62 आदिवासी परिवारों ने पहाड़ों में लिया आसरा, बाढ़ ने सब तबाह कर दिया है

आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामराजू ज़िले में बाढ़ से प्रभावित 62 आदिवासी परिवार एक महीने से ज़्यादा समय से पहाड़ों में आसरा लिए हैं. क्योंकि उनके घर बाढ़ में डूब गए हैं. प्रशासन ने अभी तक उनके लिए कुछ भी नहीं किया है.

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पैंतीस वर्षीय मुथ्याला रेड्डी खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि वो अभी जिंदा हैं. रेड्डी आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामराजू ज़िले के वररामाचंद्रपुरम (Vararamachandrapuram) मंडल के कोल्लूर गांव के निवासी हैं. वह बाढ़ में फँसे उन 62 आदिवासी परिवारों में शामिल हैं जिनको उनके हाल पर छोड़ दिया गया था.

कोंडारेड्डी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले ये 62 आदिवासी परिवार एक महीने से अधिक समय से अधिकारियों की मदद के बिना बीरमाया पहाड़ियों में डेरा डाले हुए हैं.

कोल्लूर कोंडारेड्डी समुदाय का आदिवासी बहुल गांव है. गोदावरी नदी के तट पर स्थित कोल्लूर एक बाढ़ प्रभावित गांव भी है. बाढ़ के कारण कम से कम 30 फूस की छत वाले घर पूरी तरह से नष्ट हो गए और बाकी बाढ़ के पानी से भर गए हैं. आदिवासी परिवारों ने गांव में पहाड़ी के ऊपर एक अस्थायी आश्रय बनाया है.

कोल्लूर की ही तरह वीआर पुरम मंडल के कई गांव भी बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. वीआर पुरम ज़िला परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र (VR Puram Zilla Parishad Territorial Constituency) के सदस्य वल्ला रंगा रेड्डी के अनुसार, दो पंचायतों को छोड़कर सभी में पानी भर गया है. यहां पर रहने वाले लोगों को भी इसी तरह के संकट का सामना करना पड़ रहा है. मंडल में 11 पंचायतें हैं.

मुथ्याला रेड्डी ने अफसोस के साथ कहा, “हम यहां हर रात इस डर में सोते हैं कि कहीं ये आख़िरी रात न हो. सूरज ढलने के बाद भय का माहौल बना रहता है. रोशनी के बिना, हमारे आश्रय में जहरीले कीड़ों और सांपों के घुसने का ख़तरा हमेशा बना रहता है. हमारे छोटे बच्चे भी हैं. इस तरह जीना बेहद मुश्किल है.”

उनका कहना था, “हमारा गांव ज़िले के आंतरिक गांवों में से एक है. हमारे पास कभी बिजली नहीं थी लेकिन हम अपने घरों में इतना डरे हुए नहीं थे. लेकिन यहां पहाड़ी पर डेरा डालना हमें लगातार चिंतित करता है. अगर किसी को सांप ने काट लिया तो क्या होगा? हमें उस शख्स को बाढ़ के पानी से गुजरते हुए अस्पताल कैसे ले जाएंगे?”

उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने उनसे संपर्क करने या उन्हें बाढ़ की गंभीरता के बारे में सूचित करने का कोई प्रयास नहीं किया. हम यहां अपने दम पर हैं. कोई भी यह पता लगाने नहीं आया है कि हम जिंदा हैं या मर चुके हैं.

हमने बाढ़ में अपना सारा सामान और अपना घर खो दिया है. सरकार ने हमें आश्वासन दिया था कि वे हमें पूर्वी गोदावरी ज़िले में एक सुरक्षित आश्रय में स्थानांतरित कर देंगे लेकिन ये आश्रय अभी तक तैयार नहीं हैं.

उसी मंडल के कोटारागुम्मम गांव के निवासी रामाराव रेड्डी ने मीडिया को बताया, “हमारे पास पीने का पानी नहीं है. हम पहाड़ियों से बहने वाले पानी का उपयोग कर रहे हैं. इस वजह से लोग बीमार पड़ रहे हैं. मेरे गांव के कम से कम 10 लोग मलेरिया से पीड़ित हैं क्योंकि हम जंगल में रह रहे हैं. हम चाहते हैं कि अधिकारी हमें सुरक्षित पेयजल मुहैया कराएं. हमारे यहां तो बोरवेल भी नहीं है. यहां कम से कम प्यूरिफायर की कुछ व्यवस्था होनी चाहिए.”

निवासियों ने जो कहा, उसकी पुष्टि करते हुए, ZPTC सदस्य वल्ला रंगा रेड्डी ने कहा कि जून में, बाढ़ के पहले चरण के दौरान, जिला प्रशासन ने बाढ़ प्रभावित निवासियों को 25 किलो चावल, दाल और तेल उपलब्ध कराया था. लेकिन बाद में उन्हें कुछ भी नहीं दिया गया. मंडल भर में यही स्थिति है.

मंडल परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के सदस्य, वेंकटेश्वर रेड्डी ने कहा, “शुरू में चावल, दाल और तेल उपलब्ध कराने के अलावा ज़िला प्रशासन ने कुछ भी नहीं किया है. गैर सरकारी संगठनों और अन्य स्वयंसेवी संगठनों की मदद से हम राशन उपलब्ध करा रहे हैं और स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर रहे हैं. स्थिति वाकई बहुत खराब है.”

अल्लूरी सीतारामाराजू ज़िले के अलावा पूर्वी गोदावरी और पश्चिमी गोदावरी ज़िलों के बाढ़ संभावित कई क्षेत्रों का संपर्क मुख्यधारा से कटा हुआ है.

वीआर पुरम मंडल राजस्व अधिकारी, श्रीधर ने कहा, “गोदावरी बेल्ट (जिसमें कोल्लूर स्थित है) पूरी तरह से जलमग्न हो गई है. हम उन्हें नावों के जरिए आपूर्ति भेज रहे हैं. आवश्यक आपूर्ति कल उन तक पहुंच जाएगी.”

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