हैं. क्योंकि यह फसल लगाने का समय होता है. तो ना तो खेत में काम है और ना ही कोई गाने बजाने का काम है. इसलिए सब इधर उधर निकल जाते हैं.”

बाबूधन मूर्मु से बातों बात मैंने पूछा कि धान की रोपाई भी नहीं हो रही है और इस मौसम में गाना बजाना भी नहीं होता है, फिर आपका घर कैसे चलेगा? इसके जवाब में वो कहते हैं, “जंगल है तो कुछ सहारा है, वैसे तो बारिश ना होने से जंगल से भी जो फल, फूल, पत्ते या कांदे सब कुछ कम हो जाता है. फिर भी जंगल से लकड़ी और पत्ते मिल जाते हैं. तो किसी तरह से गुज़ारा तो हो ही जाएगा.”

दुमका के आदिवासी गाँवों में 6-7 दिन घूमते रहे और एक के बाद एक गाँव में मायूस आदिवासी परिवारों से मुलाक़ात होती रही. इसी सिलसिले में राजेश हेम्ब्रम से भी मुलाक़ात हुई. राजेश जब स्कूल में थे तो तीरंदाज़ी में उनका नाम था. उन्हें स्कूल की तरफ़ से जमशेदपुर प्रतियोगिता में भेजा गया था. 

वहाँ उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था और अपने ज़िले में वो एक नायक बन गए थे. लेकिन आज यह नायक गुमनामी में जी रहा है. खेती किसानी कर अपने परिवार का गुज़र बसर करने वाले राजेश हेम्ब्रम कहते हैं, “गाँव के पास से ही मयूरक्षी नदी बहती है. इस नदी का बखान आपको बंगाल के साहित्य और कविताओं में मिलेगा. लेकिन इस बार पानी नहीं गिरा है तो नदी में भी पानी नहीं है.”

हम उनके साथ मयूरक्षी नदी देखने भी गए. गाँव से क़रीब आधा किलोमीटर पर यह नदी है. नदी के बीचोंबीच पानी की एक पतली धार है. कहीं कहीं पत्थरों की वजह से नदी में पानी ठहरा हुआ है. लेकिन उसमें बदबू हो रही है.

राजेश बताते हैं कि बारिश नहीं होने से धान की रोपाई तो बिलकुल हो ही नहीं पाई है. लेकिन उसके अलावा भी कई तरह से आदिवासी जीवन प्रभावित हुआ है. वे हमें नदी के उस छोर पर ले कर गए जहां पर एक सज्जन मछली पकड़ने के लिए जाल डाल रहे थे. 

बारिश नहीं तो नदी पोखर से मछली भी नहीं मिल रही है

जब उन सज्जन से मैंने पूछा की कितनी मछली पकड़ी है तो वो हंस दिए. मेरे सवाल पर ही शायद वो हंस दिए थे. क्योंकि इतने से पानी में कितनी ही मछली पकड़ी जा सकती है. उनके प्लास्टिक के झोले में देखा तो एक भी मछली नहीं थी. उनका कहना था कि इस मौसम में तो पोखर और नदी लबालब भर जाते हैं. लेकिन इस बार की हालत तो आपके सामने ही है. 

दुमका से निकल कर हम साहिबगंज पहुँच गए और फिर पहाड़िया आदिवासियों से मिलने का सिलसिला शुरू हुआ. पहाड़िया आदिवासियों की ख़ासियत आपको अलग से किसी लेख या वीडियो में विस्तार से बताएँगे. लेकिन फ़िलहाल इतना बताते चलते हैं कि यह एक आदिम जनजाति यानि विशेष रूप से पिछड़ी जनजाति है. 

इनसे मिलने के सिलसिले में सुबह सुबह साहिबगंज से क़रीब 50 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर बथानी पहाड़ नाम के एक गाँव में पहुँचे. जब हम गाँव के पास पहुँच तो अजीब नज़ारा हमारी आँखों के सामने था. गाँव के बाहर ही लोग दो-दो, चार-चार के ग्रुप में बैठे थे. 

