HomeLaw & Rightsआदिवासियों ने जल-जंगल-ज़मीन का घोषणापत्र जारी किया

आदिवासियों ने जल-जंगल-ज़मीन का घोषणापत्र जारी किया

'नागरहोल घोषणापत्र 2026' (The Nagarahole Declaration, 2026) में आरोप लगाया गया है कि मद्रास वन अधिनियम और 1927 के भारतीय वन अधिनियम के जरिए आदिवासियों को अपनी ही जमीन पर बेदखल करने की जो हिंसा शुरू हुई थी, वह आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुई.

“हम जंगल के आगंतुक या पर्यटक नहीं हैं. हम खुद जंगल हैं, यहाँ बहने वाले झरने हैं और इन जमीनों के रक्षक हैं.” इन दमदार शब्दों के साथ कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के पश्चिमी घाट के जंगलों से आए आदिवासी समुदायों ने ऐतिहासिक ‘नागरहोल घोषणापत्र 2026’ (The Nagarahole Declaration, 2026) जारी किया.

‘नागरहोले आदिवासी जम्मा पाले हक्कू स्थापना समिति’ (NAJHSS) नाम के संगठन ने कई अन्य आदिवासी व छात्र संगठनों के सहयोग से नागरहोले जंगल के बालेकोवु गांव में 5 से 7 मई 2026 तक एक महत्वपूर्ण सामुदायिक संवाद का आयोजन किया था.

इस संवाद के बाद जारी इस घोषणापत्र ने ‘वन्यजीव संरक्षण’ और ‘बाघ पर्यटन’ (Tiger Tourism) के नाम पर आदिवासियों के साथ हो रहे ऐतिहासिक अन्याय, मानवाधिकारों के उल्लंघन और जबरन विस्थापन के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश की है.

‘संरक्षण’ का हरा मुखौटा और औपनिवेशिक क्रूरता

घोषणापत्र में यह आरोप लगाया गया है कि आज़ादी से पहले के मद्रास वन अधिनियम और 1927 के भारतीय वन अधिनियम के जरिए आदिवासियों को अपनी ही जमीन पर बेदखल करने की जो हिंसा शुरू हुई थी, वह आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुई. बल्कि अब उसने ‘संरक्षण’ के नाम पर हरी वर्दी पहन ली है.

आदिवासी नेताओं का कहना है कि नागरहोल को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करना, और बाद में नागरहोले, सत्यमंगलम, मुदुमलाई को टाइगर रिजर्व बनाना तथा वायनाड वन्यजीव अभयारण्य की घोषणा करना – ये सब उनकी ग्राम सभाओं की बिना किसी पूर्व और सूचित सहमति (FPIC) के थोपे गए हैं. 

इस प्रक्रिया में आदिवासियों के घर जलाए गए, उनके मवेशी जब्त किए गए और उन्हें अपनी ही पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया गया.

घोषणापत्र की मुख्य मांगें और ऐलान

11 सूत्रीय नागरहोले घोषणापत्र में आदिवासियों ने अपने कानूनी और संप्रभु अधिकारों को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया है:

वनाधिकार अधिनियम (FRA) की सर्वोच्चता: घोषणापत्र के पहले ही ऐलान में कहा गया है कि संसद द्वारा पारित वनाधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) एक संरक्षण कानून भी है. यह क़ानून वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 जैसे अन्य सभी कानूनों से ऊपर (Supersede) है. सुप्रीम कोर्ट ने भी नवंबर 2025 के अपने एक आदेश (सरंडा वन्यजीव अभयारण्य मामला) में स्पष्ट किया है कि एफआरए के तहत आदिवासियों के अधिकार किसी भी संरक्षित क्षेत्र में बरकरार रहते हैं.

टूरिज्म और सफारी पर रोक: आदिवासियों ने मांग की है कि जब तक उनके सामुदायिक और पर्यावास अधिकारों (CFR & Habitat Rights) को पूरी तरह मान्यता नहीं मिलती, तब तक नागरहोले, मुदुमलाई, सत्यमंगलम और वायनाड में सभी व्यावसायिक सफारी, जंगल लॉज और बाघ पर्यटन को तुरंत निलंबित किया जाए.

‘स्वैच्छिक विस्थापन’ एक धोखा: घोषणापत्र में वन विभाग के ‘स्वैच्छिक पुनर्वास’ (Voluntary Relocation) के दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे ‘जबरन विस्थापन’ और कानूनी धोखाधड़ी बताया गया है। आदिवासियों का कहना है कि जहां अधिकार दिए ही नहीं गए, वहां फाइलों में ‘अधिकारों का निपटारा पूर्ण’ दिखाना सरासर अपराध है.

कॉफी-चाय बागानों में पीढ़ियों का बंधुआ मजदूर जीवन: वन विभाग की पाबंदियों और विस्थापन के कारण हजारों आदिवासी परिवार कोडगु, नीलगिरी और वायनाड के चाय-कॉफी बागानों की ‘लाइन मेन्स’ (मजदूर कॉलोनियों) में बंधुआ और दयनीय परिस्थितियों में जीने को मजबूर हैं, जो कि बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 का खुला उल्लंघन है.


‘साउथ फोरम’ और पेसा (PESA) की मांग: कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु की सरकारों द्वारा आदिवासियों को संवैधानिक रूप से ‘अदृश्य’ रखने की साजिश के खिलाफ आदिवासियों ने एक ‘साउथ फोरम’ बनाने का निर्णय लिया है. इसके जरिए इन तीनों राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों में संविधान की पांचवीं अनुसूची को लागू करने और पेसा (PESA) अधिनियम, 1996 के विस्तार की मांग की जाएगी.

जेनु कुरुबा का पर्यवास अधिकार: विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) ‘जेनु कुरुबा’ के पर्यावास अधिकारों (Habitat Rights) को मैसूरु और कोडगु जिला प्रशासनों द्वारा तुरंत मान्यता देने की मांग की गई है.


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