जनजातियों को विमुक्त करने वाले ख़ुद पूर्वाग्रहों से कब मुक्त होंगे

विमुक्त या डीनोटिफाइड जनजातियों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए कई कमीशन और कमेटियों का गठन किया जा चुका है. उनके आर्थिक विकास और रोज़गार के स्थाई साधनों के लिए बजट में प्रावधान भी किये जाते रहे हैं. इन सब कोशिशों के बावजूद आज भी विमुक्त जनजातियाों को जन्मजात अपराधी मान लिया जाता है.

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महाराष्ट्र में पारधी जनजाति (Nomadic Tribes and De-notified Tribes)  से ताल्लुक़ रखने वाले 27 साल के नागेश की पुलिस हिरासत में मौत की जाँच सीआईडी कर रही है. लेकिन नागेश के परिवार को इस जाँच पर कोई भरोसा नहीं है. परिवार का कहना है कि अगर सचमुच में प्रशासन नागेश की पुलिस हिरासत में मौत के सच को सामने लाना चाहता है तो फिर न्यायिक जाँच होनी चाहिए.

नागेश के दो बच्चे हैं और दोनों ही बच्चों की उम्र 10 साल से कम बताई गई है. 16 अगस्त को रेलवे पुलिस के अधिकारी उन्हें और उनकी बहन के ससुर को काम देने के बहाने थाने ले गई. नागेश की बहन ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि उनके ससुर और भाई के साथ पुलिस ने हिरासत में बुरी तरह से मारपीट की थी. 

उनके ससुर अभी भी जेल में हैं और पुलिस हिरासत में टार्चर से उनके भाई की मौत हो गई.

पुलिस ने मीडिया को बताया है कि नागेश की मौत अस्पताल में निमोनिया के कारण हुई थी. पुलिस के दावों की जाँच उनके ही एक विभाग को सौंप दी गई है. ज़ाहिर है इस जाँच पर भरोसा करना मुश्किल है.

डीनोटिफाइड ट्राइब्स के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह

मीडिया में छपी रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस हिरासत में मारे गए नागेश का पूरा परिवार पुलिस के ज़ुल्म का शिकार रहा है. उनके माता-पिता दोनों ही पुलिस के हाथों अपनी जान गँवा चुके हैं. दरअसल उनके पिता कच्ची शराब बनाते थे. क़रीब 10 साल पहले नागेश के पिता रामदास पवार और उनकी माँ दोनों पुलिस के छापे में मारे गए थे. 

नागेश के परिवार से जुड़ी जानकारियों में यह भी बताया गया है कि उनके दो भाई भी फ़िलहाल जेल में हैं. नागेश का परिवार कहता है कि जब पुलिस किसी मामले को सुलझा नहीं पाती है तो पारधी जनजाति के लोगों को उठा लेती है.

अंग्रेजों के ज़माने में अपराधी जनजाति होने का टैग डीनोटिफाइड ट्राइब्स अभी तक उतार नहीं पाई हैं. भारत में कई जनजातियों को अंग्रेज सरकार ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 (Criminal Tribes Act of 1871) के तहत अपराधिक प्रवृति के लोगों के समूह घोषित कर दिया गया था. 

आज़ादी के बाद साल 1952 में उन क़ानूनों को ख़त्म कर दिया गया जिनके तहत कुछ जनजातियों को जन्मजात अपराधी मान लिया जाता था. लेकिन क़ानून ख़त्म होने से इन जनजातियों पर लगा ‘ अपराधी ’ का टैग नहीं हट सका. 

जून महीने में MBB की टीम का महाराष्ट्र के पालघर ज़िले की डहाणू तहसील में कातकरी समुदाय के कुछ परिवारों से मिलना हुआ. इन लोगों से बातचीत में हमें बताया गया कि जब भी इलाक़े में कोई चोरी होती है तो उनकी बस्ती से लड़के उठा लिए जाते हैं. 

इसके अलावा कातकरी बस्ती मुंबई पाड़ा के लोगों ने हमें बताया था कि वहाँ के बाज़ारों में उनके बच्चों को कोई काम नहीं देता है. क्योंकि उनके बारे में यह धारणा बनी हुई है कि वो चोरी करते हैं. 

जन्मजात अपराधी या हालात पैदा किये जाते हैं

ब्रिटिश काल में भारत की इन जनजातियों के बारे में कहा गया कि ये जन्मजात अपराधी हैं. इसलिए बाक़ायदा क़ानूनी तौर पर इन जनजातियों को अपराधी जनजाति घोषित कर दिया गया था. लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि आज़ादी के बाद इन जनजातियों को अपराधी घोषित करने वाले क़ानूनों को ख़त्म कर इन्हें विमुक्त जनजाति घोषित कर दिया गया.

लेकिन समाज और प्रशासन दोनों ही इन जनजातियों के प्रति बनी धारणा से मुक्त नहीं हो पाया. इन जनजातियों के बारे में कहा जाता है कि इनमें से ज़्यादातर घुमंतू जनजाति रही हैं और इनके पास घर या खेत की ज़मीन नहीं थी. 

ज़मीन नहीं होने की वजह से खेती में भी ये जनजातियां माहिर नहीं थी. इसके अलावा इनसे जुड़े अपराधी प्रवृत्ति के दाग़ की वजह से इन्हें कोई और रोज़गार मिलना भी बेहद मुश्किल होता है. 

कई कमीशन और कमेटी का गठन हुआ

विमुक्त या डीनोटिफाइड जनजातियों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए कई कमीशन और कमेटियों का गठन किया जा चुका है. उनके आर्थिक विकास और रोज़गार के स्थाई साधनों के लिए बजट में प्रावधान भी किये जाते रहे हैं.

साल 2021 में इन जनजातियों के आर्थिक सशक्तिकरण  के लिए 200 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया. लेकिन जब तथ्यों की जाँच करेंगे तो पाएँगे कि 2021-22 में इस धन में से एक भी रूपया ख़र्च नहीं किया गया. 

भारत में कुल 150 जनजातियों को विमुक्त जनजातियों के तौर पहचान दी गई है. इनकी स्थिति को समझने और बदलने के लिए बनाए गए कमीशन और कमेटियों में 1947 में क्रिमिनल ट्राइब्स इंक्वायरी कमेटी (उत्तर प्रदेश) का गठन हुआ था. 

उसके बाद अय्यंगर कमेटी 1949 (Ananthasayanam Ayyangar Committee) , काका केलकर कमीशन 1953 (Kaka Kalelkar Commission), बीपी मंडल कमीशन 1980 (B P Mandal Commission) ने भी इन जनजातियों के बारे में आकलन और सुझाव दिए थे. 

इन सब कोशिशों के बावजूद आज भी विमुक्त जनजातियाों को जन्मजात अपराधी मान लिया जाता है. बल्कि उनके लिए वो हालात पैदा किये जाते हैं जहां वह अपराधी बन जाए.  

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