आंध्र प्रदेश के अनकापल्ली जिले के रोलुगुंटा मंडल के नीलाबंदा और रविकामथम मंडल के सोमपुरमबंधा के आदिवासी निवासियों को दशकों तक अंधेरे में रहने के बाद आखिरकार बिजली मिल गई है.
इस अवसर पर ग्रामीणों ने पारंपरिक ढिमसा नृत्य और सामुदायिक समारोहों के साथ जश्न मनाया.
आरला पंचायत के पहाड़ी इलाके में स्थित नीलाबंदा में कोंध समुदाय के तीन परिवार रहते हैं, जिसकी कुल आबादी करीब 25 है. कोंध, विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह (PVTG) है.
वहीं चीमलपाडु पंचायत में स्थित सोमपुरमबंधा में दो परिवार हैं, जिनमें करीब 15 निवासी हैं.
आजादी के 77 साल बाद भी ये गांव बिजली से वंचित हैं, जिसके चलते निवासियों ने बार-बार याचिकाएं दायर कीं और विरोध प्रदर्शन किए. उनके प्रयासों और मीडिया में उनकी दुर्दशा को उजागर करने वाली रिपोर्टों के कारण उनके घरों में लंबे समय से इंतजार के बाद बिजली पहुंच पाई.
बिजली आने के बाद ग्रामीणों का कहना है, “पहली बार, हमारी रातें अब अंधेरे से भरी नहीं हैं. अब हम सूर्यास्त के बाद भी अपने काम जारी रख सकते हैं और बच्चे बिना किसी परेशानी के पढ़ाई कर सकते हैं.”
आदिवासी उचित सड़क संपर्क की मांग कर हैं
हालांकि, उन्होंने बताया कि सड़क संपर्क एक चुनौती बनी हुई है. उनका कहना है कि हमें अभी भी पहाड़ी से 4 किमी नीचे उतरना पड़ता है, खासकर बरसात के मौसम में या जब कोई बीमार पड़ जाता है. हमें उम्मीद है कि अधिकारी जल्द ही इसे सुधारने के लिए कदम उठाएंगे.
नीलाबंदा में अब एक एनजीओ की बदौलत पीने के पानी की सुविधा है. जबकि सोमपुरमबंधा ग्राणीण अभी भी पानी की धाराओं पर निर्भर है.
दोनों गांव अपनी आजीविका के लिए काजू के बागानों और बाजरा की खेती पर निर्भर हैं, लेकिन उचित सड़कों की कमी के कारण मनरेगा के तहत काम करना मुश्किल हो जाता है.
आदिवासी नेता के गोविंद राव ने विद्युतीकरण प्रयासों का स्वागत किया लेकिन बेहतर बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया.
उन्होंने कहा, “बिजली एक बड़ा कदम है लेकिन इन गांवों को सड़कों और उचित पेयजल की भी आवश्यकता है. सरकार को इन मुद्दों को हल करने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए.”
उन्होंने कहा कि जीलिगुलोवा और पसुवुलाबंधा में बिजली पहुंचाने का काम चल रहा है.