इन के बीच में कुछ औरतें पतीले और मटका ले कर बैठी थीं. मुझे समझते देर नहीं लगी कि यहाँ पर महुआ की शराब और हंडिया (Rice Beer) पी जा रही है. ऐसे आसार नहीं थे कि यहां पर कोई ढंग की बातचीत हो पाएगी. क्योंकि ज़्यादातर लोग नशे में थे. 

आदमी और औरत दोनों ही बात करने की हालत में दिखाई नहीं देते थे. फिर भी जब इतनी दूर आए थे तो बात तो करनी थी. मैंने किसी एक ख़ास आदमी को संबोधित करने की बजाए पूरे ग्रुप की संबोधित करते हुए पूछा, “सुबह सुबह शराब क्यों पी जा रही है? क्या किसी को काम पर नहीं जाना है? 

इस सवाल का जवाब आया, “अरे पानी नहीं गिरा तो सब को कुछ काम नहीं है, तभी तो यहाँ पर बैठ कर टाइम पास कर रहे हैं.” इस गाँव में हम शाम तक रहे और लंबी बातचीत हुई. 

जब परिवार, गाँव और जीविका की बात शुरू हुई तो नशे के बावजूद लोग चिंतित नज़र आने लगे. उनमें से कई हमें अपने घरों के पीछे ले गए. घरों के पीछे पहाड़ी ढलानों पर मक्के के खेत थे. मक्का के पौधे कुम्हलाए हुए थे. उन्होंने बताया कि उनके यहाँ दो प्रकार के खेत होते हैं, एक बड़गी जो घर के पास पहाड़ी ढलानों पर होते हैं. दूसरे खेत घाटी में समतल होते हैं.

बड़गी में मक्का, बाज़रा और दालें बोते हैं और समतल खेतों में धान लगाया जाता है. इस बार दोनों ही तरह की फसलें होने की कोई उम्मीद नहीं बची है. गाँव के लोग कहते हैं कि इस बार मामला काफ़ी ख़राब नज़र आ रहा है. काम की तलाश में बाहर जना पड़ेगा.

गाँव के माँझी ने कहा कि अगर यहीं पर मनरेगा (MNREGA) में कुछ काम मिल जाए तो बाहर ना जाना पड़े. इसके अलावा जंगल से लकड़ी और पत्तों के साहरे ही गुज़ारा होने की उम्मीद है. 

आज ही यानि 2 अगस्त को झारखंड की राजधानी राँची से ख़बर मिली है कि इस मसले पर विधानसभा में काफ़ी बहस हो रही है. सरकार की तरफ़ से जानकारी दी गई है अभी तक राज्य में औसत से 50 प्रतिशत कम बारिश हुई है. राज्य में 1 जून से 258.7 मिमी बारिश हुई है, जिसे मॉनसून के मौसम की शुरुआत माना जाता है. इस साल 31 जुलाई तक इस अवधि के दौरान 508.2 मिमी बारिश हुई है.

बारिश ना होने से लोगों में मायूसी नज़र आती है

इस वजह से राज्य में फसल बोने का लक्ष्य 35 प्रतिशत ही हासिल हो पाया है. सरकार ने बारिश कम होने की वजह से पैदा हालात में कई तरह के कदम उठाने का आश्वासन दिया है. इसके साथ ही सरकार ने कहा है कि वो स्थिति का पूरा आकलन भी करवा रही है. 

झारखंड में कुल 27 लाख हेक्टेयर भूमि को खेती लायक़ बताया जाता है. लेकिन राज्य में अभी तक ख़रीफ़ की फसल की बुआई सिर्फ़ 6 लाख 89 हज़ार हेक्टेयर पर ही हो पाई है.

