कहीं शरारत, कहीं खिलखिलाहट – बोडो स्कूल में पलते सपने

असम के बोडो बहुल इलाक़ों में उनकी अपनी मातृ भाषा यानि बोडो माध्यम के कई स्कूल हैं. इन स्कूलों में से कई में हमें जाने का मौक़ा मिला. तस्वीरों में देखिए इन स्कूलों के नज़ारे.

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असम का उदालगुड़ी ज़िला बोडो बहुल क्षेत्र है. इस ज़िले की कुल आबादी का 33 प्रतिशत से कुछ ज़्यादा आबादी बोडो समुदाय की है. मैं भी भारत की टीम को उदालगुड़ी में बोडो और राभा समुदाय के लोगों से मिलने का मौक़ा मिला.

हमारी टीम कई दिन इस ज़िले में रही और कई गाँवों में घूमी. इस दौरान एक सुबह हम एक स्कूल में भी गए, जहां ज़्यादातर छात्र बोडो समुदाय के मिले. जब हम इस स्कूल में पहुँचे तो एक हैरानी भरी ख़ुशी इस स्कूल के छात्रों के चेहरे पर हमें दिखाई दी. इस स्कूल में हमने जो देखा, इन तस्वीरों में वो आप भी देखिए.

सुबह की प्रार्थना में शामिल लड़के लड़कियाँ

इस स्कूल में हमने देखा कि यहाँ लड़के और लड़कियों की तादाद लगभग बराबर थी. यह कोई मामूली बात नहीं है. क्योंकि उदालगुड़ी असम के कोई बहुत विकसित ज़िलों में से नहीं है. लेकिन यहाँ के बोडो समुदाय में लड़कियों की शिक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ रही है.

जल्दी चल यार, शायद यही मन में चल रहा है

बोडो परिवारों और समाज में महिलाओं को काफ़ी सम्मान दिया जाता है. अगर आप ग़ैर जनजाति समाजों से तुलना करेंगे तो फ़र्क़ बहुत बड़ा मिलेगा. परिवार और समाज में महिलाओं की स्थिति काफ़ी बेहतर मिलेगी. लेकिन ऐसा नहीं है कि इस समाज में महिलाओं से जुड़े मसले नहीं हैं. बोडो समुदाय में भी लड़कियों की शिक्षा ज़्यादातर मामलों में स्कूल से आगे नहीं बढ़ पाती है.

सोचा था प्रर्थना ख़त्म होगी तो चुपचाप क्लास में चले जाएंगे, पर पकड़े गए

बोडो भाषा असम की आधिकारिक भाषाओं में से एक है. इसके अलावा संविधान की अनुसूची 8 में भी बोडो भाषा को शामिल किया गया है. बोडो समुदाय में अपनी भाषा के प्रति एक गर्व की भावना मिलती है.

बोडो इलाक़ों में हमने कई ऐसे स्कूल देखे जहां बोडो भाषा में पढ़ाया जा रहा था. लेकिन यह भी सच है कि संपन्न परिवारों के बच्चे इन स्कूलों में नहीं पढ़ते हैं. लेकिन कम से कम ये स्कूल आम बोडो परिवारों के बच्चों को पढ़ने का कुछ मौक़ा दे रहे हैं.

स्कूल का साइकल स्टेंड

उदालगुड़ी के इस स्कूल में ज़्यादातर लड़के लड़कियाँ साइकल से ही स्कूल आते हैं. स्कूल का लगभग आधा ग्राउंड साइकलों से भरा हुआ था. लेकिन साइकलों से भरा यह ग्राउंड इस बात का भी आश्वासन दे रहा था कि बच्चे रोज़ अच्छी संख्या में स्कूल आ रहे हैं.

हालाँकि हमें बताया गया कि धान रोपाई के समय कई बच्चों को छुट्टी ले कर खेतों में काम कर रहे परिवार का साथ देना पड़ता है.

अरे यार ये तो क्लास में भी आ गए…

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि बोडो लोग अपनी पहचान और अपनी ज़मीन के बारे में काफ़ी सजग हैं. आज बोडो बहुल क्षेत्रों का प्रशासन बीटीसी (Bodo Territorial council ) के आधीन है. लेकिन इन क्षेत्रों में अभी भी अच्छी शिक्षा और रोज़गार के सीमित अवसर दिखाई दिए.

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