माओवादियों के नाम पर UAPA के दुरूपयोग का आरोप

रिपोर्ट में सर्वेक्षण किए गए 31 पीड़ितों की केस हिस्ट्री दी गई है. सभी पर या तो माओवादी होने, या उनके साथ सहयोग करने, या माओवादियों के कारण होने वाली हिंसक घटनाओं में शामिल होने का आरोप लगाया गया है. अनिवार्य रूप से, उनके खिलाफ आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 1908 की धारा 17 सहित यूएपीए और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं को लागू किया गया है.

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झारखंड के बोकारो जिले के तेनुघाट के अदालत में अपने मामलों की सुनवाई में उपस्थिति दर्ज कराने के लिए पहुंचने वाले सभी लोग चरमपंथी समूहों से नहीं जुड़े हैं. लेकिन बावजूद इसके  उन्हें महीने दर महीने और कभी साल दर साल अदालत के आदेश का पालन करना पड़ता है. क्योंकि झारखंड पुलिस ने माओवादियों के साथ उनके संबंध का ‘सबूत’ पाया है और इसे “संज्ञेय अपराध” के रूप में माना है.

एक मायने में ऐसे लोग भाग्यशाली होते हैं जो जमानत पर होते हैं. क्योंकि कुछ ऐसे बदकिस्मत लोग भी हैं जो अक्सर जेलों में सड़ते रहते हैं और ये तक नहीं जानते कि उनके खिलाफ क्या आरोप हैं.

कार्यकर्ताओं का कहना है कि झारखंड पुलिस ने माओवादियों और संदिग्ध चरमपंथियों के खिलाफ अपने अभियान में “उनके मुखबिरों द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी” के आधार पर उन्हें “फंसाया” है.

पुलिस के काम आ रहा है 1967 का गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), जिसमें कई संशोधन हुए हैं. हर बार इसके प्रावधानों को सख्त और सख्त बनाया गया है, खासकर 2014 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से.

प्रगतिशील नागरिक अधिकार संगठनों के गठबंधन, झारखंड जनाधिकार महासभा (JJM) से सक्रिय रूप से जुड़े लोगों का कहना है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा-कांग्रेस गठबंधन की हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार ने अभी तक उनके लिए कुछ भी सार्थक नहीं किया है.

यह तब है जब गठबंधन के सहयोगियों ने अपने-अपने घोषणापत्र में पीड़ितों के दुख को कम करने का प्रयास करने का वादा किया था, जिन्हें कथित तौर पर पिछले बीजेपी के नेतृत्व वाले सरकार के कार्यकाल के दौरान फंसाया गया था.

आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि 2015-19 के दौरान यूएपीए के मामलों में 138 फीसदी की वृद्धि हुई.

अगस्त 2021 और जनवरी 2022 के बीच, JJM की सदस्य इकाइयों ने बोकारो जिले के गोमिया और नामडीह ब्लॉक में 31 “निर्दोष” आदिवासी-मूलवासी व्यक्तियों का सर्वेक्षण किया. इन सभी पर माओवादी होने का आरोप लगाया गया और उन पर यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं.

सर्वेक्षण करने वाली इकाइयों में बोकारो के आदिवासी-मूलवासी अधिकार मंच और रांची के नामकुम क्षेत्र के बगैचा में आदिवासी महिला नेटवर्क शामिल थे.

6 जुलाई को सार्वजनिक किए गए सर्वेक्षण का उद्देश्य कथित तौर पर किसी व्यक्ति पर गलत आरोप लगाने और उसे कैद करने की पुलिस की रणनीति को समझना था. साथ ही ये भी समझना था कि आरोपी किस स्थिति का सामना कर रहे हैं और उनके परिवार के सदस्य किस पीड़ा का सामना कर रहे हैं.

रिपोर्ट स्टेन स्वामी को समर्पित थी, जिन्होंने विचाराधीन कैदियों के अधिकारों के लिए अथक संघर्ष किया.

रिपोर्ट में सर्वेक्षण किए गए 31 पीड़ितों की केस हिस्ट्री दी गई है. सभी पर या तो माओवादी होने, या उनके साथ सहयोग करने, या माओवादियों के कारण होने वाली हिंसक घटनाओं में शामिल होने का आरोप लगाया गया है. अनिवार्य रूप से, उनके खिलाफ आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 1908 की धारा 17 सहित यूएपीए और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं को लागू किया गया है. पुलिस ने कुछ मामलों में विस्फोटक अधिनियम का भी इस्तेमाल किया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सताए गए लोगों और उनके परिवार के सदस्यों को उनके खिलाफ इस्तेमाल किए गए अधिनियमों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उनके पास कोई दस्तावेज भी नहीं है. जैसे- एफआईआर की कॉपी, केस डायरी आदि.

पीड़ितों के बार-बार इनकार करने के बावजूद भी पुलिस ने पीड़ितों पर या तो माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले या माओवादियों द्वारा की गई हिंसा के कृत्यों में भाग लेने के आरोप लगाए हैं.