सरकार ने बताया विधान सभा में बताया है कि पिछली कैबिनेट की बैठक में इस विषय पर राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से साथ चर्चा भी हुई थी. सरकार की तरफ़ से कहा गया है कि राज्य में पहली बार सुखाड़ की स्थिति नहीं बनी है. 

इससे पहले भी झारखंड में सूखा और अकाल पड़ा है और राज्य सरकार द्वारा बैठकें की गयी है. कृषि मंत्री ने बताया की राज्य की स्थिति के बारे में कृषि विभाग ने मुख्यमंत्री और आपदा प्रबंधन विभाग को जानकारी दे दी है.

झारखंड या फिर दूसरे राज्यों में अगर सूखा घोषित होता है तो फिर सरकार को प्रभावित परिवारों के लिए राहत का इंतज़ाम करना पड़ता है. इस प्रक्रिया में काफ़ी समय लगता है लेकिन फिर भी किसानों को कम से कम कुछ तात्कालिक राहत मिल ही जाती है.

यह मसला राज्य की विधान सभा में उठाया जाए और विपक्ष राज्य को सूखाग्रस्त घोषित करने की माँग करे तो यह एक अच्छा संकेत है. विधान सभा या संसद में आदिवासी और किसान की बात होनी ही चाहिए. 

लेकिन इस सिलसिले में संताल परगना में घूमते हुए बारिश और सूखा के संबंध में हमें कुछ बातें समझ में आई. इनमें सबसे पहली बात यह थी कि फ़ौरी तौर पर कुछ राहत और मदद देने के साथ साथ अगर दूरगामी नीतिगत कदम बेहद ज़रूरी और असरदार होते हैं. 

मसलन हमने यह पाया कि खाद्य सुरक्षा क़ानून (food security act) की वजह से आदिवासी परिवार इस बात के प्रति तो निश्चिंत हैं कि उनके परिवार को खाने भर का राशन तो मिल ही जाएगा. 

इसके अलावा वो यह मानते हैं कि अगर मनरेगा को सही से लागू किया जाए तो सूखे की हालत में भी उन्हें सम्मान से जीने भर के लिए कुछ पैसे मिल सकते हैं और उन्हें घर छोड़ कर बाहर नहीं जाना पड़ेगा.

आदिवासी इलाक़ों में हर गाँव में हमें बताया गया कि बेशक सूखा पड़ने से उनकी ज़िंदगी मुश्किल होगी. क्योंकि खेतों में फसल नहीं ले पाएँगे. लेकिन जंगल तो मौजूद है, यहाँ से जीने के लिए कुछ ना कुछ ज़रूर मिलता रहता है.

इसलिए मेरी नज़र में राज्य विधान सभा में विपक्ष बेशक राज्य को सूखाग्रस्त घोषित करवाने की माँग ज़ोर शोर से करे. लेकिन उसे यह ध्यान रखना होगा कि यह एक फ़ौरी उपाय है. अगर आदिवासी और किसान की ज़िंदगी बदलनी है तो उसे फ़ौरी राहत के साथ साथ उसके क़ानूनी हक़ों की रक्षा करनी होगी.

सूखा झेल रहे आदिवासियों से मिल कर हमें यह पता चला कि खाद्य सुरक्षा, वन अधिकार क़ानून, मिडे मील और वन अधिकार क़ानून को लागू करने में कोताही बरती जा रही है. लेकिन यह भी सच है कि प्रभावी तरह से इन क़ानूनों को लागू ना हो पाने के बावजूद इन क़ानूनों ने आदिवासियों को सशक्त ज़रूर किया है. 

इसलिए इन क़ानूनों की रक्षा ज़रूरी है. हम जब संताल परगना से राँची लौट रहे थे तो रास्ते में बादल घिर आए और बारिश होने लगी थी. अब काफ़ी देर हो चुकी है लेकिन फिर भी अगर कुदरत मेहरबान हो जाए तो आदिवासी की मायूसी कुछ कम होगी.

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