ज्यादातर पीड़ित जंगल में बसे गांवों से हैं. पहले माओवादी उन गांवों का दौरा करते थे और यह भी सच है कि कभी-कभी उन्हें ग्रामीणों को खाना भी देना पड़ता था. हालांकि हाल के वर्षों में, चरमपंथियों द्वारा जंगल में बसे गांवों में जाने में कमी आई है.

जेजेएम के निष्कर्षों के मुताबिक, सर्वेक्षण किए गए 31 लोगों में से 16 लोगों के खिलाफ 2014 से पहले मामले दर्ज किए गए थे. वहीं नौ के खिलाफ मामले 2014 और 2019 के बीच और तीन के खिलाफ 2019 के बाद दर्ज किए गए थे.

उनकी प्रतिक्रिया से पता चलता है कि उन्होंने औसतन दो साल जेल में बिताए. हालांकि कुछ पीड़ितों को पांच साल से अधिक जेल में बिताने पड़े हैं. हाल के वर्षों में, वे एक-एक करके बरी हो रहे हैं. 29 आरोपियों में से नौ को उनके खिलाफ सभी मामलों में बरी कर दिया गया है. उनमें से बीस को अभी भी एक-एक मामले से मुक्त किया जाना बाकी है.

31 लोगों की सर्वेक्षण सूची से उठाए गए चार उदाहरण बताते हैं कि झारखंड में यह प्रणाली कैसे काम कर रही है:

बिरसा मांझी- जो 43 वर्ष के हैं और अनपढ़ हैं. ये तिलैया पंचायत के चोरपनिया गांव निवासी रामेश्वर मांझी के पुत्र हैं और आर्थिक रूप से काफी पिछड़े हुए हैं.

बिरसा और उनके बेटे को एक ईंट भट्ठे से मिलने वाली मजदूरी उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत है. वह काफी समय से प्रिवेंशन ऑफ विच (Daain) प्रैक्टिस एक्ट के तहत मुकदमे का सामना कर रहे हैं. अचानक पिछले दिसंबर में उन्हें स्थानीय जोगेश्वर बिहार पीएस द्वारा बुलाया गया और उनके कथित नक्सल लिंक के लिए आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया.

सर्वेक्षकों द्वारा की गई पूछताछ से पता चला कि पुलिस उसी नाम के एक व्यक्ति की तलाश कर रही थी, जिसके पिता का नाम बुधू मांझी था.

पुलिस ने लक्षित शख्स द्वारा उसके नक्सली संबंधों से बार-बार इनकार करने के बाद भी नहीं माना. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उन्हें कभी नहीं बताया गया था कि उनके ऊपर 1 लाख रुपये का इनाम है. इसके अलावा, उसने बताया कि उसके पिता का नाम रामेश्वर मांझी है.

लेकिन पुलिस ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया और उसे आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया. शायद पुलिस फरार बिरसा का पता नहीं लगा पाई इसलिए ऐसा किया. नई प्राथमिकी में बुधू मांझी का नाम नहीं था, जिसने सर्वेक्षकों के संदेह को और बढ़ा दिया.

हीरालाल टुडू- ये धनीराम टुडू के बेटे हैं जिसकी उम्र 26 साल है. ये तिलैया पंचायत के गांव तूतीझरना में रहते हैं और इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की है साथ ही कंप्यूटर चलाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया है.

हीरालाल को 3 सितंबर 2014 को माओवादियों की बंदूकें बक्से में छिपाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था था. हालांकि 2017 के दौरान उन्हें एक उच्च न्यायालय में जमानत मिल गई.

सरोदेवी- ये पचमो पंचायत के पतराटांड गांव की निवासी हैं और माध्यमिक स्तर तक पढ़ाई की है. पति निरंजन महतो, जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर खेती से जीवन यापन करते हैं.

सरोदेवी पर विस्फोटकों की आपूर्ति में चरमपंथियों की मदद करने और पुलिस कर्मियों को मारने के लिए नक्सलियों की कथित साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया गया था. पति निरंजन के खिलाफ भी यही आरोप लगाए गए थे, जिसे तेनुघाट पुलिस ने पीटा था. पुलिस ने कथित तौर पर उसे छह खाली पन्नों पर अपने हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया.

सूरजमुनि कुमारी- तिलैया पंचायत के तूतीझरना गांव की निवासी हैं और नौवीं तक पढ़ाई की है.

सूरजमुनि पर माओवादियों के साथ घूमने और उनकी बंदूकों की देखभाल करने का आरोप लगाया गया था. फरवरी और मार्च 2014 के बीच लालपनिया इलाके में कथित तौर पर चरमपंथियों द्वारा किए गए विस्फोटों के बाद, सूरजमुनि को गिरफ्तार कर लिया गया था. उस समय उसकी मां उसके साथ थी लेकिन उन्हे  सीआरपीएफ कैंप में छोड़ दिया गया और कथित तौर पर उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया. गिरफ्तारी के समय सूरजमुनि की उम्र करीब 16 साल थी.

जेजेएम की ओर से अलका आइंड, दिनेश मुर्मू, एलिना होरो, हीरालाल टुडू (ऊपर दिए गए आरोपियों में से एक), पीएम टोनी और सिराज दत्ता द्वारा सर्वेक्षण किया गया था.

जेजेएम से जब पूछा गया कि न्याय पाने के लिए आदिवासियों ने कानूनी खर्च कैसे पूरा किया, तो रांची के सामाजिक नीति विश्लेषक सिराज दत्ता ने न्यूज़क्लिक को बताया कि परिवारों को अपने पशुओं को बेचने या अपनी ज़मीन के एक हिस्से को गिरवी रखने के लिए मजबूर किया गया था.

उन्होंने कहा कि कुछ परिवार अपने रिश्तेदारों और अन्य ग्रामीणों से कर्जा लिया. उन्होंने कहा कि कभी-कभी उनके बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं.

28 उत्तरदाताओं से प्राप्त जानकारी ने मुकदमेबाजी का औसत खर्च 90,000 रुपये रखा. कई मुकदमे लड़ने वालों को अक्सर 3 लाख रुपये तक खर्च करना पड़ता है. दत्ता ने बताया कि उनके लिए आजीविका का मुख्य स्रोत छोटे पैमाने की खेती है और परिवार के कुछ सदस्य दिहाड़ी मजदूरी के रूप में थोड़ा-बहुत कमाते हैं.

जेजेएम ने कहा कि उसकी जनसुनवाई आयोजित करके निष्कर्षों को सार्वजनिक डोमेन में लाने की योजना है ताकि जनता के बीच जागरूकता पैदा की जा सके कि आदिवासी-मूलवासी कैसे पीड़ित हैं क्योंकि पुलिस कथित तौर पर उन्हें माओवाद विरोधी अभियान के तहत झूठे मामलों में फंसाती है.

अलका ने बताया कि प्रस्तावित ‘जन सुनवाई’ कार्यक्रमों में वरिष्ठ पुलिस कर्मियों सहित सरकारी अधिकारियों को उपस्थित होने के लिए राजी किया जाएगा. उन्होंने कहा कि हम ज्यादा सामाजिक रूप से सक्रिय लोगों को शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

एलिना होरो के अनुसार, बिरसा मांझी प्रकरण से पता चलता है कि पुलिस कैसे माओवादियों को बुक करने और संदिग्ध चरमपंथियों की पहचान करने की अपनी खोज में निर्दोष आदिवासियों को परेशान करती है, जिन्हें उनके खिलाफ लागू कानूनों की जानकारी तक नहीं है.

एलिना ने बताया, “हमारी रिपोर्ट में संकलित सभी मामले बोकारो जिले के हैं. झारखंड में दो दर्जन जिले हैं और उत्पीड़न के ऐसे ही कई मामले हैं. हमें उन पर काम करना है. हम चाहते हैं कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए नियुक्त किया जाए.”

वहीं पीएम टोनी के अनुसार, गिरिडीह, हजारीबाग, चाईबासा और खूंटी झारखंड के अन्य क्षेत्र हैं, जहां हम समझते हैं कि पुलिस द्वारा माओवादी विरोधी ड्यूटी पर पिछड़े, आर्थिक रूप से कमजोर समुदाय के लोगों को परेशान करने के बहुत सारे उदाहरण है.

दिनेश मुर्मू ने कहा,”एफआईआर में दर्ज किए गए संस्करण, जिनकी प्रतियां हम हासिल करने में कामयाब रहे और जो पीड़ितों द्वारा हमें दी गईं, कई मामलों में अलग हैं. इसके अलावा पीड़ित पैसों की कमी के चलते कानूनी सहायता की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं. जिससे मामले खिंचते हैं और वे विचाराधीन बने रहें. जब तक उनकी बेगुनाही साबित हो जाती है और उन्हें बरी कर दिया जाता है, तब तक वे अपने जीवन का कीमती समय खो चुके होते हैं. यूएपीए का अंधाधुंध आवेदन इस उत्पीड़न में एक प्रमुख कारक है. हम यूएपीए को निरस्त करना चाहते हैं.”

हीरालाल टुडू ने भी यही मांग की थी, जिसकी कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र शुरू करने और सम्मानजनक जीवन जीने की योजना थी. जो पुलिस की गैर-जिम्मेदाराना कार्रवाई से बाधित हुई थी.

उन्होंने कहा कि मुझे यकीन है कि यूएपीए की निरंतरता और भी लोगों के करियर बर्बाद कर देगी. पुलिस अपने माओवादी विरोधी अभियानों के आड़े गंभीर अपराध कर रही है. यूएपीए को जाना होगा.

सिराज दत्ता ने झारखंड पुलिस की भूमिका की न्यायिक जांच की मांग की है. उन्होंने कहा कि गरीब आदिवासियों को यूएपीए के तहत सिर्फ इसलिए फंसाना बेतुका है क्योंकि उन्होंने एक माओवादी को भोजन की पेशकश की थी.